सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को स्पष्ट किया है कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला को उसकी शादी के समय पिता द्वारा पति को दिए गए नकद और सोने के गहने वापस लेने का अधिकार है. यह अधिकार मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत सुरक्षित है. इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कलकत्ता हाईकोर्ट का फैसला पलट दिया.
हाईकोर्ट ने तलाकशुदा महिला के उस दावे को खारिज कर दिया था जिसमें उसने शादी के समय पति को पिता द्वारा दिए गए 7 लाख रुपये और सोने के गहनों (30 भौरी) की मांग की थी. महिला की शादी 2005 में हुई थी. 2009 में अलगाव और 2011 में तलाक के बाद उसने 1986 अधिनियम की धारा 3 के तहत 17.67 लाख रुपये की वसूली की मांग की थी, जिसमें नकद और सोने के गहने शामिल थे.
हाईकोर्ट ने दावा खारिज कर दिया था, क्योंकि विवाह रजिस्टर (काजी) और महिला के पिता के बयान में मामूली असंगति पाई गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विवाह रजिस्टर और काजी का बयान केवल संदेह के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवाह के समय दिए गए संपत्ति और गहने महिला के भविष्य की सुरक्षा के लिए हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 1986 अधिनियम की धारा 3(1)(d) के तहत तलाकशुदा मुस्लिम महिला को वह सब संपत्ति वापस लेने का अधिकार है जो शादी से पहले, शादी के समय या शादी के बाद उसके रिश्तेदारों, दोस्तों, पति या पति के रिश्तेदारों द्वारा दी गई हो. कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि यह कानून महिला की सम्मान और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करता है और इसे अनुच्छेद 21 के तहत महिला के मानव अधिकार और आत्मनिर्णय के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए.