पटियाला : पंजाब भाषा विभाग के निदेशक जसवंत ज़फ़र द्वारा सोशल मीडिया पर विभाग को बंद करने की साज़िश रचे जाने का आरोप लगाए जाने के बाद राज्य के साहित्यिक और अकादमिक हलकों में नई बहस छिड़ गई है। निदेशक के इस दावे के सामने आने के बाद अब विभाग के आंतरिक कामकाज, शीर्ष नेतृत्व के चयन के मापदंडों, हालिया भर्ती प्रक्रिया और प्राथमिकताओं पर भी गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं।
विशेषज्ञों और भाषा प्रेमियों का मानना है कि केवल बाहरी साज़िश का हवाला देकर विभाग की कमजोरियों पर पर्दा नहीं डाला जा सकता, बल्कि इसके मूल कारणों की पड़ताल जरूरी है। भाषा विभाग जैसी महत्वपूर्ण संस्था की कमान ऐसे व्यक्ति को सौंपे जाने पर सवाल उठ रहे हैं जिनकी मूल पेशेवर पृष्ठभूमि भाषा या भाषाविज्ञान के बजाय इंजीनियरिंग रही है।
जसवंत ज़फ़र पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन में लंबे समय तक इंजीनियर और अधिकारी रहे हैं। हालांकि वे एक साहित्यकार हैं, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या पंजाब में ऐसे प्रख्यात विद्वान, प्रोफेसर और भाषाविद् उपलब्ध नहीं थे जिन्हें इस संस्थान का दायित्व सौंपा जा सकता था। कई वर्षों के अंतराल के बाद जब विभाग में नई भर्तियां निकाली गईं, तब उम्मीद थी कि पंजाबी भाषा में उच्च शिक्षित युवाओं को प्राथमिकता मिलेगी। इसके विपरीत, पात्रता नियमों में अन्य विषयों और तकनीकी डिग्रियों को शामिल कर दिया गया।
पंजाबी भाषा के विशेषज्ञों को प्राथमिकता न मिलने से भाषा संरक्षण और संवर्धन का मूल उद्देश्य प्रभावित हो रहा है। वर्तमान दौर में जब पंजाबी भाषा कई चुनौतियों से जूझ रही है, विभाग के संसाधनों का पहला उपयोग भाषा, साहित्य, शोध, अनुवाद और नई पीढ़ी में इसके प्रचार-प्रसार पर केंद्रित होना चाहिए था, जिसका धरातल पर अभाव दिखता है।
साहित्यिक जगत का मानना है कि पंजाब की भाषा और सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए केवल साजिश के आरोपों तक सीमित रहने के बजाय विभाग की नियुक्तियों, भर्ती नियमों और संसाधन आवंटन पर खुली और पारदर्शी बहस होनी चाहिए।