चंडीगढ़ : सांसद दीपेन्द्र हुड्डा ने हरियाणा की बीजेपी सरकार द्वारा संत शिरोमणि गुरु रविदास जी के 650वें प्रकाश पर्व के उपलक्ष्य में गठित 'श्री गुरु रविदास जी समरसता संकल्प अभियान' की राज्य स्तरीय समिति के स्वरूप पर आपत्ति जताते हुए कहा कि बीजेपी सरकार संत रविदास जी के विचारों और देश के संविधान के विपरीत काम कर रही है। दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि अंबाला से कांग्रेस सांसद वरुण चौधरी ने मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी को पत्र लिखकर समिति का पुनर्गठन और विस्तार करने की मांग की है। सांसद वरुण चौधरी ने पत्र में कहा की समिति में केवल सत्ता पक्ष के सांसदों, विधायकों, पूर्व विधायकों और भाजपा नेताओं को ही शामिल किया गया है जबकि अनुसूचित जाति वर्ग से हरियाणा के तीन सांसद होने के बावजूद उन्हें नजरंदाज कर दिया गया। यही नहीं, समिति में विपक्ष के किसी भी प्रमुख नेता को शामिल नहीं किया गया है, किसी को ये बात हजम नहीं हो रही है।
उन्होंने बीजेपी सरकार की पक्षपातपूर्ण मानसिकता की आलोचना करते हुए कहा कि बीजेपी सरकार संत रविदास जी जैसे महान संत के पावन 650वें प्रकाश पर्व को भी अपने पार्टी प्रचार का माध्यम बनाने का प्रयास कर रही है, जो कि पूरी तरह से अनुचित है। उन्होंने समिति के पुनर्गठन की मांग करते हुए कहा कि इसमें राज्य के सभी राजनीतिक दलों के निर्वाचित सांसदों, विधायकों, प्रतिष्ठित बुद्धिजीवियों और प्रमुख सामाजिक संगठनों को शामिल कर इसे सर्वसमावेशी बनाया जाए। दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि संत शिरोमणि गुरु रविदास जी ने समाज को 'समानता', 'भाईचारे' और 'समरसता' का अमर संदेश दिया। परंतु बीजेपी सरकार द्वारा बनाई गई यह समिति उनके इन मूल सिद्धांतों के विपरीत दलगत और भेदभावपूर्ण तरीके से काम कर रही है। बीजेपी सरकार की सोच समानता पर आधारित होने के बजाय विभाजनकारी विचारधारा को बढ़ावा दे रही है। यही नहीं, भारतीय जनता पार्टी हरियाणा की जनता के टैक्स के पैसे का उपयोग अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए कर रही है, जो लोकतांत्रिक व संवैधानिक मर्यादाओं का खुला उल्लंघन है। इस ऐतिहासिक और पावन आयोजन का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए।
सांसद दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि संत शिरोमणि गुरु रविदास जी किसी एक दल के नहीं बल्कि पूरे मानव समाज के पथ-प्रदर्शक हैं। उनके 650वें प्रकाश पर्व का आयोजन व्यापक जनभागीदारी और सच्ची सामाजिक समरसता के साथ होना चाहिए, न कि किसी दल विशेष के मंच के रूप में। समिति में विपक्ष और अनुसूचित जाति वर्ग के निर्वाचित प्रतिनिधियों की उपेक्षा करना कतई उचित नहीं है। उन्होंने सवाल किया कि यदि समिति में केवल सत्ता पक्ष के नेताओं को ही शामिल किया जाएगा, तो इसे सामाजिक समरसता कैसे कहा जा सकता है।