हरियाणा में स्थानीय निकायों और सरकारी फंड से संचालित संस्थानों में वित्तीय अनियमितताओं पर अंकुश लगाने के लिए राज्य सरकार नया कानूनी ढांचा तैयार कर रही है। हाल में सामने आए करीब 661 करोड़ रुपये के आईडीएफसी फर्स्ट बैंक और एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक से जुड़े घोटाले के बाद सरकार ने वित्तीय निगरानी व्यवस्था को और मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। इसके तहत ‘हरियाणा लोकल ऑडिट बिल, 2026’ विधानसभा के मानसून सत्र में पेश किया जाएगा।
प्रस्तावित कानून में लोकल ऑडिट विभाग के निदेशक को गैर-कानूनी भुगतान, लापरवाही अथवा गलत कार्यों से सरकारी धन को हुए नुकसान की जिम्मेदारी तय करने और संबंधित अधिकारियों पर सरचार्ज लगाने की शक्ति देने का प्रावधान किया गया है। यानी ऑडिट में यदि सरकारी पैसे के नुकसान के लिए किसी अधिकारी की जिम्मेदारी सामने आती है तो केवल आपत्ति दर्ज करने के बजाय उससे रकम की वसूली की प्रक्रिया भी शुरू की जा सकेगी।
बैंक घोटालों ने खोली निगरानी व्यवस्था की खामियां
आईडीएफसी फर्स्ट बैंक, एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक और कोटक महिंद्रा बैंक से जुड़े मामलों में पंचकूला नगर निगम, कालका नगर परिषद और अन्य विभागों से बड़ी रकम निकाले जाने के आरोप सामने आए हैं। कोटक महिंद्रा बैंक से जुड़ा मामला वर्ष 2020 से 2026 के बीच का बताया गया है, जिसमें पंचकूला नगर निगम से भी करोड़ों रुपये की निकासी के आरोप लगे।
मामलों की जांच के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि बैंक से संबंधित रिकॉर्ड ऑडिटरों को उपलब्ध नहीं कराए गए थे। सरकार का मानना है कि ऐसी स्थिति में केवल प्रशासनिक निर्देश पर्याप्त नहीं हैं। अधिकारियों को रिकॉर्ड प्रस्तुत करने के लिए बाध्य करने और ऑडिट प्रक्रिया में सहयोग सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट वैधानिक शक्तियां जरूरी हैं।
रिकॉर्ड नहीं देने वाले अधिकारियों पर लगेगा जुर्माना
प्रस्तावित बिल में लोकल ऑडिटर को व्यापक अधिकार देने की व्यवस्था की गई है। ऑडिटर वाउचर, बैंक स्टेटमेंट, रिटर्न, पत्राचार, नोट्स, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और अन्य जरूरी दस्तावेज मांग सकेगा। जरूरत पड़ने पर संबंधित अधिकारियों या कर्मचारियों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर स्पष्टीकरण देने के लिए भी बुलाया जा सकेगा।
यदि कोई अधिकारी जानबूझकर ऑडिटर की मांग की अनदेखी करता है या रिकॉर्ड उपलब्ध कराने से इनकार करता है तो उसके खिलाफ 1,000 से 5,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा। इससे विभागों और स्थानीय संस्थाओं पर समय पर रिकॉर्ड उपलब्ध कराने का दबाव बढ़ेगा।
छह महीने में पूरा करना होगा ऑडिट
बिल में ऑडिट प्रक्रिया के लिए समयसीमा भी निर्धारित की गई है। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार संबंधित संस्था का ऑडिट छह महीने के भीतर पूरा किया जाना होगा। ऑडिट रिपोर्ट में न केवल वित्तीय गड़बड़ियों को उजागर किया जाएगा, बल्कि गैर-कानूनी भुगतान, लापरवाही, गलत कार्यों से हुए नुकसान, सरकारी फंड के दुरुपयोग और लेखा प्रणाली में सुधार की जरूरत को भी दर्ज किया जाएगा।
इसका उद्देश्य ऑडिट को केवल आपत्तियां दर्ज करने की औपचारिक प्रक्रिया से आगे ले जाकर वित्तीय जवाबदेही तय करने का प्रभावी माध्यम बनाना है।
गड़बड़ी दूर करने के लिए दो महीने की समयसीमा
ऑडिट रिपोर्ट सामने आने के बाद संबंधित एग्जीक्यूटिव अथॉरिटी को गड़बड़ियों को ठीक करने और रिपोर्ट में उठाए गए ऑडिट पैरा पर कार्रवाई करने के लिए दो महीने का समय मिलेगा। इसके बाद संबंधित गवर्निंग बॉडी के समक्ष ऑडिट रिपोर्ट और की गई कार्रवाई रखनी होगी।गवर्निंग बॉडी की बैठक के बाद एक महीने के भीतर संशोधित रिपोर्ट लोकल ऑडिट विभाग के निदेशक को भेजनी होगी। इसके आधार पर निदेशक यह तय कर सकेंगे कि किस मामले में कितनी रकम जिम्मेदार व्यक्ति से वसूल की जानी है।
धोखाधड़ी का संदेह हुआ तो सरकार को जाएगी रिपोर्ट
जहां ऑडिट के दौरान सरकारी धन के आपराधिक दुरुपयोग, धोखाधड़ी या अन्य आपराधिक अनियमितता का संदेह सामने आएगा, वहां मामला सरकार के संज्ञान में लाने का प्रावधान भी प्रस्तावित है। इससे वित्तीय अनियमितताओं और संभावित आपराधिक मामलों के बीच बेहतर समन्वय की व्यवस्था बन सकेगी।
सरचार्ज की रकम नहीं चुकाई तो राजस्व बकाया की तरह होगी वसूली
नए बिल का सबसे अहम प्रावधान जिम्मेदार अधिकारियों से सरकारी नुकसान की भरपाई से जुड़ा है। निदेशक को गैर-कानूनी भुगतान अथवा सरकारी धन को हुए नुकसान के लिए जिम्मेदार व्यक्ति पर सरचार्ज लगाने का अधिकार होगा।
सरचार्ज की रकम संबंधित व्यक्ति को एक महीने के भीतर जमा करनी होगी। निर्धारित समय में भुगतान नहीं करने पर इस रकम को भूमि राजस्व के बकाये की तरह वसूल किया जा सकेगा। वहीं, जिस व्यक्ति पर सरचार्ज लगाया गया है, उसे भी प्राकृतिक न्याय के तहत राहत का रास्ता दिया गया है। वह आदेश के खिलाफ एक महीने के भीतर प्रशासनिक सचिव के समक्ष अपील कर सकेगा।
चोरी, गबन या आपदा में होगा स्पेशल ऑडिट
बिल में विशेष ऑडिट का भी प्रावधान किया गया है। यदि किसी स्थानीय प्राधिकरण में धन या सामग्री के दुरुपयोग, चोरी या प्राकृतिक आपदा के कारण नुकसान होता है तो तत्काल विशेष ऑडिट कराया जा सकेगा।
इसके अलावा निदेशक एग्जीक्यूटिव अधिकारियों के खातों और लेनदेन से संबंधित एक समेकित रिपोर्ट राज्य सरकार को देंगे। यह रिपोर्ट आगे हरियाणा विधानसभा के समक्ष रखे जाने का प्रावधान है। इससे विधानसभा को स्थानीय संस्थाओं की वित्तीय स्थिति और सरकारी धन के इस्तेमाल की निगरानी में अधिक प्रभावी भूमिका मिल सकेगी।