भारतीय सेना लगातार आधुनिकीकरण की ओर बढ़ रही है। खासतौर पर आधुनिक युद्धों की तकनीक व तौर तरीकों पर काम किया जा रहा है। यही कारण है कि युद्धक ड्रोन व मानव रहित हवाई प्रणालियां लगातार भारतीय सेना में शामिल की जा रही हैं।
भारतीय सेना के मुताबिक, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से मिले सबक और वैश्विक स्तर पर मौजूदा परिचालन स्थितियों को ध्यान में रखते हुए मानवरहित हवाई प्रणालियों (यूएएस) और काउंटर मानव रहित हवाई प्रणालियों (सी-यूएएस) के उपयोग व परिचालन क्षमता पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
नई दिल्ली में सम्पन्न हुए आर्मी कमांडर्स कांफ्रेंस के दौरान वरिष्ठ सैन्य नेतृत्व ने इस पर चर्चा की। द्विवार्षिक आर्मी कमांडर्स कांफ्रेंस (एसीसी) 13 से 16 अप्रैल तक आयोजित किया गया था। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी की अध्यक्षता में आयोजित इस सम्मेलन में शीर्ष सैन्य नेतृत्व ने भाग लिया। कैबिनेट सचिव, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ, रक्षा सचिव और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड (एनएसबीए) अध्यक्ष के अलावा नौसेना प्रमुख सहित सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने कमांडर्स को संबोधित किया।
वहीं भारतीय सेना ने ‘भविष्य के लिए तैयार बल’ के रूप में विकसित होने की परिकल्पना के अनुरूप वर्ष 2026 को नेटवर्किंग और डेटा केंद्रितता का वर्ष घोषित किया है। इस सम्मेलन में सेना के आधुनिकीकरण व युद्ध अभियानों में प्रौद्योगिकी के समावेश पर मंथन किया गया। सेना की सैद्धांतिक और प्रशिक्षण संबंधी आवश्यकताओं के साथ-साथ ऑपरेशनल तत्परता बढ़ाने पर भी विचार किया गया। इसके अलावा उभरती सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए नेटवर्किंग और डेटा केंद्रितता से संबंधित कई मुद्दों पर कमांडर्स के साथ चर्चा की गई।
रक्षा मंत्रालय के मुताबिक बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य और उभरते वैश्विक, क्षेत्रीय और आंतरिक सुरक्षा संबंधी पहलुओं पर इस सम्मेलन में बात की गई। वैश्विक संघर्षों से प्राप्त सबकों का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए, वक्ताओं ने देश की रणनीतिक और सुरक्षा हितों की गारंटीकृत सुरक्षा के लिए कठोर शक्ति की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने अंतर-मंत्रालयी समन्वय, नागरिक और सैन्य संस्थानों के बीच बेहतर तालमेल और जटिल सुरक्षा चुनौतियों के समन्वित राष्ट्रीय समाधान के लिए राष्ट्रव्यापी दृष्टिकोण पर जोर दिया। चर्चा के दौरान यह बात सामने आई कि वर्तमान आपूर्ति श्रृंखला संकट को देखते हुए रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को मजबूत करने और दीर्घकालिक रणनीतिक लचीलापन सुनिश्चित करने के लिए स्वदेशी उत्पादन क्षमताओं को बढ़ाने की तत्काल आवश्यकता है।