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बाज़ार

वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच Reserve Bank of India का संतुलित कदम, रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं

08 अप्रैल, 2026 12:46 PM

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखते हुए तटस्थ रुख अपनाया है। यह निर्णय बाजार की उम्मीदों के अनुरूप रहा और छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने दो दिनों की चर्चा के बाद सर्वसम्मति से इसे मंजूरी दी। आरबीआई के इस फैसले का उद्देश्य मौजूदा वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच आर्थिक स्थिरता बनाए रखना है।

आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने नीतिगत निर्णय की घोषणा करते हुए कहा कि बैंक दर और मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (एमएसएफ) की दर 5.50 प्रतिशत पर यथावत रखी गई है, जबकि स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी (एसडीएफ) की दर भी 5.00 प्रतिशत पर बरकरार है। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब वैश्विक स्तर पर आर्थिक हालात लगातार चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं।

आरबीआई गवर्नर ने 2025 को एक चुनौतीपूर्ण वर्ष बताया, लेकिन यह भी कहा कि अक्टूबर की नीति के बाद से मुद्रास्फीति में कमी आई है। उन्होंने बैंकिंग प्रणाली की बेहतर कार्यकुशलता को अर्थव्यवस्था के लिए एक प्रमुख सहारा बताया। गौरतलब है कि यह घोषणा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ दो सप्ताह के युद्धविराम की घोषणा के कुछ ही घंटों बाद हुई। इस घटनाक्रम से वैश्विक बाजारों में सकारात्मक माहौल बना और भारतीय शेयर बाजार में भी तेजी देखने को मिली।

आरबीआई गवर्नर ने कहा कि चालू वित्त वर्ष में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है। हालांकि उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताएं, खासकर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, भारत की विकास दर पर दबाव डाल सकती हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि बाहरी कारक भारत की आर्थिक गति के लिए प्रमुख जोखिम बने हुए हैं।

मल्होत्रा ने यह भी कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना कर रही है। आपूर्ति-पक्ष की बाधाएं और ऊर्जा कीमतों में उछाल के कारण महंगाई के फिर से बढ़ने की आशंका बनी हुई है। हालांकि, उन्होंने भरोसा जताया कि भारत की आर्थिक बुनियाद मजबूत है और देश की मैक्रोइकोनॉमिक स्थिति पहले की तुलना में कहीं अधिक स्थिर और सक्षम है।

मौद्रिक नीति समिति ने यह भी संकेत दिया कि मुद्रास्फीति फिलहाल नियंत्रण में है, लेकिन इसमें बढ़ोतरी का जोखिम बना हुआ है। मौसम में अनिश्चितता के चलते खाद्य कीमतों में उछाल आ सकता है, जबकि कच्चे तेल की ऊंची कीमतें चालू खाता घाटे को बढ़ा सकती हैं। ऐसे में आरबीआई ने फिलहाल ‘वेट एंड वॉच’ यानी स्थिति पर नजर रखने की रणनीति अपनाना उचित समझा है।

आरबीआई का मानना है कि मौजूदा हालात में जल्दबाजी में ब्याज दरों में बदलाव करने के बजाय स्थिति का आकलन करना ज्यादा समझदारी भरा कदम है। केंद्रीय बैंक ने संतुलित रुख अपनाते हुए एक ओर महंगाई को नियंत्रित रखने और दूसरी ओर आर्थिक विकास को समर्थन देने की कोशिश की है।

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