मुंबई। अनुराग कश्यप की मोस्ट अवेटेड फिल्म ‘निशानची’ आज सिनेमाघरों में रिलीज हो गई। अनुराग कश्यप ने कहा का कहना है कि उन्हें ‘निशानची’ बनाने में 9 साल लग गए। वह इस फिल्म को लेकर किसी भी चीज के साथ समझौता नहीं करना चाहते, इसी वजह ‘निशानची’ को बनने में इतना वक्त लगा। इस फिल्म से बाल ठाकरे के पोते ऐश्वर्य ठाकरे बॉलीवुड में बतौर मुख्य अभिनेता डेब्यू कर रहे हैं और उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया है। उन्होंने अपनी पहली फिल्म के लिए काफी मेहनत की है, जो फिल्म में साफ दिखाई देती है।
क्या है फिल्म की कहानी?
फिल्म की कहानी दो टाइमलाइन में चलती है, वर्तमान और अतीत। वर्तमान में, जुड़वां भाई बबलू और डबलू (ऐश्वर्य ठाकरे), रिंकू (वेदिका पिंटो) के साथ मिलकर एक लोकल बैंक डकैती की असफल कोशिश करते हैं। डकैती फेल होती है और बबलू को दस साल की जेल हो जाती है। रिंकू, जिसने अपने पिता को खो दिया है, अब मजबूरी में नौटंकी के मंच पर नाचने को विवश है। बबलू उससे जुनूनी मोहब्बत करता है। इसके बाद कहानी पीछे जाती है, अतीत की तरफ।
यहां सामने आते हैं उनके माता-पिता, मंजरी (मोनिका पंवार) और जबरदस्त सिंह (विनीत कुमार सिंह)। मंजरी एक स्टेट-लेवल की माहिर निशानेबाज थी और जबरदस्त सिंह अखाड़े का उभरता पहलवान। लेकिन राजनीति, भाई-भतीजावाद और धोखेबाजी ने उनके सपनों को कुचल दिया। इसी दौरान जबरदस्त सिंह का सबसे करीबी दोस्त, अंबिका प्रसाद (कुमुद मिश्रा), उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा दुश्मन बनकर सामने आता है। वही असली आस्तीन का सांप था, जबरदस्त सिंह की हत्या भी उसी ने करवाई, और सालों से उसकी नजर सिर्फ संपत्ति पर ही नहीं, बल्कि उसकी विधवा मंजरी पर भी रही।
इधर, इन सब सच्चाइयों से अनजान बबलू, बड़ा होकर उसी अंबिका प्रसाद के लिए काम करने लगता है। अंबिका प्रसाद उसे इस्तेमाल करता है और अखाड़े के मुखिया (राजेश कुमार) का खून बबलू से करवाकर उसे जेल भिजवाता है। जेल से छूटकर लौटा बबलू और भी बेलगाम हो चुका है। अब वह रिंकू से दीवानगी की हद तक मोहब्बत करता है, हालांकि वही रिंकू के पिता का हत्यारा भी है। कहानी में सबसे बड़ा टकराव तब होता है जब बबलू, अपने चाचा समान अंबिका प्रसाद से रिंकू के लिए उसी के खिलाफ बगावत करता है। बबलू का यह विद्रोह अंबिका के साम्राज्य में भूचाल ला देता है। बदले, प्यार और विरासत के इस खेल में हर रिश्ता खून से सना है और हर मोड़ पर कहानी और खतरनाक हो जाती है।
फिल्म की कहानी छोटी है, लेकिन इसे बहुत लंबा बना दिया गया है, जिससे फिल्म शुरू से ही धीमी और उबाऊ लगती है। अगर अनुराग कश्यप ने इस 177 मिनट की फिल्म को 120 मिनट का कर दिया होता, तो यह और भी बेहतर हो सकती थी। फिल्म का अभिनय अच्छा है, बस कहानी थोड़ी घिसी-पिटी है, पुराने बॉलीवुड अंदाज में। कुल मिलाकर, आप इस फिल्म को अपने जोखिम पर देख सकते हैं।