चंडीगढ़ : हरियाणा के पूर्व उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला ने किसानों की परेशानियों को लेकर केंद्र और राज्य की भाजपा सरकार पर बड़ा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि किसानों के सामने फसल की बुआई का समय सिर पर होने के बावजूद खाद, बीज और बिजली की उपलब्धता जैसी समस्याएं है। धान, बाजरे की खरीद और किसानों को समय पर भुगतान नहीं मिलने की शिकायतें भी किसानों की परेशानियां बढ़ा रही है। महेंद्रगढ़ और रोहतक जिले के दौरे के दौरान दुष्यंत चौटाला ने कहा कि बीजेपी सरकार किसानों की आय बढ़ाने और उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत करने के दावे तो करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर किसान अपनी जरूरतों के लिए परेशान हो रहा है। बुआई के महत्वपूर्ण समय में यदि किसान को पर्याप्त खाद, बीज और बिजली नहीं मिलेगी तो उसकी फसल और आमदनी दोनों पर असर पड़ेगा। सरकार को किसानों की समस्याओं का समाधान प्राथमिकता के आधार पर करना चाहिए, ताकि उन्हें अपनी फसल तैयार करने के लिए दर-दर भटकना न पड़े।
पूर्व डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला ने कहा कि गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 25 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी, यानी मात्र 25 पैसे प्रति किलो की वृद्धि, किसानों की लागत और उनकी आर्थिक चुनौतियों के मुकाबले बेहद मामूली है। किसानों को खाद, बीज, डीजल, बिजली और कृषि मजदूरी पर बढ़ते खर्च का सामना करना पड़ता है। ऐसे में इतनी कम बढ़ोतरी से किसानों को कितनी राहत मिलेगी, यह बड़ा सवाल है। उन्होंने केंद्र सरकार से किसानों की लागत और उनकी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कम से कम 200 रुपए प्रति क्विंटल एमएसपी सुनिश्चित करने की मांग की। दुष्यंत ने कहा कि बाजरे की खरीद व्यवस्था और भुगतान में देरी को लेकर भी सरकार को गंभीरता दिखानी चाहिए। किसान अपनी फसल तैयार करने के लिए महीनों मेहनत करता है, लेकिन यदि फसल बेचने के बाद भी उसे समय पर भुगतान नहीं मिलता तो उसकी आर्थिक योजना बिगड़ जाती है। किसानों को खरीद केंद्रों पर परेशानी से बचाना और भुगतान समय पर सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि हरियाणा की अर्थव्यवस्था में किसानों की अहम भूमिका है। किसानों की अनदेखी करके ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत नहीं किया जा सकता। सरकार को खाद और बीज की पर्याप्त उपलब्धता, बिजली की पूरी आपूर्ति, बाजरे की सुचारू खरीद तथा समय पर भुगतान सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए। दुष्यंत चौटाला ने कहा कि किसानों को केवल घोषणाओं और दावों से राहत नहीं मिलेगी, बल्कि उन्हें खेत में काम करने के जरूरी संसाधन और फसल बेचने के बाद उसका उचित मूल्य मिलना चाहिए। केंद्र और प्रदेश सरकार को किसानों की आवाज सुनकर उनकी समस्याओं का व्यावहारिक समाधान करना चाहिए, ताकि अन्नदाता को अपनी ही मेहनत का हक पाने के लिए परेशान न होना पड़े।