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विश्वकर्मा पूजा : सृजन, श्रम और कौशल के सम्मान से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता भारत

17 सितंबर, 2026 01:45 PM

भारत की सांस्कृतिक परंपरा में ऐसे अनेक पर्व हैं, जो केवल पूजा-अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहते, बल्कि जीवन के किसी महत्वपूर्ण मूल्य को समाज के सामने रखते हैं। विश्वकर्मा पूजा भी ऐसा ही पर्व है। यह सृजन, श्रम, कौशल, तकनीकी दक्षता और निर्माण की उस गौरवशाली परंपरा का सम्मान करने का अवसर है, जिसके बल पर सभ्यताओं ने आकार लिया और मानव जीवन निरंतर आगे बढ़ा। भवनों के निर्माण से लेकर खेती के औजारों तक, मशीनों के संचालन से हस्तशिल्प तक, इंजीनियरिंग से आधुनिक तकनीक तक हर क्षेत्र में कुशल हाथों और सृजनशील बुद्धि की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में भगवान विश्वकर्मा को दिव्य शिल्पकार और वास्तुकार के रूप में स्मरण किया जाता है। उन्हें निर्माण, वास्तुकला, शिल्प और तकनीकी दक्षता का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि विश्वकर्मा पूजा कारीगरों, शिल्पकारों, इंजीनियरों, तकनीशियनों, मशीनों से जुड़े श्रमिकों, कारखानों और कार्यशालाओं के लिए विशेष महत्व रखती है।

हर वर्ष 17 सितंबर को मनाई जाने वाली विश्वकर्मा जयंती या विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर औजारों, मशीनों और कार्यस्थलों की पूजा की जाती है। इस परंपरा में एक गहरा संदेश निहित है काम के साधनों का सम्मान, वास्तव में श्रम और कौशल से जुड़े हाथों का सम्मान है। आज जब भारत तकनीकी आत्मनिर्भरता, विनिर्माण, डिजिटल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स, हरित ऊर्जा और आधुनिक बुनियादी ढांचे के विस्तार की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब इस पर्व की प्रासंगिकता और भी व्यापक हो जाती है। यह हमें स्मरण कराता है कि विकास केवल पूंजी और मशीनों से नहीं होता; उसके पीछे ज्ञान, कौशल, श्रम, अनुशासन, नवाचार और सृजनशीलता की वह शक्ति होती है, जो सपनों को आकार और राष्ट्र की प्रगति को गति देती है।

भगवान विश्वकर्मा का पौराणिक और सांस्कृतिक स्वरूप

भारतीय परंपरा में भगवान विश्वकर्मा को देवताओं के शिल्पकार और वास्तुकार के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। धार्मिक मान्यताओं में उन्हें ऐसी दिव्य निर्माण क्षमता से युक्त माना गया है, जिसके माध्यम से भव्य भवनों, नगरों, अस्त्र-शस्त्रों और विभिन्न संरचनाओं का निर्माण संभव हुआ। इस कारण विश्वकर्मा केवल किसी एक पेशे या समुदाय के आराध्य नहीं हैं, बल्कि व्यापक अर्थ में निर्माण और सृजन की शक्ति के प्रतीक हैं। भारतीय संस्कृति में शिल्प और निर्माण की परंपरा बहुत पुरानी रही है। मंदिरों की स्थापत्य कला, मूर्तिकला, धातुकर्म, वस्त्र निर्माण, आभूषण, लकड़ी का काम, मिट्टी के बर्तन और विभिन्न प्रकार के हस्तशिल्प में पीढ़ियों से विकसित तकनीकी ज्ञान दिखाई देता है। इन परंपराओं ने भारतीय समाज के आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विश्वकर्मा पूजा इसी व्यापक परंपरा का प्रतीकात्मक रूप है। इसमें मशीन, औजार और उपकरण केवल निर्जीव वस्तुएं नहीं रह जाते, बल्कि वे मानव श्रम और सृजन के सहयोगी के रूप में देखे जाते हैं। पूजा के माध्यम से उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।

श्रम को सम्मान देने की भारतीय परंपरा

विश्वकर्मा पूजा का सबसे महत्वपूर्ण संदेश श्रम की गरिमा से जुड़ा है। किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति केवल बड़े संस्थानों, इमारतों और उद्योगों से नहीं होती। उनके निर्माण और संचालन के पीछे लाखों-करोड़ों लोगों का श्रम होता है। बढ़ई लकड़ी को आकार देता है, लोहार धातु को उपयोगी वस्तु में बदलता है, कुम्हार मिट्टी से जीवनोपयोगी सामान तैयार करता है, सुनार आभूषण बनाता है, बुनकर कपड़ा तैयार करता है और मूर्तिकार पत्थर में आकार और सौंदर्य पैदा करता है। आधुनिक समय में यही सृजनशीलता इंजीनियर, डिजाइनर, तकनीशियन, मैकेनिक, मशीन ऑपरेटर और वैज्ञानिक अलग-अलग रूपों में आगे बढ़ाते हैं। इस दृष्टि से विश्वकर्मा पूजा श्रम को केवल आजीविका का साधन नहीं मानती, बल्कि उसे समाज निर्माण की शक्ति के रूप में देखने का अवसर देती है। किसी व्यक्ति का काम छोटा या बड़ा नहीं, बल्कि उसके कौशल और समाज के लिए उसकी उपयोगिता महत्वपूर्ण है। यह संदेश आज इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आधुनिक अर्थव्यवस्था में ज्ञान आधारित कार्यों और हाथ से किए जाने वाले कामों के बीच अक्सर एक कृत्रिम अंतर दिखाई देता है। वास्तव में दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। मशीन को डिजाइन करने वाला इंजीनियर और उसे संचालित करने वाला तकनीशियन, दोनों उत्पादन प्रक्रिया के आवश्यक हिस्से हैं।

प्राचीन शिल्प से आधुनिक तकनीक तक की यात्रा

भारत के तकनीकी इतिहास को देखें तो यहां शिल्प और निर्माण की लंबी परंपरा रही है। प्राचीन नगर नियोजन, धातुकर्म, स्थापत्य, मूर्तिकला और जल प्रबंधन से लेकर विभिन्न प्रकार के हस्तशिल्प तक भारतीय समाज में तकनीकी ज्ञान का विकास लगातार हुआ। समय के साथ औजार बदले, तकनीक बदली और उत्पादन के तरीके बदले। हाथ से चलने वाले औजारों की जगह मशीनों ने ली। छोटे कारखानों की जगह बड़े औद्योगिक संयंत्र आए। अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स, ऑटोमेशन और डिजिटल डिजाइन उत्पादन प्रक्रिया को नई दिशा दे रहे हैं। लेकिन इस बदलाव के बावजूद मूल तत्व वही है मनुष्य की सृजनशीलता और कौशल। तकनीक कितनी भी उन्नत क्यों न हो, उसे विकसित करने, समझने, नियंत्रित करने और उपयोगी परिणाम में बदलने के लिए कुशल मानव संसाधन आवश्यक है। इसलिए विश्वकर्मा पूजा को प्राचीन शिल्प से आधुनिक तकनीक तक की भारत की यात्रा के प्रतीक के रूप में भी देखा जा सकता है। यह परंपरा और आधुनिकता के बीच किसी टकराव का नहीं, बल्कि दोनों के बीच संवाद का अवसर प्रदान करती है।

औद्योगिक भारत में विश्वकर्मा पूजा

औद्योगिक क्षेत्रों, कारखानों, निर्माण इकाइयों, कार्यशालाओं और तकनीकी संस्थानों में विश्वकर्मा पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन मशीनों और औजारों की सफाई की जाती है, उन्हें सजाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है। इसके पीछे केवल धार्मिक भावना नहीं है। मशीनों के प्रति सम्मान का अर्थ यह भी है कि उनका सुरक्षित और जिम्मेदारीपूर्ण उपयोग किया जाए। नियमित रखरखाव, तकनीकी जांच और सुरक्षा नियमों का पालन किसी भी औद्योगिक इकाई की सफलता के लिए जरूरी है। इस दृष्टि से विश्वकर्मा पूजा को कार्यस्थल की सुरक्षा और दक्षता से भी जोड़ा जा सकता है। जिस मशीन से उत्पादन होता है, उसकी देखभाल करने से उसकी उपयोगिता बढ़ती है और दुर्घटनाओं की संभावना कम होती है। इस पर्व का एक व्यावहारिक संदेश यह भी है कि काम के साधनों की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। चाहे पारंपरिक औजार हों या अत्याधुनिक मशीनें, उनकी उचित देखभाल और सही इस्तेमाल उत्पादन की गुणवत्ता और श्रमिकों की सुरक्षा दोनों के लिए आवश्यक है।

कौशल विकास : बदलते भारत की बड़ी जरूरत

आज की अर्थव्यवस्था में केवल सामान्य शिक्षा पर्याप्त नहीं है। उद्योगों को ऐसे युवाओं की जरूरत है, जिनके पास व्यावहारिक और तकनीकी कौशल भी हो। यही कारण है कि कौशल विकास आधुनिक भारत की विकास यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। विश्वकर्मा पूजा के संदर्भ में कौशल का महत्व और स्पष्ट हो जाता है। पारंपरिक कारीगरों के पास अनुभव आधारित ज्ञान होता है, जबकि आधुनिक तकनीकी संस्थान वैज्ञानिक और व्यावसायिक प्रशिक्षण उपलब्ध कराते हैं। यदि दोनों को जोड़ा जाए तो नई संभावनाएं पैदा हो सकती हैं। युवाओं को केवल नौकरी तलाशने वाला नहीं, बल्कि कौशल के आधार पर रोजगार और उद्यम पैदा करने वाला बनाने की दिशा में भी काम करना आवश्यक है। बढ़ईगीरी, धातु-कला, इलेक्ट्रिकल कार्य, मशीन संचालन, वाहन मरम्मत, डिजाइन, डिजिटल निर्माण और अन्य तकनीकी क्षेत्रों में प्रशिक्षित युवाओं की मांग बढ़ रही है। कौशल का सम्मान समाज में बढ़ेगा तो पारंपरिक व्यवसायों के प्रति युवाओं की रुचि भी बढ़ सकती है। इससे रोजगार के साथ-साथ पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण में भी मदद मिलेगी।

पारंपरिक कारीगरों की भूमिका

भारत की अर्थव्यवस्था में कारीगरों और शिल्पकारों का योगदान लंबे समय से रहा है। गांवों और छोटे शहरों में अनेक परिवार पीढ़ियों से अपने पारंपरिक कौशल के माध्यम से आजीविका अर्जित करते आए हैं। लेकिन बदलते बाजार, मशीन से बने सस्ते उत्पादों की प्रतिस्पर्धा, कच्चे माल की बढ़ती कीमत और बाजार तक सीमित पहुंच जैसी चुनौतियों ने कई पारंपरिक व्यवसायों को प्रभावित किया है। नई पीढ़ी भी कई बार इन पेशों से दूर होती जा रही है। ऐसे समय में विश्वकर्मा पूजा का महत्व केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि आर्थिक भी हो जाता है। यह अवसर पारंपरिक कारीगरों के कौशल को पहचानने और उसे आधुनिक बाजार से जोड़ने की आवश्यकता की ओर ध्यान आकर्षित करता है। यदि कारीगरों को आधुनिक औजार, प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता, डिजाइन संबंधी जानकारी और बाजार उपलब्ध कराया जाए तो उनके पारंपरिक कौशल को नए आर्थिक अवसरों में बदला जा सकता है।

पीएम विश्वकर्मा योजना और पारंपरिक कौशल

17 सितंबर 2023 को शुरू की गई पीएम विश्वकर्मा योजना ने विश्वकर्मा जयंती को पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों के आर्थिक सशक्तिकरण के संदर्भ में एक नया आयाम दिया। योजना का उद्देश्य पारंपरिक कारीगरों को पहचान, कौशल प्रशिक्षण, आधुनिक औजार, वित्तीय सहायता और बाजार से जोड़ने की दिशा में सहायता देना है। इस योजना में 18 पारंपरिक शिल्पों और व्यवसायों को शामिल किया गया है। इसका व्यापक उद्देश्य यह है कि पीढ़ियों से चले आ रहे कौशल को आधुनिक आर्थिक व्यवस्था से जोड़ा जा सके। यह पहल इस बात की ओर संकेत करती है कि परंपरा को केवल संग्रहालय में संरक्षित करने के बजाय उसे जीवित आर्थिक गतिविधि के रूप में भी आगे बढ़ाया जा सकता है। यदि किसी कारीगर को बेहतर औजार मिलें, आधुनिक डिजाइन की जानकारी मिले और उसके उत्पाद को व्यापक बाजार मिले, तो पारंपरिक कौशल उसकी आय का अधिक मजबूत आधार बन सकता है। इस दृष्टि से विश्वकर्मा पूजा और कौशल आधारित आर्थिक सशक्तिकरण के बीच एक स्वाभाविक संबंध दिखाई देता है।

तकनीकी आत्मनिर्भरता और विश्वकर्मा दर्शन

आज भारत तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है। सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा तकनीक, अंतरिक्ष, रोबोटिक्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अक्षय ऊर्जा और आधुनिक विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में देश की क्षमताओं का विस्तार हो रहा है। तकनीकी आत्मनिर्भरता केवल मशीनें खरीद लेने से हासिल नहीं होती। इसके लिए डिजाइन, अनुसंधान, निर्माण, रखरखाव और नवाचार की पूरी श्रृंखला में दक्ष मानव संसाधन चाहिए। यही वह बिंदु है जहां विश्वकर्मा पूजा का पारंपरिक संदेश आधुनिक अर्थव्यवस्था से जुड़ता है। भगवान विश्वकर्मा को सृजन और निर्माण के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। आधुनिक भारत में इस विचार को कौशल, नवाचार और तकनीकी दक्षता के महत्व के रूप में समझा जा सकता है। आत्मनिर्भर भारत का आधार भी यही है कि देश केवल उपभोक्ता न रहे, बल्कि डिजाइन और निर्माण की क्षमता विकसित करे। इसके लिए वैज्ञानिक ज्ञान और पारंपरिक कौशल दोनों की जरूरत है।

डिजिटल युग में विश्वकर्मा

डिजिटल तकनीक ने कारीगरों और छोटे उद्यमियों के लिए नए अवसर खोले हैं। पहले किसी कारीगर का बाजार उसके गांव, कस्बे या आसपास के क्षेत्र तक सीमित हो सकता था। आज ई-कॉमर्स, डिजिटल भुगतान, सोशल मीडिया और ऑनलाइन मार्केटिंग के माध्यम से उसके उत्पाद देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंच सकते हैं। डिजिटल डिजाइन और नई निर्माण तकनीक पारंपरिक शिल्प को नए रूप देने में भी मदद कर सकती है। उदाहरण के लिए पारंपरिक कला और आधुनिक डिजाइन के बीच सहयोग से ऐसे उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं, जिनकी मांग राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में हो। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और 3D डिजाइन जैसी तकनीकें भी भविष्य में शिल्प और निर्माण के क्षेत्र को प्रभावित करेंगी। चुनौती यह है कि तकनीक पारंपरिक कारीगरों के लिए बाधा न बने, बल्कि उनकी उत्पादकता और बाजार पहुंच बढ़ाने का माध्यम बने।

महिलाओं की भागीदारी और आर्थिक सशक्तिकरण

भारत के अनेक पारंपरिक शिल्प और घरेलू उद्योगों में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। बुनाई, कढ़ाई, हस्तशिल्प, खाद्य प्रसंस्करण और कई अन्य गतिविधियों में महिलाओं का योगदान अक्सर परिवार और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण होता है। यदि महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण, वित्त, डिजिटल उपकरण और बाजार तक बेहतर पहुंच मिले तो पारंपरिक शिल्प आर्थिक सशक्तिकरण का माध्यम बन सकते हैं। विश्वकर्मा पूजा के व्यापक संदेश में महिलाओं के इस योगदान को भी शामिल किया जाना चाहिए। श्रम की गरिमा का अर्थ यह है कि उत्पादन प्रक्रिया में योगदान देने वाले प्रत्येक व्यक्ति के कौशल को सम्मान मिले।

पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ तकनीक

आधुनिक विकास के सामने पर्यावरण संरक्षण एक बड़ी चुनौती है। इसलिए तकनीकी विकास को ऊर्जा दक्षता और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ाना जरूरी है। पारंपरिक भारतीय शिल्प में स्थानीय सामग्री और स्थानीय संसाधनों के इस्तेमाल की अनेक मिसालें मिलती हैं। आधुनिक तकनीक के साथ इन अनुभवों का समन्वय टिकाऊ उत्पादन के नए रास्ते खोल सकता है। आज ऊर्जा-कुशल मशीनें, अक्षय ऊर्जा, कम अपशिष्ट वाली उत्पादन तकनीक और पर्यावरण-अनुकूल सामग्री का महत्व बढ़ रहा है। भविष्य का विश्वकर्मा केवल अधिक उत्पादन करने वाला शिल्पकार नहीं, बल्कि कम संसाधनों में बेहतर और टिकाऊ उत्पादन करने वाला सृजनकर्ता भी होगा।

स्थानीय से वैश्विक बाजार तक

भारतीय हस्तशिल्प और पारंपरिक उत्पादों में वैश्विक बाजार की संभावनाएं हैं। लेकिन केवल अच्छा उत्पाद होना पर्याप्त नहीं है। गुणवत्ता, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, डिजाइन, प्रमाणन और बाजार की समझ भी जरूरी है। यदि पारंपरिक कारीगरों को इन क्षेत्रों में प्रशिक्षण मिले तो स्थानीय उत्पादों को व्यापक बाजार मिल सकता है। भौगोलिक संकेतक यानी GI टैग जैसे माध्यम भी विशिष्ट स्थानीय उत्पादों की पहचान मजबूत करने में मदद करते हैं। इस दिशा में डिजिटल प्लेटफॉर्म विशेष भूमिका निभा सकते हैं। कारीगर सीधे उपभोक्ता तक पहुंच सकते हैं और बिचौलियों पर निर्भरता कम कर सकते हैं। हालांकि इसके लिए डिजिटल साक्षरता और तकनीकी सहायता भी जरूरी होगी।

विश्वकर्मा पूजा का सामाजिक संदेश

विश्वकर्मा पूजा का सबसे व्यापक सामाजिक संदेश है काम करने वाले हाथों का सम्मान। समाज में अक्सर बौद्धिक काम और शारीरिक श्रम के बीच अंतर किया जाता है। लेकिन वास्तविक विकास में दोनों की समान रूप से आवश्यकता है। इंजीनियर की योजना को जमीन पर उतारने के लिए तकनीशियन चाहिए। किसी मशीन की डिजाइन को उपयोगी उत्पाद में बदलने के लिए कुशल श्रमिक चाहिए। किसी भवन के वास्तु-नक्शे को वास्तविक संरचना में बदलने के लिए अनेक कारीगरों की आवश्यकता होती है। इसलिए श्रम की गरिमा को सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बनाना आवश्यक है। विश्वकर्मा पूजा इसी भावना को मजबूत करने का अवसर प्रदान करती है।

आम नागरिक की भूमिका

विश्वकर्मा पूजा का संदेश केवल उद्योगों और कारीगरों तक सीमित नहीं होना चाहिए। आम नागरिक भी इस सोच को अपने जीवन में अपना सकते हैं। काम करने वाले व्यक्ति का सम्मान करना, तकनीकी काम को कमतर न समझना, स्थानीय कारीगरों से सामान खरीदना, स्थानीय उत्पादों को प्रोत्साहित करना और मशीनों तथा उपकरणों का सुरक्षित उपयोग करना इसके व्यावहारिक रूप हो सकते हैं। स्कूलों और कॉलेजों में भी कौशल आधारित शिक्षा को सम्मान देना जरूरी है। विद्यार्थियों को यह समझना चाहिए कि हाथ से काम करना और तकनीकी कौशल हासिल करना किसी भी तरह से कम महत्वपूर्ण नहीं है।

वर्तमान चुनौतियां और आगे की राह

विश्वकर्मा पूजा की परंपरा मजबूत है, लेकिन इसके मूल संदेश को वर्तमान समय की चुनौतियों से जोड़ना आवश्यक है। पारंपरिक कारीगरों के सामने बाजार, वित्त, तकनीक और प्रशिक्षण से जुड़ी समस्याएं हैं। दूसरी ओर उद्योगों को कुशल श्रमिकों की जरूरत है। इस अंतर को कम करने के लिए प्रशिक्षण संस्थानों, उद्योगों, कारीगर संगठनों और वित्तीय संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। पारंपरिक कौशल का दस्तावेजीकरण भी महत्वपूर्ण है ताकि पीढ़ियों से संचित ज्ञान समाप्त न हो। कारीगरों को आधुनिक डिजाइन और डिजिटल बाजार से जोड़ना, आसान वित्त उपलब्ध कराना, तकनीकी प्रशिक्षण देना और उत्पादों की गुणवत्ता सुधारना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं। सबसे जरूरी बात यह है कि कौशल को सम्मान केवल एक दिन की पूजा तक सीमित न रहे। यदि विश्वकर्मा पूजा श्रम-सम्मान का पर्व है तो वर्ष के हर दिन कार्यस्थल पर सुरक्षित वातावरण, उचित प्रशिक्षण, सम्मानजनक व्यवहार और कौशल के विकास को महत्व मिलना चाहिए।

सृजन की शक्ति को आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में लगाएं

विश्वकर्मा पूजा भारतीय संस्कृति में श्रम, शिल्प, निर्माण और सृजन की परंपरा का महत्वपूर्ण प्रतीक है। भगवान विश्वकर्मा को दिव्य शिल्पकार के रूप में स्मरण करने वाली यह परंपरा हमें यह समझने का अवसर देती है कि समाज का निर्माण केवल विचारों से नहीं, बल्कि उन्हें वास्तविकता में बदलने वाले कुशल हाथों से भी होता है। प्राचीन शिल्पकारों से लेकर आधुनिक इंजीनियरों और तकनीशियनों तक भारत की विकास यात्रा में कौशल की निरंतर भूमिका रही है। समय के साथ औजार बदले, मशीनें बदलीं और तकनीक बदली, लेकिन सृजन की मूल भावना बनी रही। आज जब भारत तकनीकी आत्मनिर्भरता, आधुनिक विनिर्माण, डिजिटल अर्थव्यवस्था और कौशल विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब विश्वकर्मा पूजा का संदेश और व्यापक हो जाता है। यह पर्व परंपरा को आधुनिकता से जोड़ने, पारंपरिक कारीगरों को नई अर्थव्यवस्था से जोड़ने और श्रम को सम्मान देने की प्रेरणा देता है।

पीएम विश्वकर्मा जैसी पहलें पारंपरिक कौशल को पहचान, प्रशिक्षण, आधुनिक औजार और बाजार से जोड़ने की दिशा में एक संस्थागत प्रयास प्रस्तुत करती हैं। ऐसे प्रयासों की वास्तविक सफलता इस बात में होगी कि भारत के पारंपरिक कारीगर बदलती अर्थव्यवस्था में सम्मानजनक और टिकाऊ आजीविका प्राप्त कर सकें तथा उनकी अगली पीढ़ियां भी अपने कौशल को आधुनिक अवसरों से जोड़ सकें। विश्वकर्मा पूजा इसलिए केवल मशीनों, औजारों और कार्यस्थलों की पूजा का दिन नहीं है। यह उन हाथों को सम्मान देने का अवसर है, जो घर बनाते हैं, औजार बनाते हैं, मशीनें चलाते हैं, वस्तुएं तैयार करते हैं और देश की उत्पादन व्यवस्था को गति देते हैं। यह ज्ञान और कौशल के बीच संबंध को समझने का अवसर भी है। आज के भारत में भगवान विश्वकर्मा की परंपरा को यदि आधुनिक अर्थों में समझें तो उसका संदेश स्पष्ट है कौशल का सम्मान करें, श्रम की गरिमा को स्वीकार करें, तकनीक को मानव हित से जोड़ें और सृजन की शक्ति को आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में लगाएं। यही विश्वकर्मा पूजा की परंपरा को भविष्य से जोड़ने का सबसे सार्थक रास्ता हो सकता है। परंपरा तभी जीवित रहती है जब वह बदलते समय के साथ संवाद करती है। विश्वकर्मा पूजा की शक्ति इसी संवाद में है, जहां प्राचीन शिल्प आधुनिक तकनीक से मिलता है, अनुभव नए ज्ञान से जुड़ता है और श्रम आत्मनिर्भरता की आधारशिला बनता है।

 

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