बलौदाबाजार। छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार जिले की ग्राम पंचायत कटगी एक छोटा-सा गांव, लेकिन पहचान बड़ी। करीब चार हजार से अधिक आबादी वाले इस गांव में कदम रखते ही सुनाई देती है खटर-पटर की लयबद्ध आवाज़, मानो पूरा गांव ही एक विशाल हथकरघा वर्कशॉप हो। यहां की लगभग हर गली, हर आंगन, और हर घर में हथकरघा मशीनें लगातार चलती रहती हैं। गत दो दशकों से अधिक समय से यहां की अधिकांश आबादी—देवांगन समाज के बुनकर (जिन्हें ‘कोस्टा’ भी कहा जाता है)—कपड़ा बुनाई के काम में जुटी है। यह सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि यहां की संस्कृति और परंपरा का हिस्सा है।
काम की शुरुआत धागे को रंगने और सुखाने से होती है। इसके बाद बुनकर महीन डिज़ाइन और कलाकृतियों से साड़ियों को जीवन देते हैं। पहले यहां सिर्फ सफेद साड़ियां बनती थीं, लेकिन अब बड़े महाजनों के ऑर्डर पर रंग-बिरंगे धागों से भी साड़ियां तैयार की जाती हैं। इन रंगीन साड़ियों ने कटगी की पहचान देश-विदेश तक पहुंचा दी है।
महिलाएं हों या पुरुष—हर कोई इस काम में निपुण है। खास बात यह है कि गांव की युवा पीढ़ी भी अब बुनाई में दिलचस्पी ले रही है, जिससे यह पारंपरिक कला न सिर्फ बची है बल्कि और भी निखर रही है। बड़े महाजन बुनकरों को धागा उपलब्ध कराते हैं और तैयार साड़ियां वापस ले जाते हैं। इसके बदले बुनकरों को मेहनताने के रूप में अच्छी-खासी आमदनी होती है जिससे उनकी आजीविका चलती है। कटगी आज उस मिसाल के रूप में खड़ा है, जहां मेहनती हाथ सिर्फ कपड़े नहीं, बल्कि संस्कृति, पहचान और गर्व की कहानी बुनते हैं।