विदेश मंत्री एस. जयशंकर चार दिवसीय दौरे के पहले चरण में मॉरीशस पहुंचे, जहां उन्होंने 9वें हिंद महासागर सम्मेलन में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्होंने क्षेत्रीय स्थिरता और सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया।
होर्मुज संकट के बीच साझा जिम्मेदारी पर जोर
होर्मुज जलडमरूमध्य और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच जयशंकर ने कहा कि मौजूदा समय में देशों को छोटी-छोटी सोच से ऊपर उठकर साझा जिम्मेदारी निभानी होगी। उन्होंने कहा कि मिलकर काम करने से ही एक स्वतंत्र, स्थिर और समृद्ध हिंद महासागर क्षेत्र सुनिश्चित किया जा सकता है।
भारत ‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ की भूमिका में
जयशंकर ने कहा कि भारत हिंद महासागर क्षेत्र में लगातार ‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ की भूमिका निभाता रहा है। चाहे श्रीलंका, मेडागास्कर या मोजाम्बिक में आपदा राहत हो या तेल रिसाव जैसी घटनाएं—भारत ने हर बार तेजी और भरोसे के साथ सहायता पहुंचाई है।
ऑपरेशन सागरबंधु का दिया उदाहरण
उन्होंने हालिया उदाहरण के तौर पर श्रीलंका में आए तूफान के बाद चलाए गए ‘ऑपरेशन सागरबंधु’ का जिक्र किया, जिसके तहत भारत ने बड़े पैमाने पर राहत कार्य और 450 मिलियन डॉलर का सहायता पैकेज प्रदान किया।
समुद्री चुनौतियों पर बढ़ती चिंता
जयशंकर ने कहा कि समुद्री क्षेत्र में पारंपरिक और गैर-पारंपरिक दोनों तरह की चुनौतियां बढ़ रही हैं। उन्होंने लाल सागर में शिपिंग बाधाओं का उदाहरण देते हुए कहा कि इन घटनाओं का व्यापक असर पूरे हिंद महासागर क्षेत्र पर पड़ता है।
अंतरराष्ट्रीय कानून और पारदर्शिता पर जोर
विदेश मंत्री ने कहा कि कोई भी देश अकेले समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता। इसके लिए साझा प्रतिबद्धता, सहयोग, पारदर्शिता और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान जरूरी है।
मजबूत संस्थागत नेटवर्क की जरूरत
उन्होंने कहा कि हिंद महासागर को ‘ग्लोबल कॉमन’ के रूप में देखना चाहिए, जहां जिम्मेदारियां और लाभ दोनों साझा हों। साथ ही इंडियन ओशन रिम एसोसिएशन और इन्फॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर-इंडियन ओशन रीजन जैसे संस्थानों की भूमिका को अहम बताया, जो समुद्री सुरक्षा और जानकारी साझा करने में मदद करते हैं।