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हिमाचल

Shimla: सुप्रीम कोर्ट से सुक्खू सरकार को बड़ी राहत, हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश पर रोक

15 जून, 2026 08:36 PM

शिमला : राज्य के नगर निकायों में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के आगामी चुनावों से पहले सुप्रीम कोर्ट से राज्य सरकार को एक बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने एक अंतरिम आदेश जारी कर स्थानीय विधायकों के मतदान अधिकार को बहाल कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम आदेश का सबसे बड़ा असर उन नगर निकायों में देखने को मिलेगा, जहां भाजपा या कांग्रेस किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है या मुकाबला बिल्कुल बराबरी का है। ऐसे करीबी मुकाबले वाले क्षेत्रों में अब संबंधित क्षेत्र के विधायक का वोट किंगमेकर साबित होगा। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पदों को लेकर प्रदेश में पहले से ही सियासी खींचतान चरम पर थी। अब इस नए आदेश के बाद कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों ने नए सिरे से गणित बिठाना और अपनी रणनीति को धार देना शुरू कर दिया है।


जानकारी के अनुसार हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की 26 जुलाई, 2023 की उस अधिसूचना पर अंतरिम रोक लगा दी थी, जिसके तहत सरकार ने विधायकों को नगर निकायों के शीर्ष पदों के चुनाव में वोट डालने का अधिकार दिया था। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सोमवार को मामले की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश पर रोक लगा दी, जिससे अंतिम फैसला आने तक विधायकों के मतदान का रास्ता साफ हो गया है।


राज्य सरकार का तर्क है कि कानून और अधिसूचना के तहत विधायकों को यह अधिकार देना पूरी तरह संवैधानिक और उचित है। इसके विपरीत, याचिकाकर्त्ताओं का मानना है कि स्थानीय स्तर की सरकार के पदाधिकारियों को चुनने का विशेष अधिकार सिर्फ जमीन से जुड़े पार्षदों का ही होना चाहिए। मामले से जुड़े अधिवक्ता नंदलाल ठाकुर का कहना है कि कई नगर निकायों में पार्षदों की संख्या बराबर होती है या केवल एक-दो सीटों का अंतर होता है। ऐसे में विधायक का एक अकेला वोट सीधे तौर पर परिणाम बदल सकता है। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनने का मूल अधिकार पार्षदों का ही है, विधायकों को यह अधिकार देना कानूनी रूप से उचित नहीं माना जा सकता।

 

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