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राष्ट्रीय

ब्रिक्स और भारत : बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत की निर्णायक भूमिका

16 मई, 2026 06:47 PM

21वीं सदी का अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य तीव्र परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। शीत युद्ध के बाद जिस एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था में अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों का निर्णायक वर्चस्व दिखाई देता था, वह अब धीरे-धीरे बहुध्रुवीय संरचना की ओर अग्रसर है। वैश्विक अर्थव्यवस्था, तकनीक, ऊर्जा, व्यापार, सुरक्षा और कूटनीति के केंद्र तेजी से बदल रहे हैं। इसी संक्रमणकाल में BRICS ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका का समूह विश्व राजनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक वैकल्पिक शक्ति के केंद्र के रूप में उभरकर सामने आया है।

वर्ष 2009 में आर्थिक सहयोग मंच के रूप में प्रारंभ हुआ BRICS आज केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति-संतुलन को पुनर्परिभाषित करने वाला एक प्रभावशाली मंच बन चुका है। पश्चिमी संस्थाओं जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व बैंक और G7 की नीतियों से असंतुष्ट विकासशील देशों के लिए BRICS नई संभावनाओं और वैकल्पिक वैश्विक नेतृत्व की आशा प्रस्तुत करता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह उन देशों की आवाज़ को मंच प्रदान करता है जिन्हें लंबे समय तक वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिला।

भारत के लिए BRICS का महत्व केवल आर्थिक या कूटनीतिक नहीं, बल्कि रणनीतिक और वैचारिक भी है। यह मंच भारत को “वैश्विक दक्षिण” की आवाज़, “विश्वबंधु” और “संतुलनकारी शक्ति” के रूप में अपनी भूमिका को व्यवहारिक स्वरूप देने का अवसर प्रदान करता है। एक ओर भारत QUAD जैसे पश्चिम समर्थित रणनीतिक मंचों का हिस्सा है, वहीं दूसरी ओर BRICS और SCO जैसे समूहों में सक्रिय भूमिका निभाकर वह अपनी “रणनीतिक स्वायत्तता” (Strategic Autonomy) का परिचय देता है।

आज जब विश्व यूक्रेन युद्ध, पश्चिम-चीन प्रतिस्पर्धा, ऊर्जा संकट, साइबर युद्ध, जलवायु परिवर्तन और आर्थिक अस्थिरता जैसी जटिल चुनौतियों से जूझ रहा है, तब BRICS की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है। यह मंच केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वैश्विक शासन, वैकल्पिक वित्तीय ढांचे, तकनीकी साझेदारी, ऊर्जा सुरक्षा, आतंकवाद विरोध और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था जैसे विषयों पर भी निर्णायक विमर्श प्रस्तुत कर रहा है। भारत इस पूरे परिदृश्य में ऐसी शक्ति के रूप में उभर रहा है जो न तो किसी पश्चिमी धुरी का पूर्ण समर्थक बनना चाहता है और न ही चीन-रूस केंद्रित शक्ति-संतुलन का हिस्सा। उसकी नीति स्पष्ट है राष्ट्रीय हित सर्वोपरि। यही कारण है कि BRICS भारत के लिए केवल एक कूटनीतिक मंच नहीं, बल्कि 21वीं सदी की नई विश्व व्यवस्था में अपनी निर्णायक उपस्थिति दर्ज कराने का ऐतिहासिक अवसर है।

आर्थिक मंच से भू-राजनीतिक शक्ति तक : BRICS का रूपांतरण

BRICS का सफर “संभावना” से “प्रभाव” तक का सफर है। वर्ष 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने पहली बार BRIC शब्द का प्रयोग उभरती अर्थव्यवस्थाओं के संदर्भ में किया था। उस समय यह केवल आर्थिक क्षमता का संकेत था, पर समय के साथ यह अवधारणा राजनीतिक और रणनीतिक वास्तविकता में परिवर्तित हो गई। आज BRICS विश्व की लगभग आधी आबादी और वैश्विक GDP के बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। हाल के वर्षों में इसके विस्तार ने इसे और प्रभावशाली बनाया है। नए देशों के जुड़ने से यह मंच ऊर्जा, व्यापार और भू-राजनीतिक स्तर पर अधिक व्यापक शक्ति संरचना में परिवर्तित हो रहा है। BRICS अब IMF और विश्व बैंक जैसी पश्चिमी वित्तीय संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठा रहा है। विकासशील देशों का लंबे समय से आरोप रहा है कि ये संस्थाएं पश्चिमी हितों के अनुरूप संचालित होती हैं।

BRICS इसी असंतोष को राजनीतिक अभिव्यक्ति प्रदान करता है।भारत इस परिवर्तन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। चीन जहां BRICS को अमेरिकी वर्चस्व के विरुद्ध एक मजबूत धुरी के रूप में देखता है, वहीं भारत इसे “समानता आधारित बहुध्रुवीय व्यवस्था” का मंच बनाना चाहता है। भारत की दृष्टि में BRICS किसी एक शक्ति केंद्र के विरुद्ध गठबंधन नहीं, बल्कि संतुलित वैश्विक व्यवस्था की दिशा में प्रयास है।

वैश्विक दक्षिण की आवाज़ के रूप में भारत

21वीं सदी की राजनीति में “Global South” की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण हो चुकी है। इसका आशय उन विकासशील देशों से है जिन्हें लंबे समय तक वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में सीमित प्रतिनिधित्व मिला।  भारत ने हाल के वर्षों में स्वयं को इन देशों की आवाज़ के रूप में स्थापित करने का गंभीर प्रयास किया है। G20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने “One Earth, One Family, One Future” का संदेश देकर गरीबी, जलवायु न्याय, खाद्य सुरक्षा और ऋण संकट जैसे मुद्दों को वैश्विक विमर्श के केंद्र में लाने का प्रयास किया। BRICS इस रणनीति को और व्यापक आयाम प्रदान करता है।

अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया के देशों के साथ भारत की बढ़ती निकटता इसी नीति का हिस्सा है। भारत इन देशों के साथ केवल व्यापारिक संबंध नहीं बना रहा, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा, डिजिटल सहयोग और क्षमता निर्माण के क्षेत्रों में भी भागीदारी बढ़ा रहा है। भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी “सॉफ्ट पावर” है। लोकतांत्रिक व्यवस्था, सांस्कृतिक विविधता, योग, आयुर्वेद, आईटी क्षमता और मानवीय दृष्टिकोण उसे चीन से अलग पहचान देते हैं। BRICS में भारत इसी लोकतांत्रिक और मानवीय नेतृत्व मॉडल को प्रस्तुत करता है।

भारत-चीन संबंध : सहयोग और प्रतिस्पर्धा का जटिल संतुलन

BRICS का सबसे जटिल आयाम भारत और चीन के संबंधों से जुड़ा है। दोनों एशियाई शक्तियां आर्थिक विकास और वैश्विक प्रभाव के लिए प्रतिस्पर्धी भी हैं और बहुपक्षीय मंचों पर सहयोगी भी। सीमा विवाद, गलवान संघर्ष और हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने दोनों देशों के संबंधों को तनावपूर्ण बनाया है। इसके बावजूद दोनों देश BRICS, SCO और G20 जैसे मंचों पर साथ काम करते हैं। यह आधुनिक कूटनीति का नया यथार्थ है, जहां प्रतिस्पर्धा और सहयोग समानांतर चलते हैं।

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती BRICS में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करना है। भारत नहीं चाहता है कि यह मंच चीन-केंद्रित संरचना में बदल जाए। इसलिए भारत लगातार सामूहिक नेतृत्व, पारदर्शिता और संतुलित निर्णय प्रक्रिया पर जोर देता है। हालांकि BRICS सीमा विवाद का समाधान नहीं कर सकता, लेकिन यह दोनों देशों के बीच संवाद बनाए रखने और तनाव को नियंत्रित करने का प्रभावी माध्यम अवश्य बन सकता है।

डॉलर वर्चस्व को चुनौती और भारत की आर्थिक कूटनीति

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी डॉलर वैश्विक व्यापार और वित्त का प्रमुख आधार रहा है। पर रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद कई देशों ने डॉलर निर्भरता कम करने की आवश्यकता महसूस की है। BRICS देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार की चर्चा इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत रुपये में व्यापार को बढ़ावा देने की दिशा में सक्रिय प्रयास कर रहा है। रूस के साथ ऊर्जा व्यापार और कुछ देशों के साथ द्विपक्षीय भुगतान व्यवस्थाएं इसका उदाहरण हैं।

यदि BRICS देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ता है, तो वैश्विक वित्तीय संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव संभव हैं। हालांकि यह प्रक्रिया धीमी और जटिल होगी, क्योंकि डॉलर की वैश्विक स्वीकार्यता और विश्वसनीयता अभी भी अत्यंत मजबूत है।भारत इस विषय पर संतुलित दृष्टिकोण अपनाता है। वह “डी-डॉलरीकरण” की आक्रामक राजनीति का हिस्सा नहीं बनना चाहता, बल्कि वित्तीय विविधीकरण और आर्थिक स्वायत्तता को बढ़ावा देना चाहता है।

न्यू डेवलपमेंट बैंक : विकास का वैकल्पिक मॉडल

BRICS द्वारा स्थापित न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) इस समूह की सबसे बड़ी संस्थागत उपलब्धियों में से एक है। इसका उद्देश्य विकासशील देशों को आधारभूत संरचना और सतत विकास परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करना है। विश्व बैंक और IMF पर लंबे समय से यह आरोप लगता रहा है कि वे ऋण देने के साथ कठोर राजनीतिक और आर्थिक शर्तें जोड़ते हैं। इसके विपरीत NDB अपेक्षाकृत लचीला और विकासोन्मुख मॉडल प्रस्तुत करता है। भारत के लिए NDB अत्यंत महत्वपूर्ण है। देश में हरित ऊर्जा, परिवहन, स्मार्ट सिटी, डिजिटल नेटवर्क और आधारभूत संरचना के विस्तार के लिए बड़े निवेश की आवश्यकता है। NDB इन क्षेत्रों में सहयोग का महत्वपूर्ण स्रोत बन सकता है। यह बैंक “दक्षिण-दक्षिण सहयोग” की अवधारणा को भी मजबूत करता है और यह संदेश देता है कि विकासशील देश अपने संसाधनों और संस्थाओं के माध्यम से भी प्रभावी वैश्विक भूमिका निभा सकते हैं।

BRICS विस्तार और भारत की रणनीतिक चिंता

हाल के वर्षों में BRICS के विस्तार ने इसकी वैश्विक शक्ति को नई दिशा दी है। पश्चिम एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों की भागीदारी ने इसे ऊर्जा और भू-राजनीतिक दृष्टि से अधिक प्रभावशाली बना दिया है। लेकिन भारत के सामने इससे जुड़ी रणनीतिक चुनौतियां भी हैं। चीन इस विस्तार का उपयोग अपने प्रभाव क्षेत्र को मजबूत करने के लिए कर सकता है। यदि BRICS पर चीन का अत्यधिक प्रभाव बढ़ता है, तो भारत की भूमिका सीमित हो सकती है। इसी कारण भारत BRICS के भीतर “संतुलनकारी शक्ति” की भूमिका निभा रहा है। उसकी कोशिश है कि यह मंच किसी एक देश के प्रभुत्व का माध्यम न बने, बल्कि सामूहिक नेतृत्व और बहुपक्षीय संतुलन पर आधारित रहे।

रणनीतिक स्वायत्तता : भारत की विदेश नीति का नया दर्शन

भारत की विदेश नीति अब पारंपरिक गुटनिरपेक्षता से आगे बढ़ चुकी है। वर्तमान दौर में भारत “मल्टी-एलाइनमेंट” या “बहु-संरेखीय कूटनीति” की नीति पर कार्य कर रहा है। भारत QUAD का सदस्य है, जहां अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी है। वहीं दूसरी ओर वह BRICS और SCO जैसे मंचों पर रूस और चीन के साथ भी सहयोग करता है। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का उदाहरण है। भारत किसी एक शक्ति केंद्र पर निर्भर नहीं रहना चाहता। उसकी नीति स्पष्ट है, जहां राष्ट्रीय हित होंगे, वहीं सहयोग होगा। यही नीति भारत को पूर्व और पश्चिम के बीच एक “कूटनीतिक पुल” के रूप में स्थापित करती है।

डिजिटल इंडिया और तकनीकी कूटनीति

21वीं सदी की शक्ति केवल सैन्य और आर्थिक संसाधनों से निर्धारित नहीं होगी, बल्कि तकनीकी क्षमता भी निर्णायक भूमिका निभाएगी। BRICS देशों के बीच AI, साइबर सुरक्षा, डिजिटल भुगतान और डेटा संप्रभुता जैसे विषयों पर सहयोग तेजी से बढ़ रहा है। भारत इस क्षेत्र में विशेष रूप से मजबूत स्थिति में है। UPI, आधार और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल ने भारत को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दी है। कई विकासशील देश भारतीय डिजिटल मॉडल में रुचि दिखा रहे हैं।

भारत BRICS के माध्यम से “टेक्नोलॉजी डेमोक्रेसी” की अवधारणा को आगे बढ़ा सकता है, जिसका अर्थ है तकनीक को कुछ वैश्विक कंपनियों के नियंत्रण से निकालकर अधिक समावेशी और सुलभ बनाना। साइबर सुरक्षा भी BRICS के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण विषय बन चुकी है। डेटा नियंत्रण और साइबर हमले आधुनिक भू-राजनीति के नए हथियार बन गए हैं। भारत इस क्षेत्र में सहयोग को नई दिशा देने की क्षमता रखता है।

ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु न्याय और हरित विकास

ऊर्जा आज वैश्विक राजनीति का केंद्रीय प्रश्न बन चुकी है। रूस और पश्चिम एशियाई देशों के साथ BRICS की साझेदारी भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ता देशों में शामिल होता जा रहा है। ऐसे में उसे स्थिर और सस्ती ऊर्जा आपूर्ति की आवश्यकता है। रूस से तेल आयात और खाड़ी देशों के साथ सहयोग इसी रणनीति का हिस्सा है।

साथ ही भारत हरित ऊर्जा के क्षेत्र में भी नेतृत्वकारी भूमिका निभा रहा है। अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) और हरित विकास के प्रति उसकी प्रतिबद्धता इसे अलग पहचान देती है। भारत “विकास और पर्यावरण” के बीच संतुलन की नीति प्रस्तुत करता है। वह विकासशील देशों पर कठोर पर्यावरणीय प्रतिबंधों के बजाय “जलवायु न्याय” की अवधारणा पर जोर देता है।

आतंकवाद, साइबर सुरक्षा और नई वैश्विक चुनौतियां

BRICS अब केवल आर्थिक मंच नहीं रह गया है।आतंकवाद, साइबर अपराध, सूचना युद्ध और जैविक सुरक्षा जैसे विषय इसकी प्राथमिकताओं में शामिल हो चुके हैं। भारत लंबे समय से सीमा पार आतंकवाद का सामना कर रहा है। BRICS मंच पर भारत लगातार आतंकवाद के विरुद्ध साझा रणनीति और “शून्य सहिष्णुता” की नीति की मांग उठाता रहा है। हालांकि चीन के कारण कई बार पाकिस्तान से जुड़े मुद्दों पर स्पष्ट सहमति नहीं बन पाती, फिर भी BRICS भारत को अपनी सुरक्षा चिंताओं को वैश्विक स्तर पर उठाने का अवसर प्रदान करता है। डिजिटल युग में साइबर युद्ध और डेटा नियंत्रण नए सामरिक हथियार बन चुके हैं। ऐसे में BRICS देशों के बीच साइबर सहयोग भविष्य की वैश्विक सुरक्षा संरचना में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

विशेष विमर्श : क्या BRICS भविष्य की नई वैश्विक व्यवस्था का आधार बन सकता है?

यह प्रश्न आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में है कि क्या BRICS भविष्य में संयुक्त राष्ट्र जैसी प्रभावशाली वैश्विक संस्था का विकल्प बन सकता है। वर्तमान परिस्थितियों में यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि BRICS संयुक्त राष्ट्र का स्थान ले लेगा, पर यह निश्चित है कि यह वैश्विक शक्ति-संतुलन को प्रभावित करने वाला प्रभावशाली मंच बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी समस्या उसकी संरचनात्मक जड़ता और सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यों का वर्चस्व है। विकासशील देशों में लंबे समय से यह असंतोष रहा है कि वैश्विक शासन व्यवस्था में उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला। BRICS इसी असंतोष को राजनीतिक स्वर प्रदान करता है।

हालांकि BRICS के भीतर भी कई अंतर्विरोध मौजूद हैं। भारत-चीन प्रतिस्पर्धा, रूस-पश्चिम संघर्ष, आर्थिक असमानताएं और राजनीतिक व्यवस्थाओं का अंतर। यही कारण है कि इसे अभी पूर्ण वैकल्पिक वैश्विक संस्था कहना जल्दबाजी होगी। फिर भी इतना स्पष्ट है कि BRICS वैश्विक शक्ति-संतुलन को पुनर्परिभाषित करने वाली सबसे महत्वपूर्ण पहलों में से एक बन चुका है।

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