चंडीगढ़ : हम अक्सर तनाव को व्यक्ति के स्वभाव का हिस्सा मान लेते हैं। वह बहुत ज़्यादा चिंता करती है। वह हर बात को ज़रूरत से ज़्यादा सोचता है। वे मुश्किल दौर से गुज़र रहे हैं। पर तनाव एक स्वास्थ्य समस्या का रूप भी ले सकता है। बड़ी चुनौती यह पहचानने की है कि आम चिंता कब स्वास्थ्य समस्या में बदल जाती है।
न्यूरोटिक और तनाव-संबंधी समस्या सिर्फ़ रोज़मर्रा के आम तनाव तक सीमित नहीं होती। इनमें चिंता, डर, बेचैनी या शारीरिक लक्षणों के ऐसे गंभीर रूप शामिल होते हैं, जो व्यक्ति के रोज़ाना जीवन को प्रभावित कर सकते हैं। इनमें एंग्ज़ाइटी डिसऑर्डर, फोबिक डिसऑर्डर, ऑब्सेसिव-कंपल्सिव डिसऑर्डर, गंभीर तनाव प्रति प्रतिक्रिया और एडजस्टमेंट डिसऑर्डर शामिल हैं।
जनरलाइज़्ड एंग्ज़ाइटी डिसऑर्डर को दुनिया भर में पाए जाने वाले आम मानसिक विकारों में से एक माना जाता है। निदान के निर्धारित मापदंडों को पूरा करने वाले लगभग 5 फ़ीसदी लोग इससे प्रभावित होते हैं। हालाँकि, यह स्थिति की सिर्फ़ एक तस्वीर हो सकती है, क्योंकि सामाजिक बंदिशों और इलाज करवाने में आने वाली रुकावटों के कारण कई लोग इलाज ही नहीं करवा पाते।
पंजाब की मुख्यमंत्री सेहत योजना में मानसिक स्वास्थ्य को ‘मेंटल डिसऑर्डर्ज़’ श्रेणी अधीन शामिल किया गया है। न्यूरोटिक, तनाव-संबंधी और सोमैटोफार्म समस्याओं के लिए इलाज पैकेज को ‘रेगुलर प्रोसीजर’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री डॉ. बलबीर सिंह ने कहा, “मानसिक स्वास्थ्य के इलाज को किसी पारिवारिक या आर्थिक रुकावट के कारण टाला नहीं जाना चाहिए।”
डॉ. बलबीर सिंह ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य के बराबर प्राथमिकता मिलनी चाहिए और आर्थिक रुकावटों के कारण लोग इलाज से वंचित नहीं रहने चाहिए। उन्होंने कहा, “मुख्यमंत्री सेहत योजना अधीन मानसिक स्वास्थ्य के इलाज को शामिल करने का उद्देश्य इलाज को लोगों के लिए अधिक सुलभ बनाना और उन्हें समय पर मदद लेने के लिए प्रोत्साहित करना है।”
डॉ. गगनदीप सेखों, एम.डी. (मनोचिकित्सा), कंसल्टेंट मनोचिकित्सक, सिविल अस्पताल बरनाला ने कहा, “मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को अक्सर तब तक नज़रअंदाज़ किया जाता है, जब तक ये रोज़ाना के जीवन और आम कामकाज को प्रभावित करना शुरू नहीं कर देतीं। उस समय तक इनसे निपटना अधिक मुश्किल हो जाता है।” उन्होंने कहा कि 18 से 45 साल की उम्र का वर्ग ख़ास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस उम्र में लोग करियर बनाने, रिश्ते संभालने और आर्थिक ज़िम्मेदारियाँ निभाने में रुझे होते हैं।
*जब दिमाग के लिए आराम मुश्किल हो जाए*
तनाव को एक अलार्म सिस्टम की तरह समझा जा सकता है। ख़तरा होने पर यह अलार्म बजना चाहिए और ख़तरा टलने के बाद शांत हो जाना चाहिए। डॉ. गगनदीप सेखों ने कहा, “तनाव-संबंधी बीमारियों में यही अलार्म समस्या बन जाता है। व्यक्ति को लगातार चिंता, डर, चिड़चिड़ापन, ध्यान केंद्रित करने में मुश्किल, नींद में परेशानी या हर समय बेचैनी महसूस हो सकती है। चिंता शारीरिक लक्षणों का रूप भी ले सकती है, जैसे दिल की धड़कन तेज़ होना, पसीना आना, कांपना, जी मिचलाना और मासपेशियों में खिंचाव।” विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भी एंग्ज़ाइटी डिसऑर्डर पारिवारिक जीवन, शिक्षा और कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं।
इसके अलावा एक ऐसी स्थिति भी है, जिसे अक्सर सही ढंग से समझा नहीं जाता: इसमें शरीर हमारे मन में चल रही परेशानी को शारीरिक लक्षणों के रूप में प्रकट करने लगता है। डॉ. गगनदीप सेखों ने बताया, “सोमैटोफार्म विकारों में शारीरिक लक्षण लगातार बने रह सकते हैं, भले ही जाँच में उनकी गंभीरता का पूरा कारण स्पष्ट न हो। इनमें दर्द, शरीर में भारीपन या पेट फूलना जैसे लक्षण हो सकते हैं।”
इसलिए किसी व्यक्ति को यह कहना कि “यह सब तुम्हारे दिमाग की उपज है” समस्या को समझने का सही तरीका नहीं है। लक्षण असली होते हैं। मन और शरीर के बीच संबंध भी असली होता है।
कई बार इसकी शुरुआत किसी एक बड़ी घटना से हो सकती है—जैसे किसी करीबी की मौत, अलग होना, बीमारी, आर्थिक संकट या जीवन में आया कोई बड़ा बदलाव। दूसरी ओर, कई बार यह लंबे समय से बन रहे तनाव का नतीजा हो सकता है: कई महीनों के काम का दबाव, पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ, अनिश्चितता और नींद की कमी धीरे-धीरे व्यक्ति की तनाव से निपटने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है।
ऐसी स्थितियों में समय पर स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच महत्वपूर्ण हो सकती है। मुख्यमंत्री सेहत योजना योग्य परिवारों को योजना अधीन शामिल इलाज का लाभ लेने में मदद कर सकती है ताकि इलाज का ख़र्चा उनकी चिंताओं का एक और कारण न बने।