Tuesday, September 15, 2026
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साहित्य

इंजीनियर्स डे : राष्ट्र निर्माण से तकनीकी आत्मनिर्भरता तक भारत की नई उड़ान

15 सितंबर, 2026 02:41 PM

किसी देश की प्रगति को केवल आर्थिक वृद्धि, ऊंची इमारतों या आधुनिक शहरों से नहीं मापा जा सकता। विकास की वास्तविक पहचान उसकी तकनीकी क्षमता में होती है, जो सामाजिक समस्याओं को समझकर उनके व्यावहारिक समाधान तैयार करती है। सड़क, पुल, रेलवे, बांध, बिजलीघर, मोबाइल नेटवर्क, आधुनिक चिकित्सा उपकरण, उपग्रह, डिजिटल सेवाएं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अंतरिक्ष अभियान। इन सभी के पीछे इंजीनियरिंग और इंजीनियरों की महत्वपूर्ण भूमिका है। इंजीनियरिंग विज्ञान, गणित, तकनीक और रचनात्मक सोच को मानव जीवन की जरूरतों के अनुरूप उपयोगी समाधान में बदलती है। इसी कारण आधुनिक सभ्यता की लगभग हर बड़ी उपलब्धि में इसका योगदान दिखाई देता है।

भारत में प्रत्येक वर्ष 15 सितंबर को इंजीनियर्स डे महान अभियंता, प्रशासक और भारत रत्न मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जयंती पर मनाया जाता है। उनका जीवन तकनीकी दक्षता के साथ अनुशासन, ईमानदारी और राष्ट्र निर्माण की प्रेरणा देता है। आज भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष, सेमीकंडक्टर, हरित ऊर्जा और आधुनिक बुनियादी ढांचे में तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में इंजीनियर्स डे तकनीकी विकास को जनकल्याण और राष्ट्र निर्माण से जोड़ने की हमारी जिम्मेदारी को भी रेखांकित करता है।

इंजीनियर्स डे और एम. विश्वेश्वरैया की विरासत

15 सितंबर का दिन भारतीय इंजीनियरिंग परंपरा में विशेष महत्व रखता है। इसी दिन 1861 में एम. विश्वेश्वरैया का जन्म हुआ था। उन्होंने इंजीनियरिंग को केवल पेशे के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र सेवा के माध्यम के रूप में देखा। जल प्रबंधन और सिंचाई के क्षेत्र में उनके कार्य विशेष रूप से उल्लेखनीय रहे। उन्होंने ऐसी तकनीकी व्यवस्थाओं के विकास में योगदान दिया, जिनका उद्देश्य पानी का बेहतर उपयोग, सिंचाई की सुविधा और बाढ़ जैसी समस्याओं का प्रबंधन था। मैसूर क्षेत्र के विकास में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। कृष्णराज सागर बांध से जुड़े उनके कार्यों को भारत के जल संसाधन विकास के इतिहास में महत्वपूर्ण माना जाता है।

विश्वेश्वरैया की विशेषता केवल उनकी तकनीकी दक्षता नहीं थी। वे समय की पाबंदी, अनुशासन, कार्य के प्रति समर्पण और प्रशासनिक क्षमता के लिए भी प्रसिद्ध थे। उनका जीवन यह संदेश देता है कि तकनीकी ज्ञान तब अधिक उपयोगी बनता है, जब उसके साथ जिम्मेदारी और दूरदृष्टि जुड़ी हो। उनकी सोच में औद्योगिकीकरण और आधुनिक शिक्षा का भी विशेष महत्व था। वे मानते थे कि भारत को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए आधुनिक उद्योग, तकनीकी शिक्षा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देना आवश्यक है। इसलिए उनकी विरासत आज भी केवल इंजीनियरों तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्र निर्माण की व्यापक सोच से जुड़ी हुई है।

इंजीनियरिंग : सभ्यता के विकास की आधारशिला

मानव इतिहास पर नजर डालें तो इंजीनियरिंग का विकास सभ्यता के विकास के साथ-साथ हुआ है। पहिए का आविष्कार, सिंचाई की प्रारंभिक प्रणालियां, प्राचीन नगरों की जल निकासी व्यवस्था, भवन निर्माण और परिवहन के साधन ये सभी मानव की इंजीनियरिंग क्षमता के प्रारंभिक उदाहरण हैं। समय के साथ इंजीनियरिंग ने अनेक रूप धारण किए। सिविल, मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, केमिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर, एयरोस्पेस और बायोमेडिकल इंजीनियरिंग जैसे अनेक क्षेत्र विकसित हुए। आज इंजीनियरिंग किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। यह कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण, परिवहन, संचार, रक्षा और अंतरिक्ष तक फैल चुकी है। आधुनिक समाज में किसी व्यक्ति के दैनिक जीवन को देखें तो शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र मिले, जिसमें इंजीनियरिंग की भूमिका न हो। घर की बिजली से लेकर इंटरनेट तक, मेट्रो रेल से लेकर मोबाइल फोन तक और अस्पताल की जांच मशीनों से लेकर मौसम की भविष्यवाणी करने वाले उपग्रहों तक तकनीकी व्यवस्था हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है।

राष्ट्र निर्माण में इंजीनियरों की निर्णायक भूमिका

स्वतंत्रता के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक आधुनिक बुनियादी ढांचा तैयार करना था। उस समय देश को सिंचाई, बिजली, परिवहन, उद्योग और संचार के क्षेत्र में व्यापक निवेश और तकनीकी क्षमता की आवश्यकता थी। इंजीनियरों ने इन क्षेत्रों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बड़े बांधों और सिंचाई परियोजनाओं ने कृषि उत्पादन को बढ़ाने में मदद की। सड़कों और रेलवे के विस्तार ने दूर-दराज के क्षेत्रों को बाजारों और शहरों से जोड़ा। बिजली परियोजनाओं ने उद्योगों और घरेलू जीवन को ऊर्जा प्रदान की। बंदरगाहों और परिवहन प्रणालियों ने व्यापार को गति दी। समय के साथ भारत ने इंजीनियरिंग की अपनी क्षमता को और विस्तृत किया। परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष अनुसंधान, दूरसंचार और रक्षा तकनीक जैसे जटिल क्षेत्रों में देश ने अपनी क्षमताएं विकसित कीं। आज भारत में तैयार हो रहा विशाल डिजिटल और भौतिक बुनियादी ढांचा इसी लंबी तकनीकी यात्रा का परिणाम है।

डिजिटल भारत की नई इंजीनियरिंग शक्ति

21वीं सदी में इंजीनियरिंग का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। पहले इंजीनियरिंग का संबंध मुख्य रूप से मशीनों, भवनों, पुलों और औद्योगिक उत्पादन से जोड़ा जाता था। आज सॉफ्टवेयर, डेटा, नेटवर्क, क्लाउड कंप्यूटिंग, इंटरनेट ऑफ थिंग्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी इंजीनियरिंग के महत्वपूर्ण क्षेत्र बन चुके हैं। भारत ने डिजिटल तकनीक के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन सरकारी सेवाएं, डिजिटल पहचान और व्यापक इंटरनेट कनेक्टिविटी ने नागरिकों और सरकार के बीच संपर्क के तरीके को बदल दिया है। इस परिवर्तन के पीछे बड़ी संख्या में इंजीनियरों की भूमिका है। उन्होंने ऐसी प्रणालियां विकसित की हैं, जो करोड़ों लोगों तक सेवाएं पहुंचाने में सक्षम हैं। डिजिटल तकनीक ने वित्तीय सेवाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और प्रशासन को अधिक सुलभ बनाने में मदद की है। भविष्य में भारत की तकनीकी शक्ति केवल सॉफ्टवेयर सेवाओं तक सीमित नहीं रहेगी। सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण, साइबर सुरक्षा और उन्नत कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में क्षमता विकसित करना भी आवश्यक होगा। इन क्षेत्रों में इंजीनियरों की भूमिका निर्णायक होगी।

अंतरिक्ष से रक्षा तक भारतीय इंजीनियरों का योगदान

भारत की अंतरिक्ष यात्रा इंजीनियरिंग और वैज्ञानिक प्रतिभा का उल्लेखनीय उदाहरण है। सीमित संसाधनों से शुरुआत करने वाला भारत आज जटिल अंतरिक्ष अभियानों को सफलतापूर्वक संचालित करने की क्षमता रखता है। चंद्रयान और मंगलयान जैसे अभियानों ने भारतीय अंतरिक्ष तकनीक की क्षमता को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई। उपग्रहों का उपयोग संचार, मौसम पूर्वानुमान, कृषि, आपदा प्रबंधन, नेविगेशन और प्राकृतिक संसाधनों की निगरानी में किया जा रहा है। इन उपलब्धियों में वैज्ञानिकों के साथ इंजीनियरों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। रॉकेट के डिजाइन से लेकर प्रणोदन प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक्स, संचार, नियंत्रण प्रणाली और अंतरिक्ष यान की संरचना तक हर चरण में इंजीनियरिंग की आवश्यकता होती है। रक्षा क्षेत्र में भी स्वदेशी तकनीक का महत्व बढ़ रहा है। आधुनिक हथियार प्रणालियां, रडार, संचार प्रणाली, ड्रोन, मिसाइल और अन्य रक्षा उपकरण विकसित करने में इंजीनियरिंग विशेषज्ञता आवश्यक है। आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए इस क्षेत्र में स्वदेशी डिजाइन और उत्पादन क्षमता को मजबूत करना महत्वपूर्ण होगा।

जल, कृषि और ग्रामीण भारत के लिए इंजीनियरिंग

भारत की बड़ी आबादी आज भी कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ी है। ऐसे में इंजीनियरिंग का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य ग्रामीण समस्याओं के समाधान से भी जुड़ना चाहिए। सिंचाई व्यवस्था, जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, बाढ़ नियंत्रण और जल पुनर्चक्रण जैसी व्यवस्थाओं में इंजीनियरिंग की महत्वपूर्ण भूमिका है। जलवायु परिवर्तन के कारण कहीं अत्यधिक वर्षा और कहीं सूखे की स्थिति पैदा हो रही है। ऐसे समय में जल संसाधनों के वैज्ञानिक प्रबंधन की आवश्यकता और बढ़ जाती है। कृषि क्षेत्र में भी तकनीक तेजी से प्रवेश कर रही है। ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, ड्रोन, सेंसर आधारित खेती, मौसम संबंधी आंकड़े और स्मार्ट कृषि उपकरण किसानों की मदद कर सकते हैं। लेकिन तकनीक तभी सफल होगी, जब वह किसानों के लिए सस्ती, सरल और आसानी से उपलब्ध हो। ग्रामीण भारत में कम लागत वाली तकनीक का विकास इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश का तकनीकी विकास केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इंजीनियरिंग का वास्तविक सामाजिक प्रभाव तब दिखाई देगा, जब उसका लाभ गांवों और दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुंचेगा।

हरित विकास और पर्यावरण संरक्षण

आज दुनिया के सामने विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन और बढ़ता कचरा मानव समाज के लिए गंभीर प्रश्न बन चुके हैं। इन समस्याओं का समाधान भी तकनीक से जुड़ा हुआ है। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ऊर्जा दक्ष उपकरण, इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी तकनीक, ग्रीन बिल्डिंग और आधुनिक कचरा प्रबंधन प्रणालियां इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। भविष्य की इंजीनियरिंग ऐसी होनी चाहिए, जिसमें केवल यह न देखा जाए कि कोई परियोजना कितनी तेजी से और कितनी कम लागत में पूरी होगी, बल्कि यह भी देखा जाए कि उसका पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा। सतत विकास का अर्थ विकास को रोकना नहीं, बल्कि ऐसी तकनीक विकसित करना है, जिसमें वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताएं पूरी हों और भविष्य की पीढ़ियों के संसाधन सुरक्षित रहें। इस संतुलन को बनाने में इंजीनियरों की जिम्मेदारी बहुत बड़ी है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में बदलती इंजीनियरिंग

कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI ने इंजीनियरिंग की दुनिया को भी तेजी से प्रभावित किया है। मशीनें अब केवल निर्देशों का पालन नहीं कर रहीं, बल्कि बड़ी मात्रा में डेटा का विश्लेषण करके निर्णय लेने में सहायता कर रही हैं। AI का उपयोग विनिर्माण, स्वास्थ्य, कृषि, परिवहन, वित्त, मौसम विज्ञान और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में बढ़ रहा है। रोबोटिक्स और ऑटोमेशन उद्योगों में उत्पादन प्रक्रिया को बदल रहे हैं। लेकिन तकनीकी प्रगति के साथ नई चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। AI के कारण रोजगार के स्वरूप में बदलाव हो सकता है। डेटा की गोपनीयता, साइबर सुरक्षा, एल्गोरिदम में पक्षपात और तकनीक के दुरुपयोग जैसे प्रश्न भी महत्वपूर्ण हैं। इसलिए भविष्य के इंजीनियर को केवल तकनीकी कौशल वाला विशेषज्ञ होना पर्याप्त नहीं होगा। उसे नैतिकता, समाज और मानव मूल्यों की समझ भी रखनी होगी। तकनीक का उद्देश्य मनुष्य की क्षमता को बढ़ाना होना चाहिए, न कि मानव हितों की अनदेखी करना।

इंजीनियरिंग शिक्षा में बदलाव की जरूरत

भारत में हर वर्ष बड़ी संख्या में युवा इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त करते हैं। लेकिन बदलती तकनीकी दुनिया में केवल डिग्री पर्याप्त नहीं है। व्यावहारिक ज्ञान, समस्या समाधान की क्षमता, शोध, नवाचार और नई तकनीकों की समझ भी आवश्यक है। इंजीनियरिंग संस्थानों और उद्योगों के बीच बेहतर तालमेल विकसित करने की जरूरत है। विद्यार्थियों को वास्तविक समस्याओं पर काम करने का अवसर मिलना चाहिए। प्रयोगशालाओं, स्टार्टअप और शोध संस्थानों के साथ सहयोग बढ़ाया जाना चाहिए। इसके साथ ही भारतीय भाषाओं में तकनीकी ज्ञान की उपलब्धता बढ़ाना भी महत्वपूर्ण है। भाषा ज्ञान के रास्ते में बाधा नहीं, बल्कि ज्ञान को व्यापक समाज तक पहुंचाने का माध्यम बननी चाहिए। यदि तकनीकी शिक्षा सरल भारतीय भाषाओं में भी उपलब्ध होगी, तो अधिक युवा तकनीकी ज्ञान से जुड़ सकेंगे।

स्टार्टअप और नवाचार की नई संभावनाएं

भारत में स्टार्टअप संस्कृति ने इंजीनियरिंग के लिए नए अवसर पैदा किए हैं। आज युवा इंजीनियर केवल पारंपरिक नौकरियों तक सीमित नहीं हैं। वे नई कंपनियां शुरू कर रहे हैं और स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा, वित्त, ऊर्जा तथा तकनीक से जुड़ी समस्याओं के समाधान विकसित कर रहे हैं। डीप-टेक स्टार्टअप, रोबोटिक्स, ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक्स, अंतरिक्ष तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्र आने वाले वर्षों में बड़ी संभावनाएं प्रस्तुत कर सकते हैं। भारत को ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिसमें शोध से लेकर उत्पाद निर्माण तक की पूरी श्रृंखला मजबूत हो। विश्वविद्यालयों में विकसित तकनीक प्रयोगशालाओं से निकलकर बाजार और समाज तक पहुंचे इसके लिए उद्योग, सरकार और शिक्षण संस्थानों के बीच मजबूत साझेदारी आवश्यक है।

इंजीनियरिंग का मानवीय और नैतिक पक्ष

इंजीनियरिंग का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न केवल यह नहीं है कि हम क्या बना सकते हैं, बल्कि यह भी है कि हमें क्या बनाना चाहिए। तकनीक की शक्ति जितनी बढ़ रही है, उसकी जिम्मेदारी भी उतनी ही बढ़ रही है। एक पुल बनाते समय उसकी मजबूती और सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। किसी डिजिटल प्रणाली को तैयार करते समय नागरिकों के डेटा की सुरक्षा का ध्यान रखना आवश्यक है। AI प्रणाली विकसित करते समय उसके सामाजिक प्रभाव पर विचार करना जरूरी है। इसलिए इंजीनियरिंग में नैतिकता को केवल एक विषय के रूप में नहीं, बल्कि पेशेवर संस्कृति का हिस्सा बनाना होगा। इंजीनियर का निर्णय लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित कर सकता है। इसलिए तकनीकी दक्षता के साथ ईमानदारी, पारदर्शिता और सामाजिक जिम्मेदारी भी आवश्यक है।

विकसित भारत के निर्माण में इंजीनियरों की भूमिका

भारत के विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य में इंजीनियरों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। विकसित भारत का अर्थ केवल बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि मजबूत बुनियादी ढांचा, आधुनिक उद्योग, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा, बेहतर शिक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, डिजिटल सशक्तिकरण और पर्यावरणीय संतुलन भी है। इसके लिए भारत को केवल तकनीक का उपभोक्ता बनने के बजाय तकनीक का निर्माता बनना होगा। विदेशी तकनीक का उपयोग आवश्यक हो सकता है, लेकिन दीर्घकालीन आत्मनिर्भरता के लिए स्वदेशी अनुसंधान और डिजाइन क्षमता विकसित करनी होगी। सेमीकंडक्टर से लेकर अंतरिक्ष तकनीक और हरित ऊर्जा से लेकर AI तक भारत के सामने बड़े अवसर हैं। इन अवसरों को वास्तविक उपलब्धियों में बदलने के लिए प्रतिभाशाली इंजीनियरों, मजबूत शोध संस्थानों और अनुकूल नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र की जरूरत होगी।

भविष्य का इंजीनियर कैसा होगा?

भविष्य का इंजीनियर किसी एक विषय तक सीमित नहीं रहेगा। उसे विभिन्न क्षेत्रों का ज्ञान जोड़कर समस्याओं का समाधान करना होगा। उदाहरण के लिए, एक आधुनिक वाहन इंजीनियरिंग के साथ इलेक्ट्रॉनिक्स, सॉफ्टवेयर, AI और ऊर्जा भंडारण का भी ज्ञान मांगता है। क्वांटम कंप्यूटिंग, रोबोटिक्स, जैव-इंजीनियरिंग, अंतरिक्ष इंजीनियरिंग, नई ऊर्जा तकनीक और स्मार्ट बुनियादी ढांचा भविष्य के महत्वपूर्ण क्षेत्र होंगे। भविष्य के इंजीनियर की सबसे बड़ी ताकत उसकी सीखने और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढालने की क्षमता होगी। तकनीक बदलती रहेगी, लेकिन समस्या को समझने, समाधान खोजने और मानव हित को केंद्र में रखने की क्षमता हमेशा महत्वपूर्ण रहेगी।

इंजीनियर्स डे : तकनीकी शक्ति के सम्मान का अवसर

इंजीनियर्स डे केवल इंजीनियरों को शुभकामनाएं देने का दिन नहीं है। यह उस तकनीकी और रचनात्मक शक्ति को पहचानने का अवसर है, जिसने आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। एम. विश्वेश्वरैया की विरासत हमें बताती है कि इंजीनियरिंग का उद्देश्य केवल संरचनाएं और मशीनें बनाना नहीं, बल्कि समाज की आवश्यकताओं को समझकर उनका स्थायी समाधान खोजना है। भारत की विकास यात्रा में इंजीनियरों ने बांधों, सड़कों, रेलवे और बिजली परियोजनाओं से लेकर अंतरिक्ष, रक्षा, डिजिटल तकनीक और आधुनिक उद्योगों तक अपना योगदान दिया है। अब देश एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है, जहां कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, रोबोटिक्स, हरित ऊर्जा और अंतरिक्ष तकनीक विकास की दिशा तय करने वाले क्षेत्र बन रहे हैं। इस बदलते समय में इंजीनियरों की जिम्मेदारी पहले से अधिक बड़ी है। उन्हें ऐसी तकनीक विकसित करनी होगी जो भारत को आर्थिक और तकनीकी रूप से मजबूत बनाए, लेकिन साथ ही समाज के कमजोर और दूरस्थ वर्गों के जीवन को भी बेहतर करे। तकनीक का मूल्य तभी है, जब उसका लाभ व्यापक समाज तक पहुंचे।

आज आवश्यकता ऐसे इंजीनियरों की है, जो केवल मशीनों को नहीं, बल्कि समाज की जरूरतों को समझें; केवल समस्याओं की पहचान नहीं, बल्कि उनके व्यावहारिक समाधान तैयार करें; केवल नवाचार की दौड़ में आगे बढ़ने की कोशिश न करें, बल्कि उसके सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव को भी समझें। विश्वेश्वरैया की वैज्ञानिक सोच, अनुशासन और राष्ट्र सेवा की भावना से प्रेरणा लेते हुए भारत के इंजीनियर यदि नवाचार, आत्मनिर्भरता और मानवीय मूल्यों को साथ लेकर आगे बढ़ते हैं, तो वे विकसित भारत के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। वास्तव में इंजीनियरिंग का सबसे बड़ा उद्देश्य भविष्य को केवल अधिक आधुनिक बनाना नहीं, बल्कि अधिक सुरक्षित, टिकाऊ, समावेशी और मानवीय बनाना है। यही इंजीनियर्स डे का वास्तविक संदेश और इंजीनियरिंग की सबसे बड़ी सार्थकता है।

 

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