सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को संपत्ति विवाद के एक मामले में सुनवाई करते हुए एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि कोई भी शख्स अपनी भतीजी के पति को 'घरदामाद' मानकर संपत्ति का अधिकार नहीं दे सकता, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि समाज में ऐसी कोई प्रथा है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिस्वर सिंह की पीठ ने झारखंड के उरांव आदिवासी समुदाय से जुड़े एक संपत्ति विवाद में यह फैसला सुनाया। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत और झारखंड हाईकोर्ट के फैसलों को भी पलट दिया। निचली अदालतों ने बिना किसी पुख्ता सबूत के संपत्ति पर अधिकार के दावे को स्वीकार कर लिया था।
क्या है पूरा मामला?
विवाद झारखंड के एक उरांव आदिवासी परिवार की पैतृक संपत्ति को लेकर शुरू हुआ था। पुनाई उरांव नाम के व्यक्ति की तरफ से दावा किया गया कि उसके पत्नी के चाचा लेदुरा उरांव ने उसे 'घरदामाद' के रूप में स्वीकार किया था, क्योंकि लेदुरा उरांव की अपनी कोई संतान नहीं थी। इसी आधार पर वे संपत्ति के उत्तराधिकार का दावा कर रहे थे। हालांकि एक दूसरे भाई के बेटे बेजला उरांव ने इस दावे को अदालत में चुनौती दी थी। बेजला उरांव ने दावा किया कि चाचा लेदुरा और भोउला की मृत्यु के बाद वे परिवार के निकटतम पुरुष उत्तराधिकारी हैं इसलिए पैतृक संपत्ति पर कानूनी रूप से उनका ही अधिकार बनता है। उनका कहना था कि उरांव समुदाय की प्रथा में ऐसी किसी परंपरा ही नहीं है कि कोई चाचा अपनी भतीजी के पति को घरदामाद बनाकर संपत्ति सौंप दे।
क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कस्टमरी लॉ यानी परंपरागत कानून के बुनियादी सिद्धांतों पर जोर डालते हुए कहा कि जो व्यक्ति किसी विशेष परंपरा या प्रथा का दावा करता है, उसे साबित करने की पूरी जिम्मेदारी भी उसी की होती है। केवल यह कह देना काफी नहीं है कि विपक्षी दल इस प्रथा के खिलाफ कुछ साबित नहीं कर पाया। जस्टिस संजय करोल की अगुवाई वाली पीठ ने पाया कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों से यह तो साबित होता है कि एक घरदामाद को अपने 'ससुर' की संपत्ति में तो अधिकार मिल सकता है, लेकिन ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया जिससे यह पता चले कि यह नियम चाचा पर भी लागू होता है।
अदालत ने आगे कहा कि किसी भी प्रथा को कानूनन मान्यता देने के लिए गवाहों और सबूतों के जरिए यह साबित करना होगा कि वह प्रथा समाज में लंबे समय से लगातार उपयोग और अभ्यास में है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “यह कहीं भी स्थापित नहीं हुआ है कि कानून के तहत कोई चाचा अपनी भतीजी के पति को अपने घरदामाद के रूप में स्वीकार कर सकता है।”
सुप्रीम कोर्ट ने सबूतों और उरांव समुदाय के कानूनों का आकलन करने के बाद याचिकाकर्ता बेजला उरांव की अपील को स्वीकार कर लिया। अदालत ने फैसला सुनाया कि ससुर की संपत्ति पर घरदामाद के अधिकार की मान्यता की प्रथा के अलावा, बचाव पक्ष किसी भी अन्य प्रथा को साबित नहीं कर पाया। ऐसी स्थिति में परिवार का जो भी सबसे करीबी पुरुष वंशज होगा, वही उस पैतृक संपत्ति का असली उत्तराधिकारी माना जाएगा।