विदेश मंत्रालय में आर्थिक संबंध सचिव सुधाकर डालेला ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 81वें सत्र के दौरान न्यूयॉर्क में आयोजित सबसे कम विकसित देशों (LDCs) की वार्षिक मंत्रिस्तरीय बैठक में हिस्सा लिया। उन्होंने इन देशों के साथ भारत की मजबूत और निरंतर साझेदारी की प्रतिबद्धता दोहराई।
डालेला ने बैठक में कहा कि सबसे कम विकसित देशों के सतत और स्थायी रूप से विकास की अगली श्रेणी में पहुंचने के लिए सुलभ वित्त, स्थानीय उत्पादन और रोजगार सृजन में निवेश तथा तकनीकी साझेदारी जरूरी है।
विदेश मंत्रालय ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर बताया कि भारत की विकास साझेदारी मांग आधारित है। इसमें भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग (ITEC) कार्यक्रम, रियायती ऋण, अनुदान सहायता और भारत-UN विकास साझेदारी कोष के माध्यम से सहयोग शामिल है।
डालेला ने संयुक्त राष्ट्र में आयोजित ‘सेंडाई फ्रेमवर्क को लागू करना: समावेशी आपदा और जलवायु लचीलापन के लिए ASEAN दृष्टिकोण’ कार्यक्रम में भी हिस्सा लिया। इसका आयोजन थाईलैंड, फिलीपींस, जापान और संयुक्त राष्ट्र आपदा जोखिम न्यूनीकरण कार्यालय (UNDRR) ने किया था।
अपने संबोधन में डालेला ने भारत की मजबूत की गई शुरुआती चेतावनी प्रणालियों, जोखिम को ध्यान में रखकर बुनियादी ढांचे के विकास और आपदा तैयारी का उल्लेख किया। उन्होंने आपदा रोधी बुनियादी ढांचे के लिए गठबंधन (CDRI) और आपदा तैयारी तथा प्रतिक्रिया के क्षेत्र में भारत-ASEAN सहयोग पर भी जोर दिया।
उन्होंने कहा कि शुरुआती चेतावनियों को समय पर कार्रवाई में बदलना जरूरी है, ताकि समुदायों की सुरक्षा की जा सके। उन्होंने 2030 में चौथे संयुक्त राष्ट्र विश्व आपदा जोखिम न्यूनीकरण सम्मेलन की मेजबानी करने की भारत की पेशकश भी दोहराई।
बैठक में थाईलैंड के उप प्रधानमंत्री सिहासक फुआंगकेटकेव, ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री पेनी वोंग और फिलीपींस की विदेश मंत्री मारिया थेरेसा पी. लाजारो सहित कई देशों के अधिकारी मौजूद रहे।
इससे पहले बुधवार को डालेला ने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र में जलवायु कार्रवाई और न्यायसंगत बदलाव पर उच्चस्तरीय बैठक के दौरान ‘जलवायु अनुकूलन के वित्तपोषण पर समाधान संवाद’ में हिस्सा लिया।
इस बैठक में उन्होंने भारत की जीवनरक्षक शुरुआती चेतावनी प्रणालियों और राष्ट्रीय तथा राज्य स्तर की योजनाओं में जलवायु अनुकूलन को शामिल करने के प्रयासों पर प्रकाश डाला। उन्होंने देशों के नेतृत्व में होने वाले जलवायु अनुकूलन के लिए अनुमानित और भरोसेमंद वित्त की जरूरत बताई। साथ ही कहा कि अनुकूलन के लिए मिलने वाली वित्तीय सहायता से कमजोर देशों और समुदायों की सुरक्षा होनी चाहिए और उन पर अतिरिक्त कर्ज का बोझ नहीं बढ़ना चाहिए।