प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लोगों को सत्य, प्रिय और हितकारी वाणी बोलने का संदेश देते हुए एक सुभाषित साझा किया। पोस्ट के माध्यम से उन्होंने बताया कि विचारपूर्वक बोली गई वाणी समाज में शांति, सद्भाव और सकारात्मकता का संचार करती है।
संस्कृत श्लोक किया साझा
प्रधानमंत्री मोदी ने संस्कृत श्लोक, “अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥” साझा किया। इसका हिंदी भावार्थ है कि मनुष्य को ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जो सत्य, प्रिय और हितकारी हो तथा किसी के मन में अशांति या उद्वेग उत्पन्न न करे। सद्ग्रंथों का निरंतर स्वाध्याय और चिंतन वाणी को सार्थकता प्रदान करता है।
श्रीमद्भगवद्गीता के 17वें अध्याय का श्लोक
पीएम नरेंद्र मोदी की ओर से साझा किया गया यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के 17वें अध्याय का 15वां श्लोक है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने वाणी की तपस्या यानी ‘वाङ्मय तप’ के बारे में बताया है। श्लोक में वाणी के ऐसे स्वरूप को तप बताया गया है, जो सत्य, प्रिय, हितकारी और दूसरों के लिए अनुद्वेगकारी हो।
वाणी में सत्य और हित का महत्व
श्लोक का सार है कि ऐसी वाणी बोलनी चाहिए, जिससे दूसरे व्यक्ति को कष्ट या मानसिक उद्वेग न हो। वाणी सत्य होने के साथ प्रिय और हितकारी भी होनी चाहिए। इसके साथ ही वेदों और शास्त्रों का नियमित स्वाध्याय और अभ्यास भी वाणी की तपस्या का हिस्सा बताया गया है।
शब्दों में संवारने और आहत करने की शक्ति
संदेश का व्यापक भाव यह है कि तप केवल शरीर को कष्ट देने तक सीमित नहीं है। मनुष्य की वाणी में किसी को आहत करने के साथ-साथ उसके मन में सकारात्मकता और विश्वास पैदा करने की भी शक्ति होती है। इसलिए अहंकार से मुक्त होकर सत्य, प्रेमपूर्ण और हितकारी भाषा का प्रयोग करना तथा स्वयं को ज्ञान और स्वाध्याय से जोड़ना वाणी की श्रेष्ठ तपस्या माना गया है।