चण्डीगढ़ : गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद महाराज ने कहा कि गीता का संदेश समस्त मानव समाज के लिए आत्मज्ञान, नैतिकता, करुणा, सेवा और लोककल्याण का सार्वभौमिक संदेश है। गीता हमें आत्मविश्वास, आत्मसंयम और आत्मबोध की ओर प्रेरित करती है तथा यह सिखाती है कि मनुष्य का वास्तविक विकास केवल भौतिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि चरित्र, संस्कार और आध्यात्मिक चेतना से होता है।
गीता मनीषी गीता ज्ञान संस्थानम् में आयोजित सप्तम मासिक गीता प्रवाह संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के तौर श्री कृष्ण आयुष विश्वविद्यालय के कुलगुरु वैद्य करतार धीमान ने शिरकत की, जबकि अध्यक्षता जीओ गीता सचिव मदन मोहन छाबड़ा ने की। मुख्य वक्ता वैद्य डॉ. करतार धीमान ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण की कर्मयोग की शिक्षा और आयुर्वेद का 'स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम्, आतुरस्य विकार प्रशमनम्' का सिद्धांत मिलकर एक ऐसे समाज की परिकल्पना करते हैं, जहां व्यक्ति केवल रोगमुक्त ही नहीं, बल्कि चरित्रवान, कर्तव्यनिष्ठ और आत्मनिर्भर भी हो। यही भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता है।
उन्होंने कहा कि गीता और आयुर्वेद अपनाने से ही स्वस्थ, सशक्त और संस्कारित भारत बनेगा, क्योंकि आज की भागदौड़, तनावपूर्ण जीवनशैली और बढ़ती मानसिक चुनौतियों के दौर में गीता और आयुर्वेद पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। गीता मन को स्थिर, सकारात्मक और आत्मविश्वासी बनाती है, जबकि आयुर्वेद उचित आहार, विहार, दिनचर्या और ऋतुचर्या के माध्यम से रोगों की रोकथाम और स्वास्थ्य संरक्षण का मार्ग प्रशस्त करता है। दोनों का समन्वय व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाता है।
जीओ गीता सचिव मदन मोहन छाबड़ा ने कहा कि गीता प्रवाह संगोष्ठी का उद्देश्य श्रीमद्भगवद्गीता के जीवनोपयोगी संदेशों को समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंचाना तथा युवाओं और प्रबुद्ध नागरिकों में आध्यात्मिक एवं नैतिक मूल्यों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। आरके देशवाल ने कहा कि 'गीता प्रवाह' केवल एक संगोष्ठी नहीं, बल्कि समाज में नैतिकता, आत्मचिंतन और सकारात्मक जीवन मूल्यों को सशक्त बनाने का एक सतत अभियान है।
इस अवसर पर प्रोफेसर शुचिसुमिता, सचिंद्र सिंह, ऋषिपाल सिंह, पवन आश्री, विवेक कोहली, तरुण शास्त्री, संत कुमार सहित बड़ी सुख्या में प्रबुद्धजन मौजूद रहे।