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राजनीति

हरसिमरत कौर बादल फिर से हो सकती हैं मोदी सरकार का हिस्सा

03 जुलाई, 2023 03:53 PM

चंडीगढ़: महाराष्ट्र में हुए घटनाक्रम का असर पंजाब पर भी हो सकता है। भाजपा ने आगामी लोकसभा चुनाव के लिए अपने कुनबे को बड़ा करना शुरू कर दिया है। इस कड़ी में जहां नए दलों को जोड़ा जा रहा है, वहीं किसी न किसी वजह से अलग हुए पुराने साथियों को भी एन.डी.ए. का फिर से हिस्सा बनाने की दिशा में काम चल रहा है। पंजाब में चर्चा है कि एन.डी.ए. सरकार के मोदी मंत्रिमंडल के इस विस्तार और फेरबदल के दौरान अकाली दल से हरसिमरत कौर बादल फिर से मंत्री बनाई जा सकती हैं। हालांकि पूर्व की तरह दबाव डाल कर लिया गया फूड प्रोसैसिंग मंत्रालय इस बार शायद न मिल पाए।

अकाली दल का प्रदर्शन बिगड़ता गया, मजबूत होती गई भाजपा
गौरतलब है कि अकाली दल से हरसिमरत और उनके पति सुखबीर बादल ही लोकसभा सदस्य हैं। राज्यसभा में लंबे अरसे बाद अकाली दल का कोई सांसद नहीं है।  हरसिमरत 2014 से मोदी सरकार में फूड प्रोसैसिंग मंत्रालय का जिम्मा संभाल रही थी मगर 3 विवादित और चर्चित कृषि कानूनों को लेकर लोगों और खासकर किसानों की मोदी सरकार के प्रति नाराजगी देखकर उन्होंने 2020 में मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था। हालांकि इस इस्तीफे का कोई राजनीतिक फायदा उठाने में अकाली दल नाकाम रहा। 2022 के विधानसभा चुनाव में उसका अब तक का सबसे घटिया प्रदर्शन देखने को मिला, जब उसके मात्र 3 विधायक ही जीतकर 117 सदस्यीय विधानसभा का हिस्सा बने। इसके बाद हुए 2 लोकसभा उपचुनाव में भी अकाली दल को शिकस्त ही मिली। दूसरी ओर उसकी सहयोगी रही भाजपा बेहद मजबूत होती रही। भाजपा को पता है कि उसके पास ऐसे चेहरों की हमेशा कमी रही है जिनका कोई आधार हो या जिन्हें पूरे पंजाब में लोग जानते पहचानते हों। इसलिए भाजपा ने अन्य दलों से कई वरिष्ठ नेताओं और पूर्व मंत्रियों को पार्टी में शामिल करने से गुरेज नहीं किया।

राजनीतिक वजूद बचाने के लिए सहारे की जरूरत
बदले राजनीतिक हालात में अकाली दल भी समझता है कि उससे कहीं ’यादा मजबूत कांग्रेस और उससे भी कहीं ’यादा ताकतवर आम आदमी पार्टी है। बीते 2 विधानसभा चुनाव हारने के साथ ही पार्टी सूबे में हाशिए पर पहुंच चुकी है। दूसरी ओर केंद्र सरकार से भी वह बाहर है। ऐसे में राजनीतिक वजूद बचाए रखने के लिए उसे भाजपा जैसे मजबूत सहारे की जरूरत है। भाजपा को भी पता चल चुका है कि पंजाब जैसे राज्य में उसे प्रादेशिक दल के रूप में बैसाखी की जरूरत कहीं ज्यादा है। अब यह तय है कि दोनों दल मजबूरी में ही सही मगर लोकसभा चुनाव से पहले एक साथ होंगे। जिसकी नींव केंद्र सरकार में अकाली दल के शामिल पर पड़ेगी।

तो समझौते की शर्तें रहेंगी कुछ अलग
अगर शिअद और भाजपा के बीच दोबारा गठबंधन होता है, तो तय है कि इस बार समझौते की शर्तें कुछ अलग रहेंगी जिसमें भाजपा का पलड़ा पहले के मुकाबले बहुत भारी रहेगा। भाजपा पहले की तरह 3 लोकसभा सीटों पर तो कतई चुनाव नहीं लड़ेगी। 2 साल में भाजपा अपने पूर्व राजनीतिक आधार वाले इलाकों से बाहर भी काफी पैर पसार चुकी है। कांग्रेस से कैप्टन अमरेंद्र सिंह, सुनील कुमार जाखड़ और लगभग आधा दर्जन पूर्व मंत्रियों के आने से भाजपा के क्षेत्र में काफी इजाफा हुआ है।इसलिए माना जा रहा है कि भाजपा लोकसभा की आधी सीटें तो पंजाब में जरूर मांगेगी। अकाली दल इस हालत में नहीं है जब वह कोई मोलभाव भाजपा के साथ कर सके। भाजपा इस स्थिति में अकाली दल का दबाव नहीं झेलेगी जैसा कि 25 साल के गठबंधन में वह झेलती रही है। अकाली नेताओं का रवैया भी भाजपा नेताओं के प्रति काफी बदला हुआ है। एक भाजपा नेता ने बताया कि अकाली अब जिला स्तर पर कहीं भी भाजपा के प्रति कड़वाहट नहीं दिखाते। एक वरिष्ठ अकाली नेता भी यह स्वीकार कर चुके हैं कि जालंधर लोकसभा उपचुनाव और कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजे दोनों दलों के लिए आंखें खोलने वाले हैं। अब यह समझौता कब मूर्तरूप लेगा, इसमें किसकी क्या भूमिका रहेगी, यह कहना तो जल्दबाजी होगी मगर इतना साफ है कि अगर समझौता सिरे चढ़ा तो यह पूरे देश की गठबंधन राजनीति में कई दलों को संदेश देगा।

 

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