शिमला : प्रदेश में पंचायत और शहरी निकाय चुनावों के चलते लागू आचार संहिता का असर अब प्रशासनिक कामकाज पर साफ दिखने लगा है। कर्मचारियों के तबादला मामलों से लेकर सरकारी विभागों के टेंडर सहित कई अहम फैसले फिलहाल अटक गए हैं। मई का पूरा महीना इसी स्थिति में गुजरने की संभावना जताई जा रही है, जिससे विकास कार्यों की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। वहीं राज्य सरकार द्वारा भेजी जा रही तबादला फाइलें राज्य चुनाव आयोग से मंजूरी के लिए पहुंच रही हैं, लेकिन आयोग इन्हें एक अहम सवाल के साथ वापस लौटा रहा है कि क्या संबंधित कर्मचारी, खासकर प्रिंसीपल या शिक्षक, चुनाव ड्यूटी में तैनात हैं। जब तक इस संबंध में स्पष्ट जानकारी नहीं दी जाती, तब तक मंजूरी नहीं मिल रही।
इससे शिक्षा विभाग समेत कई विभागों में लंबित तबादला मामलों का ढेर बढ़ता जा रहा है। वहीं सरकारी विभागों के टेंडर भी आचार संहिता के चलते फिलहाल रोक दिए गए हैं। नई परियोजनाओं के लिए टेंडर जारी नहीं हो पा रहे, जबकि कई पहले से प्रस्तावित कार्य भी अधर में लटक गए हैं। इसका सीधा असर विकास योजनाओं और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों पर पड़ सकता है। चुनाव प्रक्रिया पूरी होने और आचार संहिता हटने के बाद ही इन मामलों में तेजी आएगी।
न्यायालय के आदेश पर हुए कुछ तबादले
राज्य में आचार संहिता के बीच हालांकि ट्रांसफर पर पूरी तरह से बैन है, लेकिन आवश्यक परिस्थितियों में यह तबादले चुनाव आयोग की अनुमति से किए जा सकते हैं। वहीं कुछ मामलो में न्यायालय द्वारा जारी आदेशों के बाद शिक्षा विभाग द्वारा चुनाव आयोग की अनुमति से कुछ शिक्षकों के तबादले किए हैं।
निजी अस्पतालों के एम्पैनलमेंट की मांगी अनुमति
चुनावी आचार संहिता के बीच स्वास्थ्य विभाग ने एक अहम पहल करते हुए निजी अस्पतालों के एम्पैनलमेंट की प्रक्रिया जारी रखने की अनुमति मांगी है। निदेशालय स्वास्थ्य सुरक्षा ने इस संबंध में स्वास्थ्य सचिव को पत्र भेजकर स्थिति स्पष्ट की है। राज्य में पंचायत चुनावों के चलते आचार संहिता लागू की गई है। इसके चलते विभाग ने निजी अस्पतालों के एम्पैनलमेंट की प्रक्रिया को फिलहाल रोक दिया है, ताकि आयोग के दिशा-निर्देशों का पूर्ण पालन हो सके। वहीं राज्य के कई क्षेत्रो में निजी अस्पतालों के लाइसेंस की तिथि पूर्ण हो चुकी है, ऐसे में निजी अस्पतालों में ईलाज करने से पहले लाइसेंस रिन्यु करवाना आवश्यक है। यदि एम्पैनलमेंट में देरी होती है, तो खासकर उन मरीजों को परेशानी हो सकती है, जिन्हें सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध न होने वाली विशेष चिकित्सा सेवाओं की आवश्यकता होती है।