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चंडीगढ़

किताब उत्सव के तीसरे दिन हुआ विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन

13 फ़रवरी, 2023 09:39 AM

चंडीगढ़पंजाब कला भवन, चंडीगढ़ में राजकमल प्रकाशन द्वारा आयोजित किताब उत्सव के तीसरे दिन विभिन्न सत्रों का आयोजन हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत दोपहर 12:00 बजे से हुई जिसके पहले सत्र में अलग-अलग विद्यालयों के छात्र-छात्राओं द्वारा सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी गईं। इस दौरान पंजाबी, हरयाणवी और हिमाचल क्षेत्र के लोक नृत्यों की प्रस्तुति हुई। इसके बाद विद्यार्थियों को प्रमाण-पत्र और पुस्तकें भेंट कर उनका उत्साहवर्धन किया गया। अगले सत्र में 'डिजिटल युग में शब्द : दृश्य और किताब' विषय पर बातचीत की गई। इस सत्र की अध्यक्षता पी.के. दास ने की। वहीं गुरमीत, भवनीत भट्टी और नवदीप कौर बतौर वक्ता मौजूद रहे और राजीव रंजन सत्र के सूत्रधार की भूमिका में रहे।

 

इस दौरान  पी.के. दास ने कहा कि– "वर्तमान समय में हम डिजिटलीकरण को रोक नहीं सकते। अब हमारे पास दो विकल्प है एक इससे लड़ें और दूसरा इससे जुड़ें। इनमें से वक्त की जरूरत के हिसाब से डिजिटलीकरण के फायदों को देखकर उससे जुड़ना बेहतर होगा।" आगे उन्होंने भाषा पर संकट के संदर्भ में बोलते हुए कहा कि– "लिपि और भाषा दोनों अलग है। साहित्य लेखन के लिए लिपि की अनिवार्यता नहीं होती। उसकी रचना बिना लिपि के भी हो सकती है। शुरुआत में तीन वेदों की रचना इसी प्रकार बिना लिपि के हुई थी। लिपि तो उसके बाद आईं थी।"

 

वहीं गुरमीत ने कहा कि– "हमारे विकास की यात्रा में लेखन के माध्यम बदले है लेकिन शब्दों का महत्व कम नहीं हुआ है। डिजिटल युग ने हमारे जीवन में बहुत परिवर्तन लाए हैं। हमें डिजिटलीकरण से लड़ना नहीं है इसके बीच रहकर किताबों के लिए जगह बनाए रखना है। अब किताबें पढ़ने के साथ-साथ सुनी भी जाती है। इसके अलावा जिन्हें हम सामने से नहीं सुन सकते उन्हें विभिन्न डिजिटल दृश्य माध्यमों से देख-सुन सकते हैं। इसलिए हमें डिजिटल माध्यमों का भी लाभ उठाना चाहिए। साथ ही, भाषा को लेकर हमें ज्यादा सजग रहने की जरूरत है। हमें उसके स्वरूप को बनाए रखना है।" इसके बाद भवनीत भट्टी ने कहा कि– "चीजों के रूप बदलते हैं, माध्यम बदलते हैं लेकिन उनकी ट्रेडिशनल वैल्यू उतनी ही रहती है। डिजिटल युग में चीजों को एक्सेस करना हमारे लिए आसान हो गया है। अब एक ही प्लेटफॉर्म के जरिए हम किताब खरीद सकते हैं, उसके रिव्यु देख सकते हैं और फीडबैक भी दे सकते हैं। इस इंटीग्रेशन के जरिए हमें एक ही चीज के बारे में खोज करने पर उससे जुड़ी कई चीजें देखने को मिल जाती है। यह भी डिजिटलीकरण का एक फायदा है।

 

 

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने भी पढ़ने को आसान बनाया है।" आगे उन्होंने क्षेत्रीय भाषाओं के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा– "डिजिटल युग में भी आगे बढ़ने के लिए आपको अपनी रीजनल लैंग्वेज को साथ लेकर चलना पड़ेगा। हमें डिजिटल और ट्रेडिशनल माध्यमों के बीच एक बैलेंस बनाकर चलना होगा।" वहीं नवदीप कौर ने डिजिटलीकरण से उभरी चुनौतियों का सामना करने के लिए रंगमंच के महत्व को बताया। उन्होंने कहा– "आज के युग में डिजिटलीकरण जरूरी है। उसके कई फायदे हैं लेकिन इससे एक चुनौती भी सामने आती है। और इस संकट का समाधान अगर कहीं है तो वह है रंगमंच। क्योंकि यह एक ऐसा माध्यम है जो हमें एक दूसरे से बात करना सिखाता है, एक दूसरे को देखना और सुनना सिखाता है। रंगमंच इंसान को बनाता है। यह भावनाओं का पोषण करता है। हमारे पास रास्ता मौजूद हैं बस उसे पहचानने की जरूरत है। रंगमंच हमारी भाषा, हमारी संस्कृति और विरासत को बचाता है। यह बच्चों को उनका बचपन जीने में मदद करता है। रंगमंच एक ऐसी विधा है, या माध्यम है जो इस संकट का समाधान हो सकता है। दुनिया में ऐसी कोई कला, ऐसा कोई ज्ञान नहीं है जो नाट्य में शामिल ना हों। यह हमें असल जीवन की चुनौतियों से लड़ना सिखाता है।" इस सत्र के सूत्रधार राजीव रंजन ने साहित्य की उपयोगिता बताते हुए कहा– "मरना सिर्फ शरीर से मरना नहीं होता है। घुटन भी मरने का कारण बनती है। और साहित्य हमें इस घुटन से बचाता है, मरने से बचाता है।"

 

इसके बाद अगले सत्र में सुदीप ठाकुर की किताब 'दस साल: जिनसे देश की सियासत बदल गई' के संदर्भ में 'कहाँ से चले कहाँ पहुँचे' विषय पर कुँवर संधू ने उनसे बातचीत की। इस दौरान कुँवर संधू ने सुदीप ठाकुर से सत्तर के दशक के हालात और वर्तमान समय की तुलना करते हुए कई सवाल किए जिनका जवाब उन्होंने दिया। किताब के लिए 1970 के दशक को ही क्यों चुना, इस सवाल का जवाब देते हुए सुदीप ठाकुर ने बताया कि– "आजादी के बाद के पचहत्तर साल के सफर में 1970-80 का दशक कई वजहों से बेहद अहम है। इस दशक की सियासत और उस दौर में लिए गए फैसलों में जहां अतीत की छाया थी, वहीं इसमें भविष्य के लिए सबक भी थे। देश की सियासत और पालिटिकल इकोनामी और नागरिक आजादी दोनों के लिहाज से यह बेहद अहम है। उस समय की घटनाओं को पढ़ते-सुनते हुए मैं बड़ा हुआ और वह सब स्मृतियों में दर्ज होता गया। बड़े होने के बाद उन स्मृतियों के मायने खुलते गए और सवाल भी उठने लगे। उन सवालों से ही यह किताब बनी।" आपातकाल से हमें क्या सबक मिला इस सवाल पर उन्होंने कहा कि आपातकाल लोकतंत्र पर एक धब्बा है और उससे सबक लेने की जरूरत है। इसके बाद कँवर संधू ने उनसे 1970 के दशक की तुलना में वर्तमान दे करते हुए सवाल किए जिनका जवाब देते हुए सुदीप ठाकुर ने बताया कि निश्चित रूप से इन चालीस पचास बरसों में बहुत कुछ बदला है, जिसमें राजनीतिक दलों की स्थिति से लेकर मीडिया और कुल मिलाकर देश के नागरिक भी शामिल हैं। आश्वस्त करने वाली बात यही है कि लोकतांत्रिक मूल्य हमारी बड़ी ताकत हैं। इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी की अक्सर तुलना की जाती है। मगर दोनों के तरीके में अंतर है। इंदिरा कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के साथ थीं जिसमें समाजवादी रुझान था। बावजूद इसके वह एक समय निरंकुशता के रास्ते पर थीं। उनके बेटे संविधानेतर सत्ता का केंद्र बन गए थे। लेकिन इंदिरा ने स्वयं चुनाव कराने का ऐलान किया था। जेपी से उनके रिश्ते उतार चढाव वाले थे। जब वह चुनाव हार गई तब जेपी ने उन्हें दिलासा दी थी। जहां तक मोदी की बात है तो वह भी सत्ता का केंद्र है। आज आर एस एस सबसे प्रभावशाली संगठन है जो अपने हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र के एजेंडे को आगे बढा़ रहा है। क्या जेपी इसका समर्थन करते? इसका जवाब आप खुद तलाश सकते हैं।

 

शाम 05:00 बजे से आयोजित अगले सत्र में केशव के उपन्यास हद-बेहद पर बातचीत हुई। इस सत्र का संचालन मनोज कुमार पांडेय ने किया और लेखक के अलावा विद्यानिधि छाबड़ा और गुरमीत बेदी वक्ता के तौर पर मौजूद रहे। इस मौके पर विद्यानिधि छाबड़ा ने कहा कि– "आत्मकथाएं सामूहिक कथाएं बनकर सामने आनी चाहिए। दलितों के प्रति जो सवर्ण मानसिकता है वह अभी भी बदला नहीं है, उसे ही यह उपन्यास रेखांकित करता है। दलित विमर्श और स्त्री विमर्श को इस उपन्यास में पिरोया गया है।" वहीं गुरमीत बेदी ने इस उपन्यास के बारे में बात करते हुए कहा कि– "केशव की काव्यात्मक और चित्रात्मक भाषा शैली में पाठक को बांधकर रखने का सामर्थ्य है। इस उपन्यास में उनकी मानवीय संवेदना का अलग रूप देखने को मिलता है। इस उपन्यास का स्वाद इसे पढकर ही लिया जा सकता है।" केशव ने अपने लेखकीय वक्तव्य में कहा कि– "इस उपन्यास की रचना के लिए मुझे पात्रों को व्यक्ति से व्यक्तित्व में बदलने में दशकों का समय लग गया। लेकिन पाठकों की प्रतिक्रियाएं सुनकर लगता है यह मेहनत फलीभूत हुई।"

 

इसके बाद अगले सत्र में अमृता प्रीतम और पाकिस्तानी शायर सारा शगुफ़्ता के आत्मीय रिश्ते पर बातचीत की गई। इस सत्र में सारा शगुफ़्ता की कविताओं का उर्दू से लिप्यंतरण करके दो पुस्तकों में संकलित करने वाली अनुवादक प्रो. अर्जुमंद आरा, पत्रकार शायदा बानो और बिट्टू सफ़ीना संधू बतौर वक्ता मौजूद रहीं। इस मौके पर अर्जुमंद आरा ने कहा– "सारा शगुफ़्ता उर्दू की गद्य कविता का एक महत्वपूर्ण नाम है। उन्होंने अपनी कविता की रचना गूढ़ प्रतीकों की मदद से की है। नारिवादी चेतना के साथ उनका लहजा बहुत विद्रोही और गहरी पीड़ा और संवेदना से भरपूर है। उनके निजी जीवन की जटिलताएं और दुख उनकी कविताओं को भी बेहद जटिल और दुख के वर्णन में बदलते हैं।" आगे उन्होंने अमृता और सारा के आपसी संबंधों के बारे में बात करते हुए कहा कि–"अमृता और सारा की मुलाकात दिल्ली में हुई थी और दोनों में एक गहरा आत्मीयता का रिश्ता बन गया। बाद में कई सालों तक सारा उनको चिट्ठियों में अपनी कविताएं और दुःख भेजती रहीं। सारा में अपने दुखों को न झेल पाने का जो रुझान था वह बड़ा ही आत्मघाती था। अमृता उन्हें हिम्मत बंधाया करती थी। अमृता के साथ इस भावनात्मक संवाद से सारा के जीने का कुछ और हौंसला मिला और इसने उनकी मौत को कुछ वक्त के लिए टाल दिया। मगर कई असफल प्रयासों के बाद आखिर सारा ने आत्महत्या कर ली। सारा की भेजी हुई कविताओं और चिट्ठियों के आधार पर बाद में अमृता प्रीतम ने 'एक थी सारा' की रचना की।" वहीं शायदा बानो ने कहा कि– "सारा शगुफ़्ता अदब की महफिलों और अदीबों की दुनिया से जिस हमदर्दी और संवेदना की उम्मीद करती थी उन्हें अदीबों ने उतना ही ज्यादा बेईज्ज़त किया। उन्हें अपनी शायरी और जिस्म में तमीज लाने के लिए लिए कहा जाता था।" इसके बाद बिट्टू सफ़ीना संधू ने कहा कि– "सारा ने अपनी जिंदगी में जिन दुखों को झेला और अपनी कविताओं में उकेरा उन्हें समझने के लिए आपको एक अदीब होना जरूरी नहीं है। उसे हर वो शख़्स समझ सकता है जिसके सीने में एक दिल धड़कता है।" गौरतलब है कि अर्जुमंद आरा द्वारा संपादित सारा शगुफ़्ता की कविताओं की दो पुस्तकें, 'आँखें' और 'नींद का घर' पिछले साल राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई है।

 

इसके बाद कार्यक्रम के आखिरी सत्र में अनुवाद के महत्व पर आधारित 'हर्फ़ का पुल' विषय पर बातचीत की हुई। इस सत्र में अनुवादक अर्जुमंद आरा, मनमोहन, जगदीप सिंह और सतविंदर पाल कौर के साथ संगम पब्लिकेशंस से अशोक गर्ग और राजकमल प्रकाशन के आमोद महेश्वरी बतौर वक्ता मौजूद रहे। वहीं मनोज कुमार पांडेय ने सत्र का संचालन किया। इस दौरान उर्दू, हिन्दी और अंग्रेजी तीनों भाषाओं में अनुवाद करने वाली प्रो. अर्जुमंद आरा ने कहा कि– "अनुवाद एक ऐसा माध्यम है जो कई भाषाओं, कई देशों और उनकी संस्कृतियों में संवाद स्थापित करता है। एक दूसरे को जानने से विभिन्न संस्कृतियों के बीच में मानवीय और संवेदना के स्तर पर लोगों के दरम्यान जो बौद्धिक और भावनात्मक संबंध बनता है वो हमारी भाषा को भी समृद्ध करता है। अनुवाद सार्वभौमिक मानव मूल्यों को मजबूत करता है। मानव एकता के एक महत्वपूर्ण माध्यम के तौर पर मैं एक भाषा की उत्कृष्ट रचनाओं को अनुवाद की भाषा में परिवर्तित करने को अपना फर्ज समझती हूँ।"

 

इसके बाद सतविंदर पाल कौर ने अनुवाद की विशेषताएं बताते हुए कहा– "अनुवाद उस साहित्य को दूसरी भाषा के लोगों तक पहुंचाता है जो अपने आप में ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। अनुवादक मौलिक रचना की गहराई में जाकर उसके भावों को दूसरी भाषा में लाने का यत्न करता है। यह छोटे जनसमुदाय की क्षेत्रीय भाषा में गंभीर रचनाओं की कमी को पूरा करता है।" इसके बाद आगे उन्होंने अनुवादक के सामने अनुवाद करते समय आने वाली चुनौतियों के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि– "एक अनुवादक के सामने हमेशा यह चुनौती रहती है कि उसके अनुवाद में मूल अर्थ और लेखक के विचार का भाव न बदल जाएं। अनुवाद हमें दूसरी भाषा के भंडार में योगदान के लिए सुकून देता है।" वहीं सत्र के अन्य वक्ता अनुवादक मनमोहन ने कहा कि भारत जैसे बहु भाषाई देश में अनुवाद का बहुत महत्व है। यह एक भाषा के लेखन को दूसरी भाषा के पाठकों तक पहुंचाने का माध्यम है। वर्तमान में सूचना क्रांति के दौर में अनुवाद का महत्व और ज्यादा बढ़ जाता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने अनुवाद को आसान बना दिया है लेकिन इसके साथ ही साहित्यिक भाषा को बचाने की चुनौती भी है।" राजकमल प्रकाशन के निदेशक आमोद महेश्वरी ने कहा कि पंजाबी भाषा का साहित्य बहुत समृद्ध रहा है। इसे गुरुमुखी से देवनागरी लिपि लाने के लिए पुस्तकों का प्रकाशन बढ़ना चाहिए जिससे वो व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंच सके। राजकमल प्रकाशन एक प्रकाशक के तौर पर इसको लेकर गंभीरता से प्रयास कर रहा है और गुरुमुखी से देवनागरी में लिप्यन्तरण को प्रोत्साहन दे रहा है।

 

आज विख्यात सिने समीक्षक और सिने इतिहासकार शरद दत्त नहीं रहे। राजकमल किताब उत्सव के आज के कार्यक्रम में उनकी स्मृति में शोक प्रकट करते हुए दो मिनट के लिए मौन रखा गया।

 

 

 

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