केंद्रीय मंत्रिपरिषद में बहुप्रतीक्षित फेरबदल की अटकलें अब अपने चरम पर हैं। गुरुवार 25 जून को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात के बाद यह माना जा रहा है कि अगले सप्ताह मोदी कैबिनेट का विस्तार हो सकता है। इस संभावित फेरबदल में सबसे ज्यादा चर्चा दो नामों की है- मेरठ से बीजेपी सांसद अरुण गोविल और पूर्व आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास।
टीवी सीरियल 'रामायण' में भगवान राम का किरदार निभाकर घर-घर में पहचान बनाने वाले अरुण गोविल को ऐसे समय में कैबिनेट में शामिल करने की चर्चा है, जब यूपी के अयोध्या में राम मंदिर के 'चंदा चोरी' का मुद्दा बुरी तरह गरमाया हुआ है। सियासी गलियारों में अब यह सवाल गूंज रहा है कि क्या यूपी विधानसभा चुनाव 2027 से ठीक पहले 'प्रभु राम' (अरुण गोविल) खुद अपने चंदे की चोरी का राजनीतिक डैमेज कंट्रोल करने आ रहे हैं?
अयोध्या का 'चंदा चोरी' विवाद: यूपी चुनाव से पहले बड़ी चुनौती
इस समय उत्तर प्रदेश की राजनीति राम मंदिर में दान और चढ़ावे की चोरी के मामले से तप रही है। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की शिकायत पर एसआईटी की जांच के बाद हाल ही में एफआईआर दर्ज की गई है। पुलिस ने 8 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। इनमें चंपत राय का पूर्व ड्राइवर (टिन्नू यादव), दान गिनने वाले कर्मचारी और एक रिटायर्ड बैंक कर्मचारी शामिल हैं।
पुलिस ने अब तक करीब 79.80 लाख रुपये भी बरामद किए हैं। एसआईटी जांच की आंच और विपक्ष के दबाव के बीच ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा को अपने पदों से इस्तीफा देना पड़ा है। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और आम आदमी पार्टी लगातार सरकार को घेर रहे हैं। विपक्ष इसे 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले एक बड़ा राजनीतिक हथियार बना रहा है।
अरुण गोविल का कैबिनेट में आना: डैमेज कंट्रोल या मास्टरस्ट्रोक?
उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में अयोध्या के चंदे में चोरी और भ्रष्टाचार के आरोपों से रामभक्तों के बीच जो गलत संदेश जा रहा है, उसे रोकने के लिए बीजेपी को एक बड़े और बेदाग 'चेहरे' की सख्त जरूरत है। मेरठ से सांसद अरुण गोविल की कैबिनेट में संभावित एंट्री को इसी कड़ी से जोड़कर देखा जा रहा है। अरुण गोविल भारतीय जनमानस में महज एक सांसद या अभिनेता नहीं हैं, बल्कि करोड़ों लोगों के लिए वह 'भगवान राम' का सजीव स्वरूप और अगाध श्रद्धा का केंद्र हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि गोविल की साफ-सुथरी और 'प्रभु राम' वाली छवि का इस्तेमाल पार्टी यूपी में डैमेज कंट्रोल के लिए कर सकती है। जनता के बीच यह नैरेटिव सेट करने की कोशिश होगी कि राम के काम में धांधली करने वालों का हिसाब खुद 'राम' के प्रतिनिधि करेंगे।
पश्चिमी यूपी से अवध तक: 2027 का सटीक सियासी समीकरण
गोविल को कैबिनेट में लाने की रणनीति सिर्फ अयोध्या के डैमेज कंट्रोल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से गहराई से जुड़े हैं। अरुण गोविल पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सबसे हॉट सीट 'मेरठ' से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे हैं। उन्हें मंत्री पद से नवाजने से एक तीर से दो निशाने लगेंगे- पहला, अवध (अयोध्या) क्षेत्र में रामभक्तों के आक्रोश पर मरहम लगेगा और दूसरा, पश्चिमी यूपी में भी पार्टी का समीकरण मजबूत होगा। पिछले चुनावों में विपक्षी गठबंधन (सपा-कांग्रेस) ने जिस तरह से बीजेपी के वोटबैंक में सेंध लगाई है, उसकी भरपाई के लिए गोविल जैसा 'पैन-यूपी' और सर्वमान्य हिंदुत्ववादी चेहरा पार्टी के लिए सबसे बड़ा तुरुप का पत्ता साबित हो सकता है।
विपक्षी दलों के लिए 'गोविल कार्ड' का विरोध करना होगा मुश्किल
समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी चंदा चोरी मामले को लेकर सरकार की घेराबंदी कर रही हैं। ऐसे में अरुण गोविल का कैबिनेट में आना विपक्ष के लिए एक बड़ी दुविधा पैदा कर सकता है। गोविल पर सीधे तौर पर कोई भी तीखा राजनीतिक या निजी हमला करना विपक्ष के लिए आसान नहीं होगा, क्योंकि इससे उनके 'राम' वाले स्वरूप से जुड़ी बहुसंख्यक वर्ग की भावनाएं आहत होने का जोखिम रहेगा। कुल मिलाकर, मोदी कैबिनेट में उनकी संभावित एंट्री केवल एक पद का बंटवारा नहीं, बल्कि यूपी चुनाव से पहले विपक्ष के हर तीखे वार का जवाब देने के लिए तैयार किया गया एक अचूक 'रामबाण' हो सकती है।
शक्तिकांत दास और अन्य बड़े बदलाव
अरुण गोविल के अलावा इस कैबिनेट फेरबदल में एक और अहम नाम पूर्व आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास का है। सूत्रों के मुताबिक, उन्हें कैबिनेट में पूर्ण मंत्री का दर्जा दिया जा सकता है, जो सरकार की आर्थिक नीतियों को नई दिशा देने का संकेत है।
यह फेरबदल इसलिए भी जरूरी हो गया है क्योंकि जॉर्ज कुरियन ने हाल ही में मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है, और रवनीत सिंह बिट्टू का उच्च सदन का कार्यकाल भी समाप्त हो चुका है। इसके अलावा कई मंत्रियों को उनके राज्यों में संगठन की जिम्मेदारी सौंपी गई है।