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महंगाई से लेकर धीमी आर्थिक वृद्धि तक, पश्चिम एशिया संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था को कई तरह से करेगा प्रभावित: आईएमएफ

31 मार्च, 2026 04:25 PM

नई दिल्ली : अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने कहा है कि अमेरिका-इज़रायल और ईरान के बीच जारी युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था को कई तरीकों से प्रभावित कर सकता है, लेकिन इसका नतीजा एक ही होगा—महंगाई बढ़ेगी और आर्थिक विकास धीमा पड़ेगा।
आईएमएफ के अनुसार, मध्य पूर्व में चल रहा यह युद्ध न केवल वहां के लोगों की जिंदगी और आजीविका को प्रभावित कर रहा है, बल्कि दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाओं के लिए भी चिंता का कारण बन गया है, जो पहले ही पिछली आर्थिक चुनौतियों से उबरने की कोशिश कर रही थीं।

आईएमएफ ने कहा कि यह संकट पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहा है, लेकिन इसका असर सभी देशों पर समान नहीं है। ऊर्जा आयात करने वाले देश ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं, गरीब देशों पर ज्यादा दबाव है और जिन देशों के पास कम आर्थिक भंडार हैं, वे ज्यादा मुश्किल में हैं।
एशिया और यूरोप के बड़े ऊर्जा आयातक देश ईंधन और अन्य इनपुट लागत बढ़ने से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। दुनिया के करीब 25-30 प्रतिशत तेल और 20 प्रतिशत एलएनजी की सप्लाई होर्मुज जलडमरूमध्य से होती है, जो एशिया और यूरोप की जरूरतों को पूरा करती है।

आईएमएफ ने बताया कि अफ्रीका और एशिया के कई देश, जो तेल आयात पर निर्भर हैं, अब बढ़ी हुई कीमतों के बावजूद भी पर्याप्त सप्लाई हासिल करने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं।
संस्था ने चेतावनी दी कि मध्य पूर्व, अफ्रीका, एशिया-प्रशांत और लैटिन अमेरिका के कई हिस्सों में खाद्य और उर्वरक की कीमतें बढ़ने से अतिरिक्त दबाव बन रहा है। खासतौर पर गरीब देशों में खाद्य संकट का खतरा बढ़ सकता है और उन्हें बाहरी मदद की जरूरत पड़ सकती है।

आईएमएफ के मुताबिक, अगर यह युद्ध छोटा रहता है तो तेल और गैस की कीमतें अचानक बढ़ सकती हैं, लेकिन अगर यह लंबे समय तक चलता है तो ऊर्जा की कीमतें लगातार ऊंची बनी रहेंगी, जिससे आयात पर निर्भर देशों की हालत और खराब हो सकती है।
एशिया के बड़े मैन्युफैक्चरिंग देशों में ईंधन और बिजली की बढ़ती कीमतों से उत्पादन लागत बढ़ रही है और लोगों की खरीद क्षमता पर असर पड़ रहा है। कुछ देशों में भुगतान संतुलन पर भी दबाव दिख रहा है, जिससे उनकी मुद्रा कमजोर हो रही है।

यूरोप में यह संकट 2021-22 के गैस संकट जैसी स्थिति पैदा कर सकता है। इटली और यूनाइटेड किंगडम (यूके) जैसे देश ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं, जबकि फ्रांस और स्पेन जैसे देश अपनी परमाणु और नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के कारण अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं।
यह युद्ध केवल ऊर्जा क्षेत्र ही नहीं, बल्कि अन्य जरूरी सप्लाई चेन को भी प्रभावित कर रहा है। जहाजों के रूट बदलने से ट्रांसपोर्ट और बीमा लागत बढ़ रही है और सामान पहुंचने में देरी हो रही है।
आईएमएफ ने यह भी बताया कि खाड़ी क्षेत्र दुनिया में हीलियम की बड़ी सप्लाई करता है, जो सेमीकंडक्टर और मेडिकल उपकरणों में इस्तेमाल होता है। वहीं, इंडोनेशिया को निकेल प्रोसेस करने के लिए जरूरी सल्फर की कमी का सामना करना पड़ सकता है।

पूर्वी अफ्रीका के वे देश जो खाड़ी देशों पर व्यापार और रेमिटेंस के लिए निर्भर हैं, उन्हें भी कमजोर मांग, लॉजिस्टिक समस्याओं और कम पैसे भेजे जाने का असर झेलना पड़ सकता है।
आईएमएफ ने चेतावनी दी कि अगर ऊर्जा और खाद्य कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो इससे पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ेगी।

इसके अलावा, इस युद्ध ने वित्तीय बाजारों को भी प्रभावित किया है। वैश्विक शेयर बाजारों में गिरावट आई है, बॉन्ड यील्ड बढ़ी है, और बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ गया है। हालांकि, अभी तक यह गिरावट पिछले बड़े वैश्विक संकटों की तुलना में सीमित है, लेकिन इससे वित्तीय परिस्थितियां सख्त हो गई हैं।

आईएमएफ ने कहा कि इस स्थिति से निपटने के लिए देशों को सही नीतियां अपनानी होंगी। जिन देशों के पास कम संसाधन हैं, उन्हें खास तौर पर सतर्क रहने की जरूरत है।
आईएमएफ की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने कहा, "अनिश्चित दुनिया में ज्यादा देशों को हमारे समर्थन की जरूरत है और हम उनके साथ हैं।"

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