चंडीगढ़ : पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट की ओर से एक ऐतिहासिक निर्णय में स्पष्ट किया है कि आजीवन शिक्षा’ प्राप्त करना सिर्फ एक इच्छा नहीं बल्कि एक संवैधानिक दायित्व है. अदालत द्वारा हरियाणा सरकार के उस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया है जिसमें एक नए नियुक्त कर्मचारी को सिर्फ इसलिए उच्च शिक्षा की परमिशन नहीं दी गई थी क्योंकि उसने अभी 3 साल की नियमित सेवा पूरी नहीं की थी. इस निर्णय ने हरियाणा के ग्रुप सी और ग्रुप डी के उन हजारों कर्मचारियों को राहत दी है.
हरियाणा सरकार को झटका
इस निर्णय से उन कर्मचारियों के लिए नए रास्ते खुल गए हैं जो नौकरी के साथ- साथ अपनी डिग्री पूरी करना चाहते हैं. यह निर्णय स्पष्ट करता है कि प्रशासनिक नियम किसी व्यक्ति के विकास और शिक्षा के अधिकार से बड़े नहीं हो सकते. जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ द्वारा अपने फैसले में कहा गया कि एक ‘आदर्श नियोक्ता’ के रूप में राज्य का कर्तव्य बनता है कि वह अपने कर्मचारियों को शैक्षणिक उन्नति के लिए प्रोत्साहन प्रदान करें, न कि उनके रास्ते में रोड़े अटकाए.
पढ़ने के लिए मांगे अनुमति
यह मामला हरियाणा स्टाफ सिलेक्शन कमीशन (HSSC) के जरिए नियुक्त वेटरनरी लाइवस्टॉक डेवलपमेंट असिस्टेंट (वीएलडीए) नवीन कुमार से संबंधित है. नवीन द्वारा 15 फरवरी 2024 को ड्यूटी ज्वॉइन की गई थी. नवीन 10वीं और 12वीं पास है वह अपनी योग्यता बढ़ाना चाहते थे. उन्होंने 29 मई 2024 को विभाग से डिस्टेंस एजुकेशन के माध्यम से बीए करने की अनुमति मांगी. उन्होंने लिखित में भरोसा दिया कि वे कोई ‘स्टडी लीव’ (अध्ययन अवकाश) नहीं लेंगे और न ही सरकारी काम पर इसका कोई प्रभाव पड़ने देंगे.
मौलिक अधिकार का उल्लंघन
2 जुलाई 2024 को विभाग द्वारा आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उन्होंने अभी 3 साल की अनिवार्य सेवा पूर्ण नहीं की है. जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने हरियाणा सरकार के रवैये पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जीवन के किसी भी पड़ाव पर शिक्षा से वंचित करना मौलिक अधिकार का उल्लंघन है. अदालत का कहना है कि बेहतर शिक्षित कर्मचारी आखिर में सार्वजनिक हित में ही काम करते हैं. अदालत ने देखा कि 3 साल की सेवा की शर्त सिर्फ उन कोर्सेज पर लागू होती है, जहां कर्मचारी को कॉलेज जाने के लिए स्टडी लीव लेनी होती है.
नहीं होगा अध्ययन अवकाश
डिस्टेंस ऑनलाइन मोड में जहां कर्मचारी को ऑफिस से लीव नहीं चाहिए, वहां सेवा अवधि की कोई बाध्यता नहीं रहती. इस फैसले से कर्मचारियों को लाभ तो होगा मगर इसके साथ कुछ शर्ते भी शामिल की गई है. नई शर्तो के मुताबिक, कर्मचारी को कोई अध्ययन अवकाश नहीं मिलेगा. कार्य का स्तर और गुणवत्ता पर कोई प्रभाव नहीं होना चाहिए. कर्मचारी का अवकाश सिर्फ परीक्षा अवधि के दौरान ही दिया जाएगा.