चण्डीगढ़ : क्षेत्र की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था अभिव्यक्ति की ओर से जून माह की मासिक साहित्यिक गोष्ठी का भव्य आयोजन किया गया। यह गोष्ठी पूर्व आईआरएस और वरिष्ठ साहित्यकार आर के सौंध के सौजन्य से उनके सेक्टर 21 बी स्थित निवास स्थान पर आयोजित हुई। कार्यक्रम का सफल संयोजन और संचालन अभिव्यक्ति के अध्यक्ष वरिष्ठ साहित्यकार एवं रंगकर्मी विजय कपूर द्वारा किया गया। इस खास गोष्ठी में ट्राइसिटी चंडीगढ़, पंचकुला और मोहाली के अनेक जाने माने साहित्यकारों कवियों और विचारकों ने हिस्सा लिया।
साहित्यिक चर्चाओं के साथ साथ इस गोष्ठी का एक मुख्य आकर्षण पूर्व आईआरएस और साहित्यकार रविंदर टंडन द्वारा बनाए गए सजीव चित्रों की सुंदर प्रदर्शनी भी रहा जिसे उपस्थित बुद्धिजीवियों ने खूब सराहा
गोष्ठी के पहले सत्र में रचनाकारों ने अपनी अनूठी और सारगर्भित रचनाओं के पाठ से समां बांध दिया।
आर के सौंध ने" यह ख्याल भी बस यूं ही कहीं के कहीं पहुंच जाते हैं/ कभी पांव की जानिब कभी जुल्फों तक पहुंच जाते हैं", विजय कपूर ने " झील के तल में अब कोई हलचल नहीं/ बस एक असीम धैर्यरूपी मौन है/ जहाँ पहाड़ अपना अस्तित्व खोकर उसकी गोद में विसर्जित हो रहा है",
अपूर्वा रवि सौंध ने " चंद लाइनें लिखने के लिए कितना सोचना पड़ता है/ हर महीने कुछ सुनाने को दिल फिर भी मचलता रहता है," डाॅ सारिका धूपड़ ने "कभी भाव विभोर हो शून्य में समा जाती हूँ/ कभी खुद में खोकर निर्जन मैं कहलाती हूँ", सुरेन्द्र पाल सोनी काकड़ौद ने " नहीं चाहता हूँ मैं अपनी देह के किसी भी हिस्से का/ अपने पूर्ण हो जाने तक आभासी या दुनियावी सा छिन्न भिन्न कोई अग्रिम तर्पण," विमल कालिया ने " आया तू भी ख़ाली हाथ समान/ कुछ मेरे पास भी नहीं तो फिर रंजिश की गुफ़्तगू क्यों है,"
प्रेम विज ने गीत में कहा" आंख मूंद कर हर किसी पर भरोसा मत कीजिए/ खुद के दांत भी काट देते है कभी-कभी। आर के सुख़न ने " मर जाएंगे घुटन से अब भी जो चुप रहे/ तन्हाइयों से बातें करने लगे हैं हम,"
रविन्द्र टंडन ने " चांद तारे नहीं चाहता तोड़ना मैं / तुम्हारे लिए और यदि तोड़ सकता भी तो भी नहीं करता यह बेतुका वादा",
इसके साथ ही डॉ पारस बमोला, डॉ निर्मल सूद, शहला जावेद, स्वाति शर्मा, अश्वनी मल्होत्रा भीम, मोनिका कटारिया, रश्मि शर्मा रश्मी, बी बी शर्मा, सीमा गुप्ता, डॉ प्रतिभा सिंह, रेखा मित्तल,एस के सिंह, सतिंदर गिल, ममता ग्रोवर, नवनीत बक्शी, रविश काला, खुशनूर और डॉ तिलक सेठी ने भी अपनी संजीदा, सामाजिक और प्रेम से सराबोर रचनाओं का पाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
गोष्ठी का दूसरा सत्र गद्य लेखन के नाम रहा ।
डॉ विमल कालिया ने "ज़मीन आसमान" शीर्षक से एक बेहद खूबसूरत कहानी का पाठ किया डॉ पंकज मालवीय ने देश और समाज के हालातों को बयां करती संजीदा लघु कहानी "दंगे" से सबको भावुक किया
अश्वनी मल्होत्रा भीम ने व्यवस्था पर करारा प्रहार करते हुए एक दिलचस्प व्यंग्य "महासन" का पाठ किया जिसने श्रोताओं को सोचने पर मजबूर भी किया और हंसाया भी। वरिष्ठ साहित्यकार प्रेम विज खास तौर पर उपस्थित रहे।