Friday, October 02, 2026
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दुनिया

सऊदी परमाणु समझौते को लेकर अमेरिका में बहस तेज, सुरक्षा गारंटी भी नहीं मिटा सकी सांसदों की आशंकाएं

23 जुलाई, 2026 01:49 PM

अमेरिका और सऊदी अरब के बीच हुए नए परमाणु सहयोग समझौते को लेकर कांग्रेस और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों के बीच नई बहस छेड़ दी है। उनका कहना है कि यूरेनियम संवर्धन की क्षमता मिलने से भविष्य में परमाणु हथियारों के प्रसार का खतरा बढ़ सकता है। दरअसल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने सऊदी अरब के साथ एक अहम परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके तहत सऊदी अरब को भविष्य में अपने यहां यूरेनियम के संवर्धन की दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता मिलेगा, जबकि उसके परमाणु रिएक्टरों के निर्माण और आपूर्ति में अमेरिकी कंपनियों की प्रमुख भूमिका होगी।

समझौते से जुड़े सूत्रों के अनुसार, इसमें ऐसे सुरक्षा प्रावधान भी शामिल किए गए हैं जिनका उद्देश्य सऊदी अरब को हथियार बनाने के लिए यूरेनियम संवर्धन से रोकना है। इसके तहत यदि सऊदी अरब में संवर्धन की अनुमति दी जाती है, तो यह प्रक्रिया अमेरिकी कंपनियों के नियंत्रण में होगी और इस्तेमाल होने वाली तकनीक सऊदी अरब को हस्तांतरित नहीं की जाएगी।

हालांकि समझौते में एक विशेष छूट भी दी गई है। इसके तहत सऊदी अरब को उन कड़े अंतरराष्ट्रीय निरीक्षणों से छूट मिलेगी, जो सामान्यतः ऐसे परमाणु समझौतों में लागू होते हैं। इसकी जगह अमेरिकी विशेषज्ञ निरीक्षण करेंगे। यही प्रावधान कांग्रेस और परमाणु अप्रसार विशेषज्ञों की सबसे बड़ी चिंता का कारण बना हुआ है।

वाशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका के ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने कहा कि यह समझौता अमेरिका और सऊदी अरब के बीच आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करेगा। उन्होंने दावा किया कि समझौता परमाणु सुरक्षा और अप्रसार के उच्चतम मानकों का पालन करता है और इसमें अमेरिकी तकनीक और विशेषज्ञता का उपयोग किया जाएगा। यह समझौता अमेरिकी परमाणु ऊर्जा अधिनियम की धारा 123 के तहत किया गया है। अब इसे कांग्रेस के पास भेजा जाएगा, जहां सांसदों के पास इसकी समीक्षा के लिए 90 दिन का समय होगा। हालांकि यदि कांग्रेस इसे अस्वीकार भी करती है तो राष्ट्रपति वीटो का इस्तेमाल कर इसे लागू करा सकते हैं।

समझौते के अनुसार, दोनों देश अगले दो वर्षों तक यह अध्ययन करेंगे कि सऊदी अरब में यूरेनियम संवर्धन आर्थिक और तकनीकी रूप से कितना आवश्यक और व्यावहारिक है। वर्तमान में दुनिया में परमाणु ईंधन की आपूर्ति उपलब्ध है, लेकिन परमाणु ऊर्जा के बढ़ते वैश्विक विस्तार को देखते हुए भविष्य में इसकी मांग बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।

परमाणु अप्रसार विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह का समझौता खतरनाक मिसाल बन सकता है और अन्य देश भी इसी तरह की मांग कर सकते हैं। उनका तर्क है कि इससे परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने की वैश्विक व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है। इस समझौते को लेकर इजरायल में भी चिंता बढ़ गई है। पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट ने इसे इजरायल की सुरक्षा के लिए गंभीर रणनीतिक विफलता बताया। उन्होंने कहा कि इससे पश्चिम एशिया में परमाणु हथियारों की होड़ शुरू होने का खतरा बढ़ सकता है। इजरायली रक्षा विशेषज्ञों ने भी इसे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए चिंताजनक बताया है।

सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पहले ही सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि यदि ईरान परमाणु हथियार हासिल करता है तो सऊदी अरब भी उसी दिशा में कदम उठाएगा। यही कारण है कि इस समझौते को लेकर अमेरिका, इजरायल और वैश्विक सुरक्षा विशेषज्ञों के बीच गंभीर बहस छिड़ गई है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो. बाइडेन और बराक ओबामा के मध्य-पूर्व सलाहकार रह चुके रिचर्ड नेफ्यू ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु निरीक्षकों की भूमिका सीमित करना भविष्य के लिए खतरनाक मिसाल साबित हो सकता है।

नेफ्यू ने कहा कि अमेरिकी निरीक्षक तकनीकी रूप से सक्षम हैं, लेकिन केवल अमेरिकी निगरानी पर अन्य देशों का भरोसा बनना मुश्किल है। उनके मुताबिक, यदि ईरान जैसे देश यह कहें कि उनके परमाणु कार्यक्रम की जांच केवल रूस करेगा, तो अमेरिका इसे कभी स्वीकार नहीं करेगा। इसी तरह, यदि रूस कहे कि क्यूबा के परमाणु प्रतिष्ठानों की जांच वह स्वयं कर रहा है तो अमेरिका उस पर भी भरोसा नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक माहौल में केवल एक देश के निरीक्षण पर निर्भर रहना व्यावहारिक नहीं है।

इस समझौते का सबसे बड़ा लाभ अमेरिकी परमाणु ऊर्जा कंपनी वेस्टिंग हाउस को मिलने की संभावना है। हालांकि समझौते में कंपनी का नाम नहीं है, लेकिन इसमें यह प्रावधान है कि सऊदी अरब के परमाणु रिएक्टरों के निर्माण और आपूर्ति में अमेरिकी कंपनियों को प्राथमिकता दी जाएगी। इससे वेस्टिंग हाउस के एपी 1000 रिएक्टरों के इस्तेमाल की संभावना काफी बढ़ गई है। ये रिएक्टर लाखों घरों को बिजली उपलब्ध कराने में सक्षम हैं।

समझौते में यूरेनियम खनन, रिएक्टर निर्माण के उपकरण और अन्य आपूर्ति शृंखला से जुड़ी अमेरिकी कंपनियों को भी प्राथमिकता देने की बात कही गई है। हालांकि यदि जरूरत पड़ती है तो सऊदी अरब अन्य देशों से सामग्री, पुर्जे और विशेषज्ञता भी हासिल कर सकेगा। अमेरिकी कांग्रेस में भी समझौते का विरोध शुरू हो गया है। कैलिफोर्निया से डेमोक्रेट सांसद ब्रैड शेरमन ने प्रतिनिधि सभा की विदेश मामलों की समिति की बैठक में कहा कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी कभी अमेरिकी तकनीक से शुरू हुआ था। उन्होंने सवाल उठाया कि यह नहीं कहा जा सकता कि अगले 10 वर्षों में सऊदी अरब की सत्ता किसके हाथ में होगी।

शेरमन ने कहा, “आज अमेरिका ईरान के यूरेनियम संवर्धन और पुनर्प्रसंस्करण कार्यक्रम का विरोध कर रहा है, लेकिन दूसरी ओर सऊदी अरब को उसी दिशा में आगे बढ़ने की अनुमति दे रहा है। दोनों मामलों में फर्क सिर्फ इतना दिखता है कि इस बार अमेरिकी कंपनियों को आर्थिक लाभ मिलेगा।”

उन्होंने यह भी याद दिलाया कि मौजूदा विदेश मंत्री मार्को रुबियो सीनेटर रहते हुए “नो न्यूक्लियर वेपन्स फॉर सऊदी अरेबिया एक्ट” के सह-प्रायोजक थे। इस प्रस्ताव का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि सऊदी अरब के साथ किसी भी परमाणु समझौते को लागू करने से पहले कांग्रेस की स्पष्ट मंजूरी आवश्यक हो। वहीं, फिलीपींस दौरे पर पत्रकारों से बातचीत में विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने समझौते पर विस्तार से टिप्पणी करने से इनकार किया। उन्होंने केवल इतना कहा कि अमेरिका ऐसा कोई भी समझौता नहीं करेगा, जिससे परमाणु हथियारों के प्रसार का खतरा पैदा हो।

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