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Covid Vaccine के साइड इफेक्ट्स पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, टीके के गंभीर साइड इफेक्ट्स या मौतों के लिए सरकार को देनी होगी 'नो-फॉल्ट' राहत

14 मार्च, 2026 05:22 PM

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे को प्रभावित करने वाला एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह कोविड-19 वैक्सीन के गंभीर दुष्प्रभावों या इसके कारण होने वाली मौतों के लिए एक 'नो-फॉल्ट' मुआवजा नीति (No-Fault Compensation Policy) तैयार करे। इस फैसले की सबसे खास बात यह है कि अब पीड़ित परिवारों को कोर्ट में यह साबित करने की मशक्कत नहीं करनी होगी कि मौत या बीमारी के लिए राज्य सरकार प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार है। अदालत का मानना है कि चूंकि वैक्सीनेशन एक राज्य-प्रायोजित सार्वजनिक अभियान था, इसलिए इसके दौरान होने वाली किसी भी अनहोनी के लिए राहत प्रदान करना राज्य की नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी बनती है। यह निर्णय उन याचिकाओं पर आया है जिनमें वैक्सीन के बाद स्वास्थ्य बिगड़ने या जान गंवाने का दावा किया गया था।

अनुच्छेद 21 और सामाजिक न्याय: क्यों जरूरी है यह फैसला
इस फैसले के पीछे का मुख्य आधार भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 है, जो हर नागरिक को जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार देता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब सरकार जनता की भलाई के लिए बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान चलाती है, तो उसका कर्तव्य केवल वैक्सीन उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके जोखिमों को संभालना भी उसी की जिम्मेदारी है। 'नो-फॉल्ट' नीति का सीधा अर्थ है कि बिना किसी का दोष सिद्ध किए पीड़ित को आर्थिक या चिकित्सीय सहायता दी जाए। दुनिया के कई विकसित देशों में ऐसी व्यवस्था पहले से मौजूद है। भारत जैसे देश में, जहां करोड़ों लोगों ने इस अभियान में हिस्सा लेकर महामारी को रोकने में मदद की, वहां उन मुट्ठी भर लोगों के साथ खड़ा होना जरूरी है जिन्होंने इसके लिए व्यक्तिगत कीमत चुकाई है।

कार्यान्वयन की चुनौतियां: क्या भारत का सिस्टम इस बोझ को उठा पाएगा?
हालांकि यह फैसला न्यायपूर्ण है, लेकिन इसे जमीन पर उतारना एक बेहद जटिल काम है। सबसे बड़ी चुनौती यह साबित करने की है कि क्या किसी विशेष स्वास्थ्य समस्या या मौत का सीधा संबंध वैक्सीन से ही था। वैज्ञानिक रूप से इसे लिंक करना आसान नहीं है। इसके अलावा, भारत जैसे विशाल देश में मेडिकल रिकॉर्ड की स्थिति, खासकर ग्रामीण इलाकों में, बहुत सुदृढ़ नहीं है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या सरकार के पास इतने प्रशासनिक संसाधन और विशेषज्ञ पैनल हैं जो हर दावे की बारीकी से जांच कर सकें।

स्वास्थ्य मंत्रालय के पास पहले से ही एडवर्स इफेक्ट्स फॉलोइंग इम्यूनाइजेशन (AEFI) की निगरानी प्रणाली है, लेकिन वह बहुत धीमी है। नई नीति आने के बाद दावों की एक बाढ़ आ सकती है, जिसमें फर्जी दावों और बिचौलियों के सक्रिय होने का भी डर है, जो सरकारी खजाने और सिस्टम पर भारी दबाव डाल सकते हैं।

भविष्य की सुरक्षा और सार्वजनिक विश्वास का निर्माण
इन तमाम व्यावहारिक और वित्तीय कठिनाइयों के बावजूद, यह फैसला भविष्य की महामारियों से निपटने के लिए एक मजबूत नींव रखता है। यदि नागरिकों को यह भरोसा होगा कि किसी भी दुर्घटना की स्थिति में राज्य उनके साथ खड़ा है, तो सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों के प्रति उनका विश्वास और बढ़ेगा। यह नीति वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों की जवाबदेही और राज्य के संरक्षण के बीच एक संतुलन बनाने की कोशिश है। अंततः, एक लोकतांत्रिक समाज में राज्य की भूमिका केवल रक्षक की नहीं, बल्कि एक सहायक की भी होती है। गरीब परिवारों को लंबी अदालती लड़ाइयों से मुक्ति दिलाकर यह फैसला यह संदेश देता है कि भारत अपने नागरिकों के स्वास्थ्य अधिकारों के प्रति गंभीर है और न्याय अब केवल कागजों तक सीमित नहीं रहेगा।

 

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