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बाज़ार

वैश्विक तनाव से सरसों के बाजार में उबाल; युद्ध की आहट और डॉलर की मजबूती ने बढ़ाई कीमतें

26 मार्च, 2026 06:27 PM

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक अनिश्चितता का सीधा असर अब रसोई के बजट और तिलहन बाजार पर दिखने लगा है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच युद्ध जैसी परिस्थितियों के कारण वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में रिकॉर्ड तेजी दर्ज की जा रही है। डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की कमजोरी ने विदेशी तेलों के आयात को महंगा कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप घरेलू बाजार में सरसों और सरसों तेल की कीमतें मजबूत बनी हुई हैं।


आयातित तेलों का प्रभाव और किसानों को लाभः
श्री हरी एग्रो इंडस्ट्रीज लिमिटेड, जयपुर के एमडी दीपक डाटा ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारतीय बाजारों पर पड़ रहा है। हालांकि, इस स्थिति का एक सकारात्मक पहलू यह है कि भारतीय किसानों को उनकी सरसों की फसल के बेहतर दाम मिल रहे हैं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की आय में सुधार की उम्मीद है। मांग और आपूर्ति के संतुलन के साथ-साथ वैश्विक घटनाएं फिलहाल सरसों की कीमतों को सहारा दे रही हैं।


उत्पादन और बाजार भाव की स्थितिः
हाल ही में भरतपुर में संपन्न हुए 46वें रबी तेल तिलहन सेमिनार के आंकड़ों के अनुसार, इस चालू सीजन में देश में सरसों का उत्पादन 117.25 लाख टन होने की संभावना है, जो पिछले वर्ष के 115 लाख टन के मुकाबले अधिक है। उत्पादन में वृद्धि के बावजूद, वैश्विक अस्थिरता के कारण कीमतों में मंदी के आसार कम हैं।
वर्तमान में जयपुर मंडी में 42 प्रतिशत तेल कंडीशन वाली सरसों (सीड मिल डिलीवरी) के भाव 7100 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास बने हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनिश्चितता बनी रहेगी, सरसों के बाजार में मजबूती के संकेत बरकरार रहेंगे।

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