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NCERT की किताब में मनुस्मृति की एंट्री! महिलाओं के सम्मान पर दिया ये श्लोक; क्या है अर्थ?

26 जून, 2026 01:39 PM

नई दिल्ली: NCERT की कक्षा 9वीं की नई सामाजिक विज्ञान की किताब में वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति दर्शाने के लिए मनुस्मृति के श्लोक का जिक्र किया गया है। जानिए किताब में वर्ण और जाति व्यवस्था पर क्या लिखा है। NCERT की किताब में मनुस्मृति की एंट्री! महिलाओं के सम्मान पर दिया ये श्लोक; क्या है अर्थ? राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने कक्षा 9वीं की सामाजिक विज्ञान की नई किताब में कई अहम पहलुओं को शामिल किया है। किताब में वैदिक काल के दौरान महिलाओं के सम्मान और उनकी सामाजिक स्थिति को दर्शाने के लिए प्राचीन ग्रंथ 'मनुस्मृति' के एक श्लोक का जिक्र किया गया है। किताब यह भी बताती है कि समय बीतने के साथ महिलाओं की स्थिति में किस तरह के उतार-चढ़ाव आए।


वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति
किताब के अध्याय '1000 ईस्वी तक राज्य और समाज' में वैदिक काल को एक ऐसे दौर के रूप में वर्णित किया गया है, जहां महिलाओं को समाज में उच्च और सम्मानजनक स्थान प्राप्त था।

इस दौर में महिलाएं न सिर्फ विद्वतापूर्ण पठन-पाठन में हिस्सा लेती थीं, बल्कि कुछ विशेष संदर्भों में पुरुषों के साथ धार्मिक अनुष्ठान भी करती थीं और सार्वजनिक सभाओं में शामिल होती थीं। ऋग्वेद के कई भजनों (सूक्तों) की रचना का श्रेय अपाला, विश्ववारा, घोषा और लोपामुद्रा जैसी महान महिला ऋषियों को दिया गया है।

मनुस्मृति का हवाला
महिलाओं के प्रति सम्मान की यह परंपरा वैदिक काल के बाद के ग्रंथों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इसका उदाहरण देते हुए किताब में मनुस्मृति के श्लोक (3.56) को उद्धृत किया गया है-


"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥"
श्लोक की पहली पंक्ति का अर्थ है- जहां स्त्रियों की पूजा (सम्मान व आदर) होती है, वहां देवता निवास करते हैं।
दूसरी पंक्ति का अर्थ है- और जहां स्त्रियों का सम्मान नहीं होता, वहां किए गए सभी अच्छे कार्य निष्फल (व्यर्थ) हो जाते हैं।


समय के साथ महिलाओं की स्थिति में आई गिरावट
मनुस्मृति प्राचीन भारत में सामाजिक और कानूनी मानदंड तय करने वाला ग्रंथ रहा है और अक्सर जाति-लिंग के मुद्दों पर बहस के केंद्र में रहता है। इसके श्लोक के तुरंत बाद, किताब में यह स्पष्ट किया गया है कि महिलाओं की स्थिति हमेशा एक जैसी नहीं रही। सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियां बदलने के साथ महिलाओं की भूमिका में उतार-चढ़ाव आया और इसमें गिरावट भी आई। हालांकि, घर-गृहस्थी के प्रबंधन, कृषि, शिल्प और धार्मिक कार्यों में महिलाओं का निरंतर योगदान देखने को मिलता रहा।


बाद के कालखंड का उदाहरण देते हुए किताब बताती है कि गुप्त-वाकाटक काल के साहित्यिक कार्यों में कुशल और शिक्षित महिलाओं का चित्रण है। इतिहास में ऐसी रानियों का भी जिक्र है जिन्होंने शासन और धार्मिक संरक्षण में अहम भूमिका निभाई, जैसे प्रभावती गुप्त, जिन्होंने वाकाटक साम्राज्य में रीजेंट (संरक्षिका) के तौर पर शासन किया। संगम साहित्य में भी महिलाओं को समाज और अर्थव्यवस्था में सक्रिय भागीदार बताया गया है।
जन्म से नहीं, कर्म से तय होता था वर्ण
इसी अध्याय में वर्ण और जाति की अवधारणाओं का भी गहराई से विश्लेषण किया गया है। किताब के अनुसार, शुरुआती वैदिक समाज में सामाजिक पहचान जन्म से तय नहीं होती थी। यह पहचान जातीयता, उपसमूह, क्षेत्र, गांव, भाषा, व्यवसाय और सांस्कृतिक संबंधों जैसे कई मिले-जुले कारकों पर निर्भर करती थी।

एक ही परिवार के भीतर अलग-अलग पेशे होने का प्रमाण ऋग्वेद के एक भजन से दिया गया है: "मैं एक कवि हूं; मेरे पिता एक चिकित्सक (वैद्य) हैं; मेरी मां मक्का पीसने का काम करती हैं।"

चारों वर्ण मूल रूप से कार्यात्मक (फंक्शनल) थे, कठोर नहीं। वर्ण की अवधारणा एक ऐसी मूल्य प्रणाली पर आधारित थी जिसमें ज्ञान को सर्वोच्च दर्जा दिया गया था, उसके बाद राजनीतिक सत्ता और फिर संपत्ति का स्थान था।

बौद्ध ग्रंथ 'सुत्त निपात' का हवाला देते हुए किताब बताती है कि रुतबा जन्म पर नहीं बल्कि कर्मों पर निर्भर करता था: "कोई भी जन्म से अछूत नहीं होता, बल्कि अपने कर्मों से होता है। एक ब्राह्मण भी अपने कर्मों से ही ब्राह्मण होता है।"


जाति व्यवस्था का उदय कैसे हुआ?
किताब के मुताबिक, समय के साथ अलग-अलग समुदायों के बीच शादी-विवाह और क्षेत्रीय भिन्नताओं के कारण 'जाति' नाम की एक अलग सामाजिक संरचना उभर कर सामने आई।

जहां वर्णों की संख्या चार पर तय थी, वहीं जातियों की संख्या पर कोई प्रतिबंध नहीं था। जैसे-जैसे नए सामाजिक समूह और व्यवसाय विकसित हुए, जातियों की संख्या बढ़ती गई।

किताब में यह भी निष्कर्ष दिया गया है कि वर्ण और जाति हमेशा से कठोर सामाजिक श्रेणियां नहीं थीं। बाद के कालखंडों के शिलालेखों में अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि वाले शासकों और व्यावसायों में बदलाव के कई प्रमाण मिलते हैं।

 

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