केंद्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट कार्य मंत्री निर्मला सीतारमण ने बुधवार को नई दिल्ली से आयोजित ग्लोबल कन्वर्जेंस फॉर ग्रोथ समिट की वर्चुअल बैठक में हिस्सा लिया और कहा कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में संघर्षों और अनिश्चितताओं का सबसे अधिक असर विकासशील देशों तथा वैश्विक दक्षिण पर पड़ता है, इसलिए समन्वित वैश्विक कार्रवाई की आवश्यकता है।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की अध्यक्षता में आयोजित इस शिखर सम्मेलन में जी-7 देशों, भारत, ब्राजील, चीन, केन्या, दक्षिण कोरिया और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के शीर्ष नेताओं ने भाग लिया।
भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए निर्मला सीतारमण ने कहा, “आज की परस्पर जुड़ी दुनिया में समृद्धि और चुनौतियां साझा हैं, लेकिन संघर्षों और अनिश्चितताओं के परिणाम विकासशील देशों और वैश्विक दक्षिण पर असमान रूप से पड़ते हैं। यह स्थिति समन्वित वैश्विक कार्रवाई की मांग करती है। हमें मजबूत बहुपक्षीय सहयोग के माध्यम से लचीली अर्थव्यवस्थाओं का निर्माण, सतत विकास को गति और समावेशी विकास सुनिश्चित करना होगा।”
वैश्विक असंतुलन के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि सभी असंतुलन एक जैसे नहीं होते। कुछ असंतुलन जनसांख्यिकी, विकास के स्तर, संसाधनों की उपलब्धता और आर्थिक संरचनाओं में अंतर के कारण भी उत्पन्न होते हैं।
उन्होंने कहा कि ध्यान अत्यधिक और लगातार बने रहने वाले असंतुलनों पर होना चाहिए, जबकि यह भी स्वीकार करना होगा कि विभिन्न देशों की घरेलू आवश्यकताओं का स्तर अलग-अलग है।
वैश्विक दक्षिण की ओर से अपनी बात रखते हुए वित्त मंत्री ने कहा, “इन असंतुलनों को दूर करने का बोझ उन देशों पर नहीं पड़ना चाहिए जो इनके मूल कारण नहीं हैं। भारत सहित कई विकासशील अर्थव्यवस्थाएं इन वैश्विक असंतुलनों की उत्पत्ति और प्रसार में सीमित भूमिका रखती हैं, लेकिन उनके प्रभावों का सामना करती हैं।”
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत की आर्थिक प्रगति का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ‘रिफॉर्म, परफॉर्म और ट्रांसफॉर्म’ के मंत्र के साथ भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है।
उन्होंने कहा, “भारत की वृद्धि मुख्य रूप से घरेलू मांग पर आधारित है और विनिमय दर बाजार आधारित है। भारत दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है तथा मध्यम अवधि में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर लगभग 7 प्रतिशत रहने का अनुमान है।”
निर्मला सीतारमण ने बहुपक्षीय संस्थानों में विश्वास मजबूत करने और उन्हें विकासशील देशों की जरूरतों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने कहा कि बहुपक्षीय विकास बैंकों को अधिक प्रभावी, प्रतिनिधित्वपूर्ण और वित्तीय रूप से सक्षम बनाया जाना चाहिए ताकि वे विकासशील देशों और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की जरूरतों को बेहतर ढंग से पूरा कर सकें।
वित्त मंत्री ने कहा कि हालिया वैश्विक घटनाक्रमों ने लचीली, विविधीकृत और भौगोलिक रूप से संतुलित आपूर्ति श्रृंखलाओं के महत्व को रेखांकित किया है, विशेषकर महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में।
उन्होंने कहा कि परिपत्र अर्थव्यवस्था, पुनर्चक्रण और शहरी खनन जैसे उपाय संसाधनों की आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियों का समाधान करने में मददगार हो सकते हैं।
अपने संबोधन के समापन में उन्होंने कहा कि भारत सभी साझेदार देशों के साथ मिलकर अधिक लचीली, समावेशी और समृद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था के निर्माण तथा साझा विकास के लिए साझा समाधान विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध है।