चंडीगढ़ : सांसद दीपेन्द्र हुड्डा ने देश में बेकाबू हो चुकी महंगाई के बीच चीनी की कीमतों में अचानक आए उछाल को केंद्र सरकार की गलत नीतियों और कॉरपोरेट-परस्त प्राथमिकताओं नतीजा बताया। उन्होंने कहा कि एथेनॉल नीति की आड़ में आम जनता की जेब पर खुला डाका डाला जा रहा है। पिछले एक महीने में खुदरा बाजार में चीनी की कीमतें ₹45 प्रति किलो से सीधे ₹65 प्रति किलो तक पहुंच चुकी हैं—यानी सीधे 44% से अधिक की वृद्धि हो चुकी है।
बीजेपी सरकार की गलत नीतियों ने चीनी का स्वाद कड़वा कर दिया है। यह कोई स्वाभाविक बाजार उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि एथेनॉल बलेंडिंग के नाम पर तैयार किया गया नीतिगत संकट है। केंद्र सरकार की गलत नीतियों के चलते आम लोगों पर महंगाई की तिहरी मार पड़ रही है। मिलावटी और महंगा पेट्रोल, गाड़ियों के मेंटेनेंस पर बढ़ा खर्च और अब महंगी चीनी।
उन्होंने कहा कि बीजेपी सरकार ने पहले दावा किया कि गन्ने से एथेनॉल बनाएंगे और पेट्रोल सस्ता करेंगे। लेकिन पेट्रोल तो सस्ता हुआ नहीं उलटे लोगों की गाड़ियां कबाड़ में बदलनी शुरू हो गई। और चीनी भी 40% महंगी हो गई। जो पेट्रोल पहले 94 रुपये/ लीटर में मिल रहा था वो अब 102 रुपये के आस पास मिल रहा है। पेट्रोल में 20 प्रतिशत की मिलावट के बावजूद सरकार ने पेट्रोल के दाम में एक रुपये की छूट नहीं दी।
वहीं, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम में कमी का भी कोई फायदा देश के नागरिकों को नहीं दिया। देश में चीनी की किल्लत होने से इसके दाम ₹45 से बढ़कर ₹65/किलो के आस पास हो गए हैं। देश में चीनी की कमी से एक्सपोर्ट पर बैन लगा और हैरानी की बात ये है कि जो भारत कल तक दुनिया को चीनी बेचता था, वो आज इंपोर्ट करने की नौबत पर पहुँच गया है।
वहीं, इथेनॉल वाले मिलावटी पेट्रोल से वाहनों का माइलेज गिर रहा है और वाहनों के मेंटेनेंस पर खर्च बढ़ रहा है। माइलेज कम होने से उपभोक्ता को अधिक बार पेट्रोल भरवाना पड़ेगा और मेंटेनेंस का मासिक खर्च भी अधिक हो रहा है। इथेनॉल मिश्रित E20 के उपयोग से इंजन, रबर पाइप, फ्यूल सिस्टम और माइलेज पर विपरीत प्रभाव पड़ने से सबसे ज्यादा वाहन मालिक परेशान हैं। Ethanol Policy का फायदा आखिर किसको मिल रहा है? क्योंकि इसका नुकसान तो देश के हर नागरिक को उठाना पड़ रहा है।
दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) ने भी स्वीकार कर लिया है कि E20 पेट्रोल देश के 8 करोड़ पुराने वाहनों पर भारी पड़ रहा है। बिना तैयारी के थोपी गई इस नीति से जनता की गाड़ियां बर्बाद हो रही हैं और जेब पर डाका डाला जा रहा है। गन्ने और खाद्यान्नों (चावल व मक्का) से बड़े पैमाने पर एथेनॉल बनाने से देश की खाद्य सुरक्षा और घरेलू कीमतों पर असर पड़ सकता है। जब फसलों को बड़े पैमाने पर बायोफ्यूल की तरफ मोड़ा जाता है, तो चीनी और खाद्यान्नों की घरेलू आपूर्ति घटती है, जिससे खुदरा महंगाई दर बढ़ती है। गन्ना और धान दोनों ही अधिक पानी की खपत वाली फसलें हैं।
एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने के लिए इन फसलों की खेती को बढ़ावा देना भूजल स्तर और दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता के लिए चिंता का विषय है। दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि क्या सरकार का मकसद सिर्फ चंद उद्योगपतियों की तिजोरी भरना है? उन्होंने मांग करी कि BJP सरकार अपनी नाकामी स्वीकार करे और E20 नीति को तुरंत रद्द करे।
उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने के रस और बी-हेवी शीरे के अनियंत्रित उपयोग की छूट दी। चालू सीजन में लाखों मीट्रिक टन चीनी को सीधे डिस्टिलरियों की ओर मोड़ दिया गया, जिससे घरेलू खुदरा बाजार में चीनी की आपूर्ति का भारी संकट खड़ा हो गया। चीनी मिल मालिकों को एथेनॉल के रूप में प्रति लीटर भारी सब्सिडी और सुनिश्चित मुनाफा दिया जा रहा है, जबकि आम नागरिक और छोटे व्यापारी ₹65 प्रति किलो चीनी खरीदने को मजबूर हैं। उन्होंने कहा कि एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के अनियंत्रित डायवर्जन की तत्काल समीक्षा हो और जब तक खुदरा कीमतें नियंत्रित न हों, तब तक घरेलू आपूर्ति को प्राथमिकता दी जाए।