प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आंतरिक ज्ञान के महत्व को रेखांकित करते हुए एक संस्कृत सुभाषितम् साझा किया। उन्होंने कहा कि यही ज्ञान मानव जीवन और राष्ट्र की प्रगति का वास्तविक आधार है।
भारतीय संस्कृति में ज्ञान की परंपरा
प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की विरासत और संस्कृति ने हमेशा यह सिखाया है कि सच्चा ज्ञान और उसका सही सदुपयोग ही किसी राष्ट्र की प्रगति का मूल आधार होता है।
युवा निभा रहे अहम भूमिका
उन्होंने बताया कि इसी मार्ग पर चलते हुए देश के युवा एक समृद्ध और सशक्त भारत के निर्माण में सक्रिय रूप से जुटे हुए हैं। प्रधानमंत्री के अनुसार, युवाओं की यह भूमिका भविष्य के भारत को दिशा देने में महत्वपूर्ण है।
आंतरिक ज्ञान को बताया सर्वोच्च
नरेन्द्र मोदी ने कहा कि जो ज्ञान हमारे भीतर स्थित है, वह सामान्य या बाहरी ज्ञान से भी अधिक श्रेष्ठ है। यही आंतरिक ज्ञान इस संसार का वास्तविक सार है और विद्वानों द्वारा पूजनीय माना जाता है।
भारतीय संस्कृति और ज्ञान की परंपरा
प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा- “हमारी विरासत और संस्कृति हमें यही सिखाती आई है कि सच्चा ज्ञान और उसका सदुपयोग ही राष्ट्र की प्रगति का आधार है। इसी मार्ग पर चलकर आज हमारे देश के युवा समृद्ध और सशक्त भारत को गढ़ने में जुटे हैं।
संस्कृत सुभाषितम् किया साझा
अन्तःस्थमेव यज्ज्ञानं ज्ञानादपि च यत्परम्। तदेव सर्वसंसारसारं सद्भिरुपास्यते॥”
इसका अर्थ है कि जो ज्ञान हमारे भीतर स्थित है और जो सामान्य ज्ञान से भी श्रेष्ठ है, वही इस समस्त संसार का असली सार है। श्रेष्ठ व्यक्तियों द्वारा उसी आंतरिक ज्ञान की उपासना की जाती है।