किन्नौर जिले में सांगला-कामरू स्पेशल एरिया में अब भवन निर्माण बिना अनुमति लिए और नक्शा पास करवाए नहीं हो पाएगा। राज्य सरकार ने ऐतिहासिक और पर्यटन महत्व के इस क्षेत्र में लैंड यूज को फ्रीज कर दिया है। इस बारे में पिछली कैबिनेट में फैसला लिया गया है। हालांकि यहां स्पेशल एरिया का गठन हिमाचल प्रदेश सरकार ने 6 मार्च 2017 को किया था। यह अधिसूचना हिमाचल प्रदेश टाउन एंड कंट्री प्लानिंग एक्ट, 1977 की धारा 66 के तहत जारी की गई थी। इसके साथ ही सरकार ने स्पेशल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी सांगला-कामरू का गठन भी 6 मार्च 2017 को किया, लेकिन भवन निर्माण गतिविधियों को उस तरह से रेगुलेट नहीं किया जा सका। अब इस स्पेशल एरिया में नियोजित विकास, निर्माण नियंत्रण, पर्यटन प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य के लिए यहां लैंड यूज को फ्रीज किया गया है, ताकि बेतरतीब निर्माण न हो। इसमें सांगला, कामरू, छितकुल सहित कई पंचायत और राजस्व मोहालों में अब भवन निर्माण बंदिशें लग गई हैं।
किन्नौर जिला की सांगला घाटी और ऐतिहासिक कामरू किला प्रदेश ही नहीं बल्कि देशभर में अपनी विशेष पहचान रखता है। प्राकृतिक सौंदर्य, समृद्ध संस्कृति, धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक विरासत के कारण यह क्षेत्र पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन चुका है। हर वर्ष बड़ी संख्या में पर्यटक यहां पहुंचते हैं। सांगला घाटी, जिसे बास्पा घाटी भी कहा जाता है, किन्नौर की सबसे सुंदर घाटियों में गिनी जाती है। बास्पा नदी के किनारे बसे इस क्षेत्र की पहचान सेब बागानों, पारंपरिक किन्नौरी संस्कृति और मनमोहक प्राकृतिक दृश्यों से जुड़ी है। सांगला से चितकुल और कामरू जैसे प्रसिद्ध स्थल भी जुड़े हुए हैं। कामरू किला किन्नौर की ऐतिहासिक धरोहर माना जाता है। सांगला से करीब दो किलोमीटर दूर स्थित यह किला कभी बुशहर रियासत की प्राचीन राजधानी रहा है। पारंपरिक किन्नौरी और तिब्बती शैली में बने इस किले में लकड़ी और पत्थर की अनूठी वास्तुकला देखने को मिलती है। कामरू किले में स्थित माता कामाख्या देवी मंदिर स्थानीय लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि यहां स्थापित देवी की प्रतिमा असम से लाई गई थी। बुशहर रियासत के राजाओं का राजतिलक भी इसी किले में किया जाता था। इसी कारण इस क्षेत्र को स्पेशल एरिया बनाया गया था।