चंडीगढ़ : हरियाणा के पानीपत से 22 जनवरी 2015 को शुरू हुई ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ मुहिम के 11 वर्षों का लेखा-जोखा अब संसद में सामने आया है। 46 सांसदों की ओर से पूछे गए सवालों के जवाब में केंद्र सरकार ने अभियान से जुड़े आंकड़े पेश करते हुए बताया कि देश में जन्म के समय लिंगानुपात में सुधार हुआ है। वर्ष 2014-15 में जहां यह आंकड़ा 918 था, वहीं 2024-25 में बढ़कर 929 हो गया।
इसी अवधि में माध्यमिक स्तर पर लड़कियों के सकल नामांकन अनुपात में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। 2014-15 में 75.51 प्रतिशत लड़कियां माध्यमिक स्तर पर नामांकित थीं, जबकि 2024-25 में यह अनुपात बढ़कर 83.4 प्रतिशत हो गया।
पानीपत से शुरू हुआ अभियान बना राष्ट्रीय मिशन
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 22 जनवरी 2015 को पानीपत से ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान की शुरुआत की थी। उस समय बेटियों के जन्म को लेकर सामाजिक असमानता, घटता लिंगानुपात और लड़कियों की शिक्षा में कम भागीदारी बड़ी चुनौतियों में शामिल थे।
पानीपत से अभियान की शुरुआत करते हुए बेटियों के जन्म, संरक्षण और शिक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता से जोड़ा गया। शुरुआत में चुनिंदा जिलों पर केंद्रित यह मुहिम बाद में देशभर में विस्तार पा गई। स्वास्थ्य, शिक्षा और महिला एवं बाल विकास से जुड़े कार्यक्रमों के साथ इसे जोड़ा गया और वर्तमान में यह ‘मिशन शक्ति’ के तहत संचालित हो रही है।
11 साल में 1075 करोड़ रुपये से अधिक खर्च
केंद्र सरकार के अनुसार जून 2026 तक ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान पर 1,075.37 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। इस दौरान देशभर में 78,305 कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें 3.37 करोड़ से अधिक लोगों ने भाग लिया।
इन कार्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य बेटियों के जन्म को लेकर सकारात्मक सामाजिक माहौल तैयार करना, उनकी शिक्षा और पोषण को बढ़ावा देना तथा स्वास्थ्य एवं सामाजिक स्वीकार्यता के प्रति जागरूकता बढ़ाना रहा।
शिक्षा में भी बेटियों की बढ़ी हिस्सेदारी
अभियान की एक प्रमुख उपलब्धि लड़कियों की शिक्षा से जुड़ी दिखाई देती है। माध्यमिक स्तर पर लड़कियों का सकल नामांकन अनुपात 10 वर्षों में 75.51 प्रतिशत से बढ़कर 83.4 प्रतिशत हो गया।
यह बदलाव केवल स्कूलों में दाखिले तक सीमित नहीं है, बल्कि बेटियों की शिक्षा को लेकर सामाजिक सोच में आए परिवर्तन का भी संकेत माना जा रहा है। सरकार के अनुसार लिंगानुपात और शिक्षा के आंकड़ों में सुधार के पीछे ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ के साथ स्वास्थ्य, शिक्षा और महिला सशक्तीकरण से जुड़ी अन्य योजनाओं की भी भूमिका रही है।
नीति आयोग ने दो बार कराया स्वतंत्र मूल्यांकन
संसद में सांसदों ने अभियान की उपलब्धियों के साथ-साथ उसके वास्तविक प्रभाव और मूल्यांकन की जानकारी भी मांगी थी। केंद्र सरकार ने बताया कि नीति आयोग की ओर से वर्ष 2020 और 2025 में अभियान का स्वतंत्र मूल्यांकन कराया गया।
दोनों मूल्यांकनों में अभियान को प्रभावी बताया गया। साथ ही इसके क्रियान्वयन को और मजबूत करने के लिए विभिन्न सुझाव भी दिए गए। इससे स्पष्ट है कि सरकार अब केवल अभियान के विस्तार पर ही नहीं, बल्कि उसके परिणामों और जमीनी प्रभाव के आकलन पर भी जोर दे रही है।
पानीपत की पहल से देशव्यापी बदलाव तक
2015 में कुछ चुनिंदा जिलों से शुरू हुई यह मुहिम 11 वर्षों में देशव्यापी अभियान का रूप ले चुकी है। संसद में पेश आंकड़े संकेत देते हैं कि इस अवधि में बेटियों के जन्म और माध्यमिक शिक्षा में उनकी भागीदारी, दोनों महत्वपूर्ण मोर्चों पर सुधार हुआ है।
पानीपत से शुरू हुई पहल का सबसे बड़ा संदेश यही है कि बेटी के जन्म से लेकर उसकी शिक्षा और सामाजिक स्वीकार्यता तक, बदलाव केवल सरकारी योजनाओं से नहीं बल्कि सामाजिक सोच में परिवर्तन से संभव है। अब सरकार के सामने चुनौती इन उपलब्धियों को और आगे बढ़ाने, क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने और बेटियों की शिक्षा को उच्च शिक्षा तथा रोजगार तक पहुंचाने की है।