चंडीगढ़ की छवि को बचाने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने शहर में इंडीपेंडेंट हाउसिस को अपार्टमेंट में बदलने (कन्वर्जन) पर रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट जस्टिस बीआर गवई और बीवी नागाराथन की डबल बैंच मामले में सुनवाई कर रही थी। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला शहर में सेक्टर 1 से 30 (फेज-1) में लागू होगा। इस फेज को हेरिटेज जोन घोषित किया गया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मामले में हेरिटेज कमेटी को इस दिशा में कुछ आदेश भी जारी किए हैं। इस फेज को कम आबादी के लिए डिजाइन किया गया था। चंडीगढ़ के लगभग सभी हेरिटेज स्ट्रक्चर इसी फेज में हैं।
बता दें कि चंडीगढ़ में वर्ष 2001 में अपार्टमेंट रुल्स को लागू किया गया था। हालांकि अपार्टमेंट बनने से शहर की मूल छवि को प्रभावित होगी। रेजिडेंट वेल्फेयर एसोसिएशन ने चंडीगढ़ प्रशासन व अन्यों को पार्टी बनाते हुए यह याचिका दायर की थी।
'कार्बूजियन चंडीगढ़' के हेरिटज स्टेटस के संरक्षण पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने 131 पन्नों की जजमेंट में कहा है कोर्ट को कुछ आवश्यक निर्देश देने पड़ेंगे ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि चंडीगढ़ में अपार्टमेंटलाइजेशन के मुद्दे को पहले हेरिटेज कमेटी द्वारा निरीक्षण किया जा सके ताकि 'कार्बूजियन चंडीगढ़' के हेरिटज स्टेटस का संरक्षण हो सके। इसके साथ ही चंडीगढ़ प्रशासन को मास्टर प्लान-2031 और 2017 के रुल्स में संशोधन के लिए कदम उठाने को कहा गया है। वहीं आगे कहा है कि मामले से जुड़े महत्त्वपूर्ण मुद्दे सिर्फ चंडीगढ़ प्रशासन के विवेकाधीन तक ही नहीं छोड़े जा सकते। ऐसे में एक बार चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा प्रावधानों में संशोधन के बाद इसे केंद्र सरकार के समक्ष विचार और अंतिम फैसले के लिए रखा जाए।
चंडीगढ़ प्रशासन की कार्रवाई पर उठे सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने केस की सुनवाई के दौरान चंडीगढ़ प्रशासन की कार्रवाई पर भी सवाल खड़े किए। सुप्रीम कोर्ट ने चंडीगढ़ प्रशासन के कुछ एक्ट्स और चूक पर सवाल खड़े किए। कोर्ट ने कहा कि कुछ क्षेत्रों में अराजकता (अव्यवस्था) की स्थिति है। एक ओर वर्ष 2001 के रुल्स को वर्ष 2007 में निरस्त कर दिया गया। वहीं वर्ष 2007 में नए रुल्स बनाए गए। 2007 के रुल्स के नियम 16 में साइट्स और बिल्डिंग्स के फ्रेगमेंटेशन पर रोक की बात कही गई।
चंडीगढ़ प्रशासन ने कहा कि शहर में अपार्टमेंट का निर्माण मान्य नहीं है। वहीं दूसरी ओर, वर्ष 2017 के रुल्स इस तरह बनाए गए कि अपार्टमेंट के निर्माण का स्कोप हो। वहीं चंडीगढ़ प्रशासन प्लान सेंक्शन कर रही है या एक तरह से अपार्टमेंटलाईजेशन को मंजूरी देना है।
शक्तियों की पालना इसलिए ज़रुरी: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 'कार्बूजियन चंडीगढ़' के हेरिटेज स्टेटस की सुरक्षा के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों की पालना करते हुए कुछ आदेश जारी किए जाए। सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि वर्ष 1960 के रुल्स के नियम 14 के तहत वर्ष 2007 के रुल्स का नियम 16 और वर्ष 2001 के रुल्स की रीपिल, फेज-1 की रिहायशी घरों की फ्रेगमेंटेशन/डिविजन/बाइफरकेशन/अपार्टमेंटलाइेजेशन निषेध है।सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस फैसले की कॉपी यूनियन ऑफ इंडिया के केबिनेट सेक्रेटरी और सभी राज्यों के चीफ सेक्रेटरीज को भेजी जाए ताकि इसमें दिए गए आब्जर्वेशन वह देख सकें। सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीद जताई है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारें इस दिशा में उचित कदम उठाएंगी।
मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
- हेरिटेज कमेटी चंडीगढ़ में फेज-1 में रिडेंसिफिकेशन का मुद्दे पर गौर करें।
- हेरिटेज कमेटी अपनी खुद की सिफारिशों पर विचार करेगी जिसमें नार्दन सेक्टरों को उनके मौजूदा स्वरुप में ही संरक्षित रखने की बात कही गई है।
- हेरिटेज कमेटी रिडेंसिफिकेशन का पार्किंग और ट्रैफिक जैसे मुद्दों पर पड़ने वाले प्रभाव पर विचार करेगी।
- हेरिटेज कमेटी द्वारा मुद्दों पर विचार करने के बाद चंडीगढ़ प्रशासन मास्टर प्लान-2031 और 2017 के रुल्स पर वहां तक संशोधन पर विचार करेगा जो फेज-1 में लागू होते हैं। इस दौरान हेरिटेज कमेटी की सिफारिशों पर गौर करना होगा।
- प्रशासन द्वारा की गई सिफारिशों को केंद्र सरकार के समक्ष मंजूरी के लिए रखना होगा। इस दौरान ली कार्बूजिए जोन का हेरिटेज स्टेटस बना रहे, इसे लेकर भी गौर करना होगा।
- जब तक केंद्र सरकार इस मामले में कोई फैसला नहीं लेती तब तक चंडीगढ़ प्रशासन किसी भी बिल्डिंग का प्लान सेंक्शन नहीं करेगा जो किसी सिंगल ड्वैलिंग यूनिट को तीन अलग अपार्टमेंट में तीन अंजान लोगों में बांटना प्रतीत होता हो।
- उस रिहायशी यूनिट के सह-मालिकों के बीच कोई MoU या समझौता रजिस्टर्ड या कानूनी रुप से मान्य नहीं होगा जिसमें सिंगल रिहायशी यूनिट की फ्लोर वाइस अपार्टमेंट्स के रुप में बाइफरकेशन या डिविजन का मकसद सामने आए।
- इसके बाद चंडीगढ़ प्रशासन और केंद्र सरकार FAR(फ्लोर एरिया रेशो) को फ्रीज कर आगे नहीं बढ़ाएगी।
- फेज-1 में तीन फ्लोर से ज्यादा नहीं होगी और इनकी ऊंचाई भी एक जैसी होगी जैसा हेरिटेज कमेटी उचित समझेगी जिससे फेज-1 का हेरिटेज स्टेटस बना रहे।
- हेरिटेज कमेटी से विचार और केंद्र की मंजूरी के बिना चंडीगढ़ प्रशासन किसी भी रुल्स या बॉय-लॉज को पुन: लागू नहीं करेगी और न ही तय करेगी।
पर्यावरण के नुकसान पर गौर करने का अहम वक्त
सुप्रीम कोर्ट ने केस की सुनवाई के दौरान कहा कि यह राज्य और केंद्र स्तर पर विधानपालिका, कार्यकारिणी और पॉलिसी मेकर्स के लिए अहम वक्त है जब वह अव्यवस्थित ढंग से हो रही डेवलपमेंट से पर्यावरण पर होने वाले नुकसान पर गौर करें। वहीं ऐसे आवश्यक उपाय लागू करें जिनसे पर्यावरण को नुकसान न हो। पर्यावरण सुरक्षा और डेवलपमेंट के बीच एक उचित संतुलन ज़रुरी है। ऐसे में विधानपालिका, कार्यकारिणी और पॉलिसी मेकर्स को अपील की गई है कि एनवायरन्मेंटल इम्पैक्ट असेसमेंट स्टडीज को लेकर आवश्यक प्रावधान बनाएं। इसके बाद ही अर्बन डेवलपमेंट के लिए मंजूरी दें।
RWA ने जताया था विरोध
मामले में सरीन मेमोरियल लीगल एड फाउंडेशन के महासविव और हाईकोर्ट के सीनियर एडवोकेट एमएल सरीन अपार्टमैंट बनाए जाने के प्रशासनिक कदम के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए थे। फाउंडेशन ने अपार्टमैंट का विरोध कर रहे रेजीडेंट वेलफेयर एसोसिएशन(RWA) का समर्थन भी किया था।
इंडिपेंडेंट घरों को तोड़ फ्लोर वाइस बना लिया था
कुछ लोगों ने इंडिपेंडेंट मकान खरीदे और उन्हें तोड़ कर फ्लोर वाइस बनाना शुरू कर दिया। जिसके बाद शेयर वाइज उन्हें आगे बेच दिया। ऐसे में RWA को सुप्रीम कोर्ट का रुख करना पड़ा था। ग्राउंड फ्लोर और बेसमैंट को 50 प्रतिशत शेयर माना गया और फर्स्ट फ्लोर को 30 प्रतिशत शेयर एवं सेकेंड फ्लोर का 20 प्रतिशत शेयर था।
सोनिया गांधी तक पहुंचा था मुद्दा
वर्ष 2006 में शहरवासियों का एक प्रतिनिधिमंडल UPA चेयरपर्सन सोनिया गांधी से मिला था। जिसमें शहर के पहले चीफ आर्किटेक्ट एमएन शर्मा भी शामिल थे। उन्होंने मामले में दखल देने की मांग की थी। ऐसे में अपार्टमैंट रूल्स को निरस्त कर दिया गया था। हालांकि बाद में फिर से अपार्टमेंट रूल्स को अपना लिया गया।
हाईकोर्ट में दायर की थी याचिका
वर्ष 2016 में सेक्टर 10 की रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में एक याचिका भी दायर की थी। इसे सरीन मेमोरियल लीगल फाउंडेशन ने भी समर्थन दिया था। इसमें कहा गया था कि इन अपार्टमैंट के बनने से न सिर्फ शहर की मूल छवि खराब होगी बल्कि शहर की सड़कों पर भी जाम बढ़ेगा क्योंकि एक ही इंडिपेंडेंट घर में कई परिवार आकर रहने लगेगें। हालांकि हाईकोर्ट ने मामले में सीमित राहत ही प्रदान की थी।
इसके बाद RWA को सुप्रीम कोर्ट की शरण लेनी पड़ी थी। बता दें कि हाईकोर्ट ने मामले में सुनवाई के दौरान इस्टेट ऑफिस को एक सर्वे करने को कहा था। इसमें पाया गया कि कई परिवार इस तरह मकान की हिस्सेदारी (शेयर बेसिस) पर रह रहे हैं।