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सिर्फ Marriage Certificate बनाने से नहीं बनेंगे पति-पत्नी... सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

04 फ़रवरी, 2026 05:18 PM

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि सिर्फ मैरिज सर्टिफिकेट लेना ही शादी की वैधता तय नहीं करता। कोर्ट ने कहा कि रस्मों और परंपराओं के बिना रजिस्ट्रेशन सिर्फ कागज़ों तक सीमित है और यह शादी की पवित्रता को नहीं दर्शाता। यह फैसला उन मामलों के लिए अहम है जहां लोग वीजा, सरकारी लाभ या अन्य सुविधाओं के लिए केवल रजिस्ट्रेशन करवा लेते हैं। कोर्ट ने युवाओं से अपील की है कि वे शादी के सांस्कृतिक और कानूनी महत्व को गंभीरता से समझें।

हिंदू विवाह: मात्र दिखावा नहीं, बल्कि एक पवित्र बंधन
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में जोर देकर कहा कि हिंदू विवाह को केवल नाच-गाने, खान-पान या मनोरंजन के आयोजन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह कोई व्यापारिक समझौता (कमर्शियल ट्रांजेक्शन) भी नहीं है। भारतीय संस्कृति में विवाह परिवार की नींव है और एक ऐसी पवित्र संस्था है जो पति-पत्नी को जीवनभर के लिए गरिमापूर्ण, बराबरी और आपसी सहमति पर आधारित एक स्वस्थ रिश्ता प्रदान करती है।

कानूनी पंजीकरण और धार्मिक रस्मों का अंतर
अदालत ने एक अहम कानूनी बिंदु को स्पष्ट करते हुए कहा कि 'स्पेशल मैरिज एक्ट' के तहत होने वाले पंजीकरण से भले ही विवाह को मान्यता मिल जाए, लेकिन 'Hindu Marriage Act' के मामले में ऐसा नहीं है। हिंदू कानून के अनुसार, जब तक तय धार्मिक रस्में पूरी नहीं की जातीं, तब तक शादी को वैध नहीं माना जा सकता। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 के तहत अनिवार्य अनुष्ठान (जैसे फेरे आदि) करना जरूरी है, अन्यथा वह संबंध कानूनी रूप से विवाह की श्रेणी में नहीं आएगा।

रजिस्ट्रेशन केवल प्रमाण है, विवाह का आधार नहीं
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि कानून की धारा 8 के तहत शादी का रजिस्ट्रेशन केवल इस बात का सबूत होता है कि शादी हुई है। रजिस्ट्रेशन अपने आप में शादी पैदा नहीं करता। यदि धारा 7 के मुताबिक आवश्यक रस्में नहीं निभाई गई हैं, तो केवल सरकारी कागजों पर पंजीकरण करा लेने से उस रिश्ते को कानूनी वैधता नहीं मिल जाती। प्रमाण पत्र केवल एक दस्तावेजी साक्ष्य है, वह रस्मों का विकल्प नहीं हो सकता।

अदालत का अंतिम फैसला और प्रमाण पत्र रद्द
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी विशेष शक्तियों (अनुच्छेद 142) का प्रयोग करते हुए एक बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने घोषित किया कि चूंकि निर्धारित रस्में पूरी नहीं हुई थीं, इसलिए संबंधित पक्षकारों के बीच कोई हिंदू विवाह हुआ ही नहीं था। इस आधार पर 'वादिक जनकल्याण समिति' द्वारा जारी किए गए प्रमाण पत्र और उत्तर प्रदेश सरकार के मैरिज रजिस्ट्रेशन, दोनों को पूरी तरह से अमान्य (नल एंड वॉइड) करार दे दिया गया। कोर्ट के अनुसार, दोनों पक्ष कभी कानूनी रूप से पति-पत्नी बने ही नहीं थे।

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