आज के दौर में जहाँ स्मार्टफोन जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन चुका है, हिमाचल प्रदेश सरकार एक बड़ा साहसिक कदम उठाने जा रही है। देवभूमि के स्कूलों में अब किताबों की जगह मोबाइल की लाइट नहीं, बल्कि बच्चों का भविष्य चमकेगा। यह केवल एक प्रतिबंध नहीं है, बल्कि नई पीढ़ी को सोशल मीडिया के मायाजाल से निकालकर मैदान की धूल और रचनात्मकता से जोड़ने की एक मुहिम है।
मार्च से लागू होंगे कड़े नियम
हिमाचल प्रदेश के शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने स्पष्ट कर दिया है कि 1 मार्च से राज्य के शिक्षण संस्थानों में मोबाइल ले जाने पर पूर्ण पाबंदी होगी। इस निर्णय के पीछे मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की दूरगामी सोच है, जो बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और गिरते शैक्षणिक स्तर को लेकर चिंतित हैं।
सरकार जल्द ही इसके लिए विस्तृत गाइडलाइन (SOP) जारी करेगी ताकि नियमों का सख्ती से पालन हो सके। शिक्षा विभाग का मानना है कि मोबाइल के अत्यधिक उपयोग से छात्रों के विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
सेब उत्पादकों पर मंडराते संकट के बादल
शिक्षा के साथ-साथ शिक्षा मंत्री ने राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ यानी 'बागवानी' पर भी अपनी बात रखी। विदेशों से आने वाले सेब पर आयात शुल्क (Import Duty) कम होने से स्थानीय किसान संकट में हैं।
अमेरिका और न्यूजीलैंड जैसे देशों से आने वाला विदेशी सेब भारतीय बाजारों में जगह बना रहा है। हिमाचल के छोटे बागवान इस अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में पिछड़ सकते हैं, जिससे उनकी आजीविका पर सीधा असर पड़ेगा।
तिब्बती संस्थानों में भी 'डिजिटल सेंसरशिप' की सिफारिश
सिर्फ राज्य सरकार ही नहीं, बल्कि केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (CTA) भी नई पीढ़ी को तकनीक के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए लामबंद हो गया है। धर्मशाला में हुई एक उच्च स्तरीय बैठक में 16 वर्ष से कम आयु के छात्रों के लिए मोबाइल प्रतिबंधित करने की वकालत की गई।
शिक्षा परिषद के अध्यक्ष गेशे ताशी सेरिंग ने चेतावनी दी है कि सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव से तिब्बती भाषा और पहचान को खतरा है। तिब्बती प्रशासन अब ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय देशों की तर्ज पर सख्त कानून बनाने पर विचार कर रहा है। मठों और स्कूलों में छात्रों की घटती संख्या और आधुनिक उपकरणों के प्रति बढ़ता आकर्षण प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।