चंडीगढ़: चंडीगढ़ में IDFC फर्स्ट बैंक की शाखा में करोड़ों रुपये की कथित धोखाधड़ी का मामला सामने आया है. हरियाणा सरकार से जुड़े कुछ खातों में बड़ी वित्तीय गड़बड़ी पकड़ी गई. बैंक ने खुद स्टॉक एक्सचेंज को सूचना देकर बताया कि कुछ कर्मचारियों ने बाहरी लोगों के साथ मिलकर अनधिकृत और गलत तरीके से लेन-देन किए. इस मामले में चार कर्मचारियों को सस्पेंड कर दिया गया है. हरियाणा सरकार का निर्देश: मामला सामने आने के बाद हरियाणा सरकार ने सख्त रूख अख्तियार करते हुए दो निजी बैंकों में संचालित सरकारी खाते 31 मार्च तक बंद करने के आदेश जारी किए. सभी विभागों, बोर्डों और निगमों को निर्देश दिए गए हैं कि वे निर्धारित तिथि तक निजी बैंकों से अपनी जमा राशि निकाल लें. भविष्य में सरकारी खाते केवल राष्ट्रीयकृत बैंकों में ही खोले जाएंगे. अशोक अरोड़ा का आरोप: वहीं, इस मामले पर भारत ने कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री अशोक अरोड़ा से बातचीत की. अशोक अरोड़ा ने अधिकारियों की मिलीभगत का आरोप लगाते हुए कहा कि, "यह बहुत बड़ी लापरवाही है और अधिकारियों की मिलीभगत सामने आ रही है. सरकार को स्पष्ट आदेश है कि सरकारी पैसा केवल सरकारी बैंकों में ही जमा होना चाहिए. जिन्होंने इस घोटाले में हिस्सा लिया है, चाहे बड़े अधिकारी हों या छोटे, उनके खिलाफ तुरंत जांच और कार्रवाई होनी चाहिए क्योंकि यह जनता का पैसा है और इसे निजी हितों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.
हरियाणा में चल रहे अन्य घोटालों पर भी उठाए जाएंगे सवाल: अशोक अरोड़ा ने आगे कहा कि, "यह मामला केवल एक घोटाला नहीं है. पिछले दस सालों में हरियाणा में कई वित्तीय घोटाले हुए हैं, जैसे रजिस्ट्री घोटाला, स्टैंप ड्यूटी घोटाला और मजदूर कल्याण के लिए आए 1500 करोड़ रुपये में घोटाला. ये सभी मुद्दे हरियाणा विधानसभा में उठाए जाएंगे और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की जाएगी." कुमारी सैलजा की प्रतिक्रिया: इस मामले में कांग्रेस सांसद कुमारी सैलजा ने भी X पर प्रतिक्रिया दी है. कुमारी सैलजा ने लिखा है कि, " आईडीएफसी बैंक में हरियाणा सरकार के खातों से जुड़े ₹590 करोड़ का एक बड़ा घोटाला सामने आया है. यह सरकारी धन हरियाणा की जनता का पैसा है, जिसकी सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित करना भाजपा सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है. सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि इतने लंबे समय तक सरकार को इस घोटाले की जानकारी क्यों नहीं हुई? क्या वित्तीय निगरानी तंत्र पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है, या फिर जानबूझकर अनदेखी की गई? यदि 18 विभागों के खातों में करोड़ों रुपये का अंतर बना रहा, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था पर गंभीर आघात है."
निष्पक्ष जांच की मांग: आगे सैलजा ने लिखा, " भाजपा सरकार के कार्यकाल में बार-बार सामने आ रहे घोटाले उसकी कार्यशैली और भ्रष्टाचार पर गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं. पारदर्शिता और सुशासन के दावे तब खोखले प्रतीत होते हैं, जब जनता के धन की सुरक्षा ही सुनिश्चित नहीं हो पाती. इस पूरे घोटाले की निष्पक्ष, उच्च स्तरीय और समयबद्ध जांच तत्काल कराई जानी चाहिए. प्रत्येक स्तर पर जिम्मेदारी तय हो और हर दोषी के विरुद्ध कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए. जनता के धन की रक्षा करना सरकार का प्रथम दायित्व है, और इस पर किसी प्रकार का समझौता स्वीकार्य नहीं है."