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21 फ़रवरी, 2026 06:14 PM

नई दिल्ली: प्रसिद्ध बंगाली लेखक मणि शंकर मुखोपाध्याय, जिन्हें साहित्य जगत में ‘शंकर’ के नाम से जाना जाता था, का 93 वर्ष की आयु में शुक्रवार को कोलकाता के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। उनके निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए परिवार, मित्रों और पाठकों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की।

प्रधानमंत्री की श्रद्धांजलि

प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि शंकर बंगाली साहित्य की एक बड़ी हस्ती थे, जिन्होंने अपने शब्दों के माध्यम से लोगों के जीवन को संवेदनशीलता और गहरी समझ के साथ प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि उनकी रचनाओं ने अनेक पीढ़ियों के पाठकों को प्रभावित किया और भारतीय साहित्य को समृद्ध बनाया।

समृद्ध साहित्यिक विरासत

मणि शंकर मुखोपाध्याय का जन्म 7 दिसंबर 1933 को हुआ था। वे बंगाली साहित्य के अत्यंत लोकप्रिय और प्रभावशाली लेखकों में गिने जाते थे। उनकी रचनाएं शहरी जीवन की जटिलताओं, महत्वाकांक्षाओं, नैतिक द्वंद्वों और सामाजिक यथार्थ का जीवंत चित्रण करती हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में चौरंगी, सीमाबद्ध, जनअरण्य, कतो अजाना और एक एका एकाशी शामिल हैं।

सिनेमा और साहित्य पर गहरा प्रभाव

उनकी कृतियों पर आधारित कई फिल्में भी बनीं। चौरंगी का फिल्म रूपांतरण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रहा। इसके अलावा सीमाबद्ध और जनअरण्य जैसी फिल्मों ने भी उनकी रचनात्मक दृष्टि को व्यापक पहचान दिलाई।

पुरस्कार और लेखन की विशेषता
लगभग सात दशकों के लेखन जीवन में शंकर ने अनेक उपन्यास, कहानी संग्रह, संस्मरण और निबंध लिखे। वर्ष 2020 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी लेखनी व्यंग्य, हास्य और गहन मानवीय संवेदना के संतुलित संयोजन के लिए जानी जाती थी, जिसने शहरी मध्यम वर्ग के जीवन और संघर्षों को सशक्त अभिव्यक्ति दी।

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