नई दिल्ली(एजेंसी) : 12 अक्टूबर 2026 की शाम दिल्ली की सड़कों ने एक ऐसा राजनीतिक ड्रामा देखा, जिसने देश के सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। एक तरफ INDIA ब्लॉक के दिग्गजों का सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च और दूसरी तरफ भीड़ के बीच प्रियंका गांधी और वाम दल के छात्र संगठन आइसा (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा को अपने हाथों से कवर देकर राह बनाते राहुल गांधी! सोशल मीडिया पर यह तस्वीर वायरल है, लेकिन अब चर्चा यह है कि क्या यह सिर्फ एक इत्तेफाक था या फिर राहुल गांधी का वो 'मास्टरस्ट्रोक', जिसने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आंदोलन की पूरी जमीन खिसका दी?
कौन हैं नेहा बोरा और CJP-वामपंथी आंदोलन में उनका कद?
जवाहर लाल नेहरू (JNU) की पीएचडी स्कॉलर और वामपंथी छात्र संगठन AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा कोई नया चेहरा नहीं हैं। हाल ही में NEET-UG गड़बड़ी आंदोलन से लेकर वोटिंग लिस्ट में कथित हेरफेर तक, वह युवाओं और वामपंथी छात्र राजनीति का बेहद आक्रामक और मुखर चेहरा बनकर उभरी हैं।
सोनम वांगचुक के साथ भूख हड़ताल पर बैठकर नेहा बोरा ने जनध्यान खींचा। हालांकि, वे CJP के मंच पर नहीं, बल्कि नीचे उसके बराबर में टैंट लगा कर अन्य छात्रों के साथ भूख हड़ताल बैठी थीं। हालांकि, उस वक्त वह CJP के प्रदर्शनों में बराबर साथ रही थीं।
दरअसल नेहा बोरा की ताकत यह है कि वे तीन दुनियाओं को जोड़ती हैं- वामपंथी छात्र राजनीति, सड़क पर उतरने वाले युवा आंदोलन और कांग्रेस नेतृत्व तक पहुंच। जुलाई में भी वे राहुल गांधी के प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल हुई थीं, यानी उनका कांग्रेस से संपर्क नया नहीं है।
क्या राहुल गांधी ने खींच ली CJP की जमीन?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले कुछ महीनों से मुख्यधारा के विपक्षी दलों (विशेषकर कांग्रेस) के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि युवाओं का गुस्सा और विरोध प्रदर्शन गैर-राजनीतिक या CJP जैसे स्वतंत्र नागरिक मंचों की तरफ मुड़ रहा था।
जब भी कोई बड़ा जनआंदोलन खड़ा होता है और उसकी बागडोर गैर-संसदीय चेहरों के हाथ में जाती है, तो मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों का जनाधार खिसकने लगता है।
वैसे तो राहुल गांधी ने CJP या आइसा के आंदोलन पर कभी सीधा हमला नहीं किया, लेकिन कल हुए INDIA गठबंधन के मार्च में उन्होंने उनके सबसे लोकप्रिय युवा चेहरे- नेहा बोरा को अपनी मुख्यधारा की रैली की पहली कतार में खड़ा कर दिया।
इतना ही नहीं नेहा उसी बैस में बैठ कर बाराखंभा रोड पहुंचीं, जिसमें राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ इंडिया गठबंधन के तमाम बड़े नेता मौजूद थे।
प्रियंका गांधी के साथ कदम से कदम मिलाकर चलतीं नेहा बोरा और पीछे से सुरक्षा का घेरा बनाते राहुल गांधी- इस एक फ्रेम ने मैसेज दे दिया कि "युवाओं की लड़ाई कांग्रेस और INDIA गठबंधन के बैनर तले ही लड़ी जा रही है।"
CJP जो खुद को मुख्यधारा के राजनीतिक दलों से अलग और निष्पक्ष बताकर युवाओं को जोड़ रहा था, नेहा बोरा के कांग्रेस के साथ इस मार्च से यह सवाल जरूर उठने लगे हैं कि क्या राहुल गांधी ने सच में CJP का माहौल अपनी तरफ मोड़ लिया है।
हालांकि, इसका कोई सटीक जवाब देना भी मुश्किल है, क्योंकि मार्च से पहले एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुद राहुल गांधी ने कहा था कि उनका यह आंदोलन शिव की बारात की तरह है, जिसमें कोई भी शामिल होना चाहे, आ सकता है।”
लेकिन नेहा बोरा को आगे रखना, वो भी अपने और प्रियंका गांधी के साथ, यह जरूर उनकी कोई रणनीति का हिस्सा है।
क्या यह राहुल की रणनीति है या वामपंथी छात्रों की मजबूरी?
अब एक सवाल यह भी उठता है कि क्या सच में यह राहुल गांधी की कोई रणनीति थी या फिर वामपंथी छात्रों की मजबूरी?
कांग्रेस समर्थक खेमे का तर्क है कि यह कोई राजनीतिक षड्यंत्र नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक एकजुटता है। जब देश में मुख्य चुनाव आयुक्त और वोटिंग प्रक्रिया को लेकर बड़ा मार्च निकल रहा था, तब छात्र नेता, नागरिक समाज (योगेंद्र यादव जैसे लोग) और राजनीतिक दल एक ही मुद्दे पर साथ आए। राहुल गांधी ने एक वरिष्ठ नेता के तौर पर सिर्फ युवा प्रदर्शनकारियों को सम्मान और सुरक्षा दी।
हां लेकिन वामपंथी कैडर में इस बात को लेकर सुगबुगाहट जरूर है कि राहुल गांधी ने बिना कोई बड़ा वादा किए, CJP के महीनों के जमीनी संघर्ष के निचोड़ को बड़ी चालाकी से अपने नाम कर लिया। अब आम जनता इसे 'CJP का आंदोलन' न मानकर 'राहुल गांधी का सुप्रीम कोर्ट मार्च' कह रही है।
CJP के लिए क्या है असली खतरा?
असली खतरा CJP के लिए यह है कि अगर कांग्रेस नेहा जैसे चेहरों को बार-बार अपने मंच पर लाती रही, तो CJP की “स्वतंत्र युवा आंदोलन” वाली पहचान धीरे-धीरे कांग्रेस की छाया में आ सकती है। यह एक राजनीतिक जोखिम है। इस बात को आप आसानी तब समझेंगे, जब CJP और नेहा बोरा में अंतर खोजा जाए।
दरअसल CJP की पहचान सड़क की ऊर्जा, फ्लैश प्रोटेस्ट और सोशल मीडिया की तेज भाषा पर बनी है। लेकिन नेहा बोरा ने पुलिस से टकराते हुए, हिरासत के बाद भी वीडियो जारी करते हुए और बार-बार मैदान में लौटते हुए खुद को आंदोलन का एक बड़ा चेहरा बना लिया है।
CJP नेतृत्व अपनी रणनीति सार्वजनिक रूप से बताता रहा, जबकि नेहा फ्लैश प्रोटेस्ट की रणनीति पर चलती दिखीं। इससे यह सवाल और तेज हुआ कि आंदोलन का असली चेहरा कौन है- CJP की त्रिमूर्ति (अभिजीत दीपके, सौरभ दास और आशुतोष रांका) या नेहा बोरा?
फिलहाल राहुल गांधी और कांग्रेस इस रणनीति में कामयाब दिख रहे हैं। नेहा बोरा को इस वॉक-मार्च का 'विजुअल सेंटर' बनाकर उन्होंने CJP के पैरों तले से वह जमीन खींच ली है, जिस पर खड़े होकर वह कांग्रेस से अलग अपनी स्वतंत्र सत्ता का दावा कर रही थी।