चंडीगढ़ : हरियाणा की राजनीति में करीब पांच दशक से सक्रिय अनिल विज को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक मंच से ‘बहुत पुराना’ और ‘बहुत अच्छा साथी’ बताया। हरियाणा के मंत्रियों और विधायकों से परिचय के दौरान जब विज की बारी आई तो मोदी ने कहा, “मैं इन्हें बहुत पुराना जानता हूं। यह मेरे बहुत अच्छे साथी हैं।” प्रधानमंत्री ने विज के पुराने स्वभाव का जिक्र करते हुए कहा कि किसी मुद्दे पर वे नाराज हो जाते थे, लेकिन बाद में मान भी जाते थे। “नाराज होना उनकी कार्यशैली का हिस्सा है।”
प्रधानमंत्री के ये शब्द उस समय आए, जब सामने हरियाणा के 48 विधायक थे। भाजपा की प्रदेश प्रभारी स्मृति ईरानी और सह प्रभारी भोला सिंह की मौजूदगी ने इस टिप्पणी को राजनीतिक रूप से और महत्वपूर्ण बना दिया। हरियाणा भाजपा की राजनीति में वरिष्ठता, संगठनात्मक अनुभव और लंबे राजनीतिक सफर के लिहाज से इसे विज के कद की सार्वजनिक स्वीकार्यता के तौर पर देखा जा रहा है।
मोदी-विज की दोस्ती नई नहीं
मोदी और विज का राजनीतिक परिचय दशकों पुराना है। भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. मुरली मनोहर जोशी के नेतृत्व में निकली राष्ट्रीय एकता यात्रा के दौरान दोनों नेता सक्रिय रूप से साथ रहे। कश्मीर के लाल चौक तक पहुंचने वाली इस यात्रा में नरेंद्र मोदी प्रमुख चेहरा थे, जबकि अनिल विज भी अभियान में पूरी सक्रियता से जुड़े थे।
उस दौर में भाजपा सत्ता की राजनीति से ज्यादा संगठन और विचारधारा के विस्तार के संघर्ष में थी। उसी दौर के साथी आज देश के प्रधानमंत्री और हरियाणा के सबसे वरिष्ठ नेताओं में शामिल हैं। ऐसे में मोदी का विज को ‘पुराना साथी’ कहना सिर्फ व्यक्तिगत संबोधन नहीं, बल्कि लंबे राजनीतिक संबंधों का सार्वजनिक संदर्भ भी है।
बैंक की नौकरी छोड़ी, राजनीति चुनी
अनिल विज की राजनीति की शुरुआत सत्ता से नहीं, संगठन के आदेश से हुई। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की स्थायी नौकरी में 17 वर्ष पूरे कर चुके विज का भविष्य सुरक्षित था। पेंशन की पात्रता भी करीब थी। इसी बीच संघ की ओर से उन्हें चुनाव लड़ने के लिए नौकरी छोड़ने को कहा गया।
विज ने बिना किसी राजनीतिक विरासत के बैंक की नौकरी छोड़ी और संगठन के निर्देश पर चुनावी राजनीति में उतर गए। यही फैसला आगे चलकर उनकी पहचान का आधार बना।
मंत्री पद से बड़ी रही विचारधारा
विज के राजनीतिक सफर में सत्ता के कई अवसर आए, लेकिन उन्होंने राजनीतिक सुविधा के बजाय विचारधारा को प्राथमिकता दी। 1996 में निर्दलीय विधायक बनने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री बंसीलाल ने उन्हें मंत्री बनाने का प्रस्ताव दिया, जिसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया।
वर्ष 2000 में ओमप्रकाश चौटाला की ओर से भी उन्हें राजनीतिक रूप से साथ आने का प्रस्ताव मिला, लेकिन विज ने अपना रास्ता नहीं बदला। उनकी राजनीति का यही पक्ष उन्हें भाजपा के पुराने संगठनात्मक नेताओं की कतार में अलग पहचान देता है।
14 साल पार्टी से बाहर, फिर भी भाजपा से दूरी नहीं
1995 के बाद करीब 14 वर्षों तक विज भाजपा से बाहर रहे। इसके बावजूद उन्होंने न तो संगठन के खिलाफ मोर्चा खोला और न ही अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता बदली। निर्दलीय विधायक के रूप में भी उन्होंने अपनी राजनीतिक जमीन बनाए रखी।
2009 में भाजपा ने अंबाला छावनी से उन्हें अपना उम्मीदवार घोषित किया और उनकी पार्टी में वापसी हुई। यह वापसी इस बात का संकेत थी कि पार्टी ने उनके जनाधार और संगठनात्मक योगदान को बरकरार रखा था।
सात बार विधायक, पांच दशक का अनुभव
मध्यमवर्गीय परिवार से निकलकर सात बार विधायक बनने वाले विज आज हरियाणा सरकार में ऊर्जा, परिवहन और श्रम जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभाल चुके हैं। उनकी पहचान सख्त प्रशासनिक रवैये, बेबाक बयानबाजी और अधिकारियों से सीधे सवाल करने वाले मंत्री की रही है।
लेकिन मोदी के शब्दों में उनके व्यक्तित्व का एक दूसरा पहलू भी सामने आया—नाराज होने के बावजूद रिश्ते कायम रखना और अंततः मान जाना। यही सहजता प्रधानमंत्री के संबोधन में दिखाई दी।
राजनीतिक संदेश साफ
मोदी का यह संबोधन ऐसे समय में आया है, जब हरियाणा भाजपा में संगठनात्मक स्तर पर नई जिम्मेदारियां तय हुई हैं। इसलिए इसे केवल व्यक्तिगत प्रशंसा के रूप में देखना अधूरा होगा। प्रधानमंत्री ने 48 विधायकों के सामने हरियाणा भाजपा के सबसे अनुभवी नेताओं में शामिल विज के राजनीतिक कद, वरिष्ठता और पुराने संबंधों को रेखांकित किया।
पांच दशक की राजनीतिक यात्रा में पद बदले, परिस्थितियां बदलीं और राजनीतिक समीकरण भी बदले, लेकिन विज की पहचान—बेबाक नेता और विचारधारा से समझौता न करने वाले राजनेता—कायम रही। प्रधानमंत्री का “बहुत पुराने साथी” कहना इसी लंबे सफर पर लगी एक सार्वजनिक मुहर के तौर पर देखा जा रहा है।