नई दिल्ली/जयपुर : देश के उपराष्ट्रपति जैसे बड़े पद से अचानक इस्तीफा देने के ठीक एक महीने बाद, जगदीप धनखड़ एक बार फिर सियासी चर्चा के केंद्र में हैं। इस बार मुद्दा उनकी 42 हजार रुपये की एक पेंशन अर्जी है, जिसकी पुष्टि अब खुद राजस्थान विधानसभा के स्पीकर वासुदेव देवनानी ने भी कर दी है। इस एक आवेदन ने न केवल राजस्थान की 'डबल पेंशन' नीति पर बहस छेड़ दी है, बल्कि विपक्ष को धनखड़ के इस्तीफे के पीछे की 'असली वजह' पर सवाल उठाने का एक और मौका दे दिया है ।
42 हजार की पेंशन और सुविधाओं के लिए आवेदन
स्पीकर वासुदेव देवनानी ने फोन पर हुई बातचीत में पुष्टि की है कि पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का पूर्व विधायक के तौर पर पेंशन के लिए आवेदन उन्हें मिला है। धनखड़ 1993 में अजमेर की किशनगढ़ सीट से कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुने गए थे ।
राजस्थान के नियमों के अनुसार, 70 साल से अधिक उम्र के पूर्व विधायकों को 20% अतिरिक्त पेंशन मिलती है। चूँकि धनखड़ 74 साल के हैं, इसलिए उन्हें 35,000 रुपये की मूल पेंशन पर 20% की बढ़ोतरी के साथ कुल 42,000 रुपये मासिक पेंशन मिलेगी । इसके साथ ही उन्हें बस यात्रा, इलाज और सरकारी गेस्ट हाउस में रियायती दरों पर रुकने जैसी सुविधाएं भी मिलेंगी ।
धनखड़ का सियासी सफर: विधायक से लेकर उपराष्ट्रपति तक
यह जानना दिलचस्प है कि जगदीप धनखड़ का राजनीतिक करियर काफी लंबा और विविध रहा है। विधायक बनने से पहले वह 1989 में झुंझुनूं सीट से लोकसभा सांसद भी रह चुके हैं और चंद्रशेखर सरकार में केंद्रीय मंत्री की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं ।
2019 में उन्हें पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाया गया, जहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ उनके टकराव की खबरें अक्सर सुर्खियां बनती थीं । अगस्त 2022 में वह देश के उपराष्ट्रपति बने, लेकिन 21 जुलाई 2025 को स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अचानक इस्तीफा दे दिया।
'दाल में कुछ काला है' - इस्तीफे पर विपक्ष ने फिर उठाए सवाल
धनखड़ के इस्तीफे के बाद से ही विपक्ष लगातार सरकार पर हमलावर है। अब पेंशन की इस अर्जी ने विपक्ष को नए सिरे से सवाल पूछने का मौका दे दिया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने तंज कसते हुए कहा, "हमें तो लगता है दाल में कुछ काला है।
उनकी सेहत तो बहुत अच्छी थी। वह जितना RSS और BJP का बचाव करते थे, उतना तो उनके अपने लोग भी नहीं करते होंगे।" खरगे ने मांग की है कि सरकार को धनखड़ के इस्तीफे के पीछे के असली कारणों को देश के सामने लाना चाहिए।
इस्तीफे के बाद से धनखड़ किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम में नहीं दिखे हैं, लेकिन उनकी एक पेंशन अर्जी ने देश की राजनीति में एक नया बवंडर जरूर खड़ा कर दिया है