चंडीगढ़ : हरियाणा विधानसभा के मानसून सत्र के पहले दिन सदन की कार्यवाही जिस तरह हंगामे और राजनीतिक टकराव के बीच आगे बढ़ी, उसमें विधानसभा अध्यक्ष हरविंद्र कल्याण की कार्यशैली विशेष रूप से चर्चा में रही। कांग्रेस विधायकों के लगातार विरोध, नारेबाजी और वेल में आने की स्थिति के बावजूद अध्यक्ष ने लंबे समय तक बेहद शांत, सहज और संयमित रवैया अपनाए रखा। उन्होंने विपक्षी विधायकों को समझाने का प्रयास किया, उन्हें अपनी सीटों पर लौटने और संसदीय मर्यादा बनाए रखने की अपील की, लेकिन जब लगातार व्यवधान जारी रहा तो उन्होंने अध्यक्ष के रूप में मिले अधिकारों का सख्ती से इस्तेमाल करने में भी कोई हिचक नहीं दिखाई। पहले दिन की कार्यवाही ने यह स्पष्ट कर दिया कि हरविंद्र कल्याण की अध्यक्षीय शैली केवल सौम्यता तक सीमित नहीं है। जरूरत पड़ने पर वे नियमों के अनुपालन को लेकर उतने ही दृढ़ भी हो सकते हैं।
पहले समझाया, फिर दिखाई नियमों की सख्ती
सदन में कांग्रेस के कुछ विधायक लगातार वेल की ओर जाते रहे और विरोध के कारण कार्यवाही बाधित होती रही। अध्यक्ष हरविंद्र कल्याण ने तत्काल टकराव का रास्ता अपनाने के बजाय पहले समझाने और स्थिति को सामान्य बनाने की कोशिश की। उन्होंने सदस्यों से सदन की कार्यवाही सुचारु रूप से चलने देने का आग्रह किया। जब समझाने के बावजूद स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो अध्यक्ष ने संसदीय नियमों के तहत कार्रवाई की। उन्होंने आठ विधायकों को नेम किया। यह कदम अपने आप में महत्वपूर्ण था, क्योंकि इससे यह संदेश गया कि अध्यक्ष विपक्ष की बात सुनने के लिए तैयार हैं, लेकिन सदन की कार्यवाही को लगातार बाधित करने की अनुमति भी नहीं दी जा सकती। अध्यक्ष की इस कार्यशैली में एक महत्वपूर्ण संतुलन दिखाई दिया—पहले संवाद, फिर समझाइश और अंत में नियमों का इस्तेमाल।
दो बार स्थगन, फिर भी बनाए रखा धैर्य
हंगामे को शांत करने और विपक्षी विधायकों को अपनी बात रखने का अवसर देने के दृष्टिगत अध्यक्ष ने सदन की कार्यवाही दो बार स्थगित भी की। एक बार करीब 20 मिनट और दूसरी बार लगभग 32 मिनट के लिए कार्यवाही स्थगित की गई। इससे साफ था कि अध्यक्ष सीधे टकराव बढ़ाने के पक्ष में नहीं थे। वे चाहते थे कि राजनीतिक विरोध अपनी जगह रहे, लेकिन विधानसभा की कार्यवाही निर्धारित प्रक्रिया के तहत चलती रहे।हालांकि, लगातार हंगामे के कारण सदन का डेढ़ घंटे से अधिक समय प्रभावित हुआ। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष को सरकार के खिलाफ आवाज उठाने और अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है, लेकिन विधानसभा की कार्यवाही के लिए निर्धारित समय का उपयोग जनहित से जुड़े मुद्दों पर चर्चा में हो, यह भी संसदीय व्यवस्था की मूल भावना है।हरविंद्र कल्याण के सामने चुनौती यही थी कि विरोध के अधिकार और सदन की मर्यादा के बीच संतुलन कायम रखा जाए।
अध्यक्ष की कुर्सी पर व्यक्ति नहीं, संस्था दिखाई दी
हरियाणा विधानसभा अध्यक्ष के रूप में हरविंद्र कल्याण के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी सदन की निष्पक्षता और गरिमा को बनाए रखने की है। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के विधायक उनके सामने बराबर हैं। यही कारण है कि अध्यक्ष की भूमिका राजनीतिक पद से अलग मानी जाती है। मानसून सत्र के पहले दिन उनके व्यवहार में इसी संस्थागत सोच की झलक दिखाई दी। हंगामे के दौरान उन्होंने किसी भी प्रकार की जल्दबाजी या व्यक्तिगत प्रतिक्रिया देने से परहेज किया। लगातार व्यवधान के बावजूद उनकी भाषा और व्यवहार में सहजता बनी रही। यह कार्यशैली खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विधानसभा अध्यक्ष को एक साथ कई स्तरों पर काम करना पड़ता है। उन्हें नियमों का पालन भी सुनिश्चित करना होता है, विपक्ष की आवाज भी सुननी होती है, सरकार को विधायी कामकाज के लिए पर्याप्त अवसर भी देना होता है और सदन की गरिमा भी कायम रखनी होती है।
शांत स्वभाव के साथ निर्णायक फैसले लेने की क्षमता
हरविंद्र कल्याण की पहचान एक शांत, सौम्य और सहज व्यक्तित्व के रूप में रही है। आमतौर पर वे बातचीत और संवाद के माध्यम से परिस्थितियों को सामान्य बनाने में विश्वास रखते हैं। लेकिन अध्यक्ष के रूप में उनकी कार्यशैली का दूसरा पक्ष भी सामने आया है। पहले दिन आठ विधायकों को नेम किया जाना इस बात का संकेत था कि सौम्यता को कमजोरी नहीं माना जा सकता। अध्यक्ष ने पहले पर्याप्त समय तक स्थिति को संभालने का प्रयास किया और जब लगा कि लगातार व्यवधान से सदन की कार्यवाही प्रभावित हो रही है तो नियमों के अनुसार कार्रवाई की। यही संयमित दृढ़ता उनकी अध्यक्षीय कार्यशैली को अलग पहचान देती है।