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हिमाचल में नीली क्रांतिः 1,553 युवाओं को मिले रोजगार और स्वरोजगार के अवसर

07 जून, 2026 08:09 PM

शिमला : मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के दूरदर्शी नेतृत्व में हिमाचल प्रदेश का मत्स्य क्षेत्र अभूतपूर्व प्रगति के दौर से गुजर रहा है। कभी सीमित आर्थिक गतिविधि के रूप में देखा जाने वाला यह क्षेत्र आज ग्रामीण विकास, रोजगार सृजन और आर्थिक समृद्धि का सशक्त माध्यम बनकर उभरा है। राज्य सरकार की दूरदर्शी नीतियों, आधुनिक तकनीकों और मछुआरों के कल्याण के लिए उठाए गए ठोस कदमों ने मत्स्य क्षेत्र को नई पहचान प्रदान की है। प्रदेश सरकार द्वारा मत्स्य उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ मछुआरों और मत्स्य पालकों की आय में वृद्धि, आधुनिक बुनियादी ढांचे का विकास तथा सामाजिक सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है, जिसके परिणामस्वरूप हिमाचल प्रदेश की ब्लू इकोनॉमी का निरंतर विस्तार हो रहा है।

राज्य सरकार की योजनाओं के फलस्वरूप जनवरी 2023 से मार्च 2026 के बीच प्रदेश में कुल 60,799.66 मीट्रिक टन मछली का उत्पादन दर्ज किया गया, जिसकी अनुमानित कीमत 972.46 करोड़ रुपए रही। वर्ष 2023-24 में जहां 17,721.64 मीट्रिक टन मछली उत्पादन दर्ज किया गया, वहीं 2024-25 में यह बढ़कर 19,019.83 मीट्रिक टन और 2025-26 में रिकॉर्ड 20,005.97 मीट्रिक टन उत्पादन दर्ज किया गया। यह सतत वृद्धि दर्शाती है कि मत्स्य क्षेत्र प्रदेश की अर्थव्यवस्था में लगातार महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है तथा हजारों परिवारों के लिए आय का स्थायी स्रोत बन कर उभरा है।

वर्तमान में मत्स्य क्षेत्र रोजगार और उद्यमिता का भी महत्वपूर्ण आधार बन चुका है। वर्ष 2023 से अब तक विभिन्न मत्स्य विकास योजनाओं के माध्यम से कुल 1,553 रोजगार अवसर सृजित किए गए। वर्ष 2023-24 में 385, वर्ष 2024-25 में 539 तथा वर्ष 2025-26 में युवाओं के लिए रोजगार एवं स्वरोजगार के 612 अवसर सृजित किए गए हैं। बायोफ्लॅाक तकनीक, रीसर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम (आरएएस), तालाब आधारित मत्स्य पालन तथा ट्राउट फार्मिंग जैसी आधुनिक पद्धतियों ने ग्रामीण युवाओं के लिए स्वरोजगार के नए द्वार खोले हैं। हैचरी, मत्स्य बीज उत्पादन, फीड मिलों तथा मछली विपणन के लिए आइस बॉक्स युक्त मोटरसाइकिलों और थ्री-व्हीलरों पर दिए जा रहे अनुदान से मत्स्य क्षेत्र को मजबूती मिली है।

जनवरी 2023 से मार्च 2026 के दौरान विभागीय ट्राउट फार्मों ने 235.16 लाख रुपए की 42.29 मीट्रिक टन ट्राउट का उत्पादन किया है। विभाग ने विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से 338.16 लाख रुपए का राजस्व अर्जित किया है। इस अवधि में निजी ट्राउट किसानों ने लगभग 333.40 करोड़ रुपए की 5,000.87 मीट्रिक टन ट्राउट का उत्पादन किया है। सरकार द्वारा जिला कुल्लू के पतलीकूहल में स्थापित कोल्ड वाटर आरएएस प्रणाली का संचालन किया जा रहा है, जिससे ट्राउट उत्पादन की प्रक्रिया और अधिक सुगम हुई है। इस तकनीक के माध्यम से ट्राउट तैयार करने में लगने वाला समय लगभग 14 महीने से घटकर 10 महीने रह गया है।

एक अन्य महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में वर्ष 2025-26 के दौरान हिमाचल के मत्स्य पालकों ने उत्तराखंड को 2.5 लाख आइड ओवा और 8.5 लाख रेनबो ट्राउट फ्राई उपलब्ध करवाई गई, जो राज्य की गुणवत्तापूर्ण मत्स्य बीज उत्पादन क्षमता को प्रदर्शित कर रहा है।

मत्स्य पालन क्षेत्र हजारों परिवारों के लिए आजीविका का सशक्त स्रोत बनकर उभरा है। वर्ष 2023-24 से 2025-26 के दौरान 18,649 मछुआरों को जलाशय मत्स्य पालन के माध्यम से पूर्णकालिक स्वरोजगार प्राप्त हुआ। वर्ष 2023-24 में 6,022, वर्ष 2024-25 में 6,318 तथा वर्ष 2025-26 में 6,309 मछुआरों को स्वरोजगार के अवसर प्राप्त हुए। इस अवधि में जलाशयों से 34.53 करोड़ रुपए की 2,246.26 मीट्रिक टन मछली का उत्पादन दर्ज किया गया। जलाशयों में मछली उत्पादन में निरंतर वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2023-24 में 566.03 मीट्रिक टन से बढ़कर 2025-26 में 818.02 मीट्रिक टन मछली उत्पादन दर्ज किया गया।

मत्स्य पालन क्षेत्र को विस्तार प्रदान करने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने वर्ष 2024-25 में मुख्यमंत्री कार्प मत्स्य पालन योजना प्रारंभ की। इस योजना के अंतर्गत सभी श्रेणियों के लाभार्थियों को समान रूप से 80 प्रतिशत अनुदान उपलब्ध करवाया जा रहा है। वर्ष 2024-25 में इस योजना के अंतर्गत 146 लाख रुपए की सब्सिडी वितरित की गई, जबकि 2025-26 में 48.57 लाख रुपए जारी किए गए। इस सहायता से 4.8963 हेक्टेयर क्षेत्र में नए मत्स्य तालाबों का निर्माण किया गया, जिससे ग्रामीण परिवारों की आय में वृद्धि हुई है।

राज्य सरकार ने मत्स्य पालन क्षेत्र को विस्तार प्रदान करने के साथ-साथ नवाचार, नई तकनीकों के उपयोग और मछुआरों के कल्याण की दिशा में भी अनेक कदम उठाए हैं। बायोफ्लॉक और आरएएस जैसी आधुनिक तकनीकों ने सीमित भूमि और जल संसाधनों वाले क्षेत्रों में भी मत्स्य पालन की संभावनाओं को बढ़ाया गया है। इसी क्रम में प्रदेश का पहला महाशीर संरक्षण कार्यक्रम शुरू किया गया है, जिसके अंतर्गत गोल्डन महाशीर के 40,000 से अधिक फिंगरलिंग पोंग जलाशय, गोबिंद सागर, पंडोह बांध तथा ब्यास नदी में डाले गए। सरकार के इस प्रयास के लिए मत्स्य विभाग को प्रतिष्ठित ‘‘स्कॉच गोल्ड अवार्ड-2025’’ से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त, सरकार द्वारा अमूर कार्प, एएचआर जयन्ती तथा अमृत कतला जैसी उन्नत प्रजातियों का विकास किया जा रहा है, इनकी वृद्धि दर और प्रजनन क्षमता पारंपरिक प्रजातियों की तुलना में 20 से 25 प्रतिशत अधिक है।

मछुआरों और मत्स्य पालकों के सामाजिक एवं आर्थिक सशक्तीकरण के लिए भी अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। सेविंग्स-कम-रिलीफ योजना के अंतर्गत 13,767 जलाशय मछुआरों को 619.52 लाख रुपए की सहायता प्रदान की गई। इसके अतिरिक्त, 42,000 से अधिक मछुआरों और मत्स्य पालकों को सामान्य दुर्घटना बीमा योजना के तहत सुरक्षा कवच उपलब्ध करवाया गया। वहीं 1,786 लाभार्थियों को किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) सुविधा से जोड़कर संस्थागत ऋण तक उनकी पहुंच सुनिश्चित की गई है।

राज्य सरकार ने जलाशयों में पकड़ी जाने वाली मछलियों पर लगने वाली रॉयल्टी को कम किया है। वर्ष 2025-26 में इसे 15 प्रतिशत से घटाकर 7.5 प्रतिशत किया गया और वर्ष 2026-27 में इसे मात्र 1 प्रतिशत कर दिया गया है। सरकार के इस ऐतिहासिक निर्णय से छः हजार से अधिक जलाशय मछुआरों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा और उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व में हिमाचल प्रदेश का मत्स्य क्षेत्र आज विकास की एक प्रेरक कहानी प्रस्तुत कर रहा है। प्रदेश सरकार द्वारा मत्स्य उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि, रोजगार सृजन, मछुआरों के कल्याण और जैव विविधता संरक्षण की दिशा में उठाए गए कदम न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहे हैं, बल्कि हिमाचल प्रदेश को देश में नीली क्रांति के एक सफल मॉडल के रूप में भी स्थापित कर रहे हैं।

 

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