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नेपाल में बंदरों के आतंक से परेशान नगरपालिका ने लिया अजीबोगरीब फैसला!

13 मई, 2026 01:32 PM

काठमांडू । बंदरों ने नेपाल के कई पहाड़ी क्षेत्रों में इस कदर तबाही मचाई है कि स्थानीय सरकार को एक अजीबोगरीब फैसला करना पड़ा। बंदरों के आतंक से निपटने के लिए एक दिन के सार्वजनिक अवकाश की घोषणा कर दी गई है। ये लालिगुरास नगरपालिका ने लिया है। इस दिन इलाके के लोग सामूहिक तौर पर बंदरों को खेतों और बस्तियों से भगाने का काम करेंगे।

लालिगुरास नगरपालिका तेहरथुम जिले की है। एक दिन की छुट्टी जेष्ठ (1), यानी 15 मई को, पूरे क्षेत्र में सार्वजनिक अवकाश घोषित की गई है, ताकि स्थानीय भाषा में “रातो बांदर” कहलाने वाले "रीसस मकाक" बंदरों के विरुद्ध ऑपरेशन चलाया जा सके। ये बंदर फसलों और सब्जियों को लगातार नुकसान पहुंचा रहे हैं।

दरअसल, हुड़दंगी बंदरों का झुंड मक्का, आलू, कोदो, फल और सब्जियों को आए दिन नष्ट कर रहा है। बंदरों की इस हरकत से किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि किसान रातभर खेतों की रखवाली करने को मजबूर हैं, जबकि कई स्कूली बच्चे फसलों की सुरक्षा के लिए पढ़ाई छोड़ रहे हैं।

मेयर अर्जुन माबुहांग के हस्ताक्षर से जारी सूचना में कहा गया कि बंदरों की समस्या को अक्सर मामूली समझा जाता है, लेकिन इसने ग्रामीण किसानों की आजीविका पर गंभीर असर डाला है।

सूचना में कहा गया, "किसान अपनी कृषि उपज बचाने के लिए पूरी रात जागकर खेतों की रखवाली करने को मजबूर हैं। इसका असर न केवल उनकी आर्थिक स्थिति पर पड़ा है, बल्कि बच्चों की शिक्षा और परिवारों के दैनिक जीवन पर भी पड़ा है।"

नगरपालिका ने बताया कि 15 और 16 मई को दो दिवसीय अभियान चलाकर बंदरों को नगरपालिका की सीमा से बाहर खदेड़ा जाएगा। किसानों, जनप्रतिनिधियों, कर्मचारियों और स्थानीय निवासियों से वार्ड कार्यालयों की ओर से तय किए गए स्थानों और निश्चित समय पर भाग लेने का आग्रह किया गया है।

मेयर माबुहांग ने कहा, “यह समस्या सामान्य लग सकती है, लेकिन इसने किसानों की आजीविका पर नकारात्मक असर डाला है। बंदर ग्रामीणों के उगाए मक्का, आलू, कोदो, फल और सब्जियों को नष्ट कर रहे हैं।”

नगरपालिका ने बंदरों से अधिक प्रभावित इलाकों में देखरेख करने वाले कर्मियों की तैनाती और अस्थायी चौकियां भी बनाई हैं। अधिकारियों के अनुसार, वार्ड-8 के मेघा, वार्ड-6 और 8 की सीमा पर स्थित नागेश्वरी और वार्ड-5 के सिंहाथाप में बंदर गश्ती दल तैनात किए गए हैं। फिलहाल चार कर्मचारी बस्तियों और खेतों से बंदरों को भगाने का काम कर रहे हैं।

माबुहांग ने कहा कि जब उनके कार्यकाल की शुरुआत में बंदरों को नियंत्रित करने के लिए कर्मचारियों की तैनाती की गई थी, तब कई लोगों ने इसका मजाक उड़ाया था। उन्होंने कहा, “उस समय लोगों ने इसे सामान्य समस्या माना, लेकिन अब किसान निराश हैं।”

उन्होंने संघीय सरकार से बंदरों की समस्या को "राष्ट्रीय मुद्दा मानते हुए दीर्घकालिक समाधान लागू करने" की अपील की।

माबुहांग ने कहा, “केवल स्थानीय सरकारों के लिए इस समस्या का समाधान संभव नहीं है। कृषि उत्पादन की रक्षा और किसानों को राहत देने के लिए संघीय सरकार को ठोस नीतियां और कार्यक्रम लाने होंगे।”

नगरपालिका सामुदायिक जंगलों में अमरूद और नाशपाती जैसे फलदार पेड़ लगाने की योजना भी बना रही है, ताकि जंगलों में ही बंदरों के लिए भोजन उपलब्ध हो सके और वे बस्तियों और खेतों में कम आएं।

हाल के वर्षों में नेपाल के पहाड़ी जिलों में फसलों पर बंदरों के हमले बड़ी समस्या बन गए हैं। किसानों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।

अधिकारियों और समुदायों ने पारंपरिक डराने के तरीकों से लेकर तकनीकी उपायों और नसबंदी अभियानों तक कई प्रयास किए, लेकिन सफलता सीमित रही।

द काठमांडू पोस्ट के अनुसार, 2024 में दिक्तेल रुपाकोट मझुवागढ़ी नगरपालिका के मेयर तीर्थ राज भट्टराई ने काठमांडू में भूख हड़ताल कर बंदरों और अन्य वन्यजीवों के प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय नीति की मांग की थी।

इसके बावजूद सरकार अब तक बंदरों के आतंक को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी उपाय नहीं ढूंढ पाई है।

गंडकी प्रांतीय उद्योग, पर्यटन, वन और पर्यावरण मंत्रालय के सहयोग से किए गए एक अध्ययन में सख्त उपायों की सिफारिश नहीं की गई, क्योंकि हिंदू धर्म में बंदरों का धार्मिक महत्व है और उन्हें भगवान हनुमान का रूप मानकर पूजा जाता है। अध्ययन में यह भी कहा गया कि नसबंदी और पकड़ने जैसे उपाय बंदरों की आबादी को प्रभावी ढंग से नियंत्रित नहीं कर पाएंगे।

नेपाल में बंदरों की तीन प्रजातियां रीसस मकाक, असमिया बंदर और हनुमान लंगूर पाई जाती हैं।

नेपाल वन्य जीव और वनस्पतियों की संकटग्रस्त प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर प्रतिबंध लगाने वाले कन्वेंशन (सीआईटीईएस) का भी हिस्सा है। राष्ट्रीय कानूनों के तहत सरकार की अनुमति के बिना संरक्षित वन्यजीवों के निर्यात पर रोक है। दोषी पाए जाने पर 5 से 15 वर्ष तक की जेल या 5 लाख से 10 लाख नेपाली रुपये तक का जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं।

राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम में रीसस बंदर को संरक्षित पशुओं की सूची में शामिल किया गया है, इसलिए सरकारी अनुमति के बिना इसका निर्यात प्रतिबंधित है। हालांकि, अधिनियम में उन संरक्षित जानवरों को नियंत्रित करने के उपायों का जिक्र नहीं है जो लोगों और कृषि उत्पादन के लिए खतरा बनते हैं। अधिकारियों ने "मंकी पार्क" स्थापित करने का सुझाव भी दिया है।

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