Monday, February 16, 2026
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बांग्लादेश में तारिक रहमान की राह मुश्किल, जमात-ए-इस्लामी का बढ़ता प्रभाव बड़ी चुनौती

16 फ़रवरी, 2026 06:58 PM

बांग्लादेश के चुनावी नतीजे लोकतंत्र बहाली की उम्मीद जगाते हैं। हाल ही में सम्पन्न हुए चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की जबरदस्त जीत कई लोगों के लिए राहत का सबब है। तारिक रहमान देश को लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर चलाएंगे, इसका भरोसा है, लेकिन जश्न के माहौल में भी लोग सशंकित हैं। कुछ खुफिया अधिकारियों ने इसकी वजह बताई है।

जमात-ए-इस्लामी को संसदीय चुनाव में जीत भले ही नहीं मिली, लेकिन उसकी झोली में 77 सीटें गिरीं और ये उसका अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन है। रहमान के लिए बांग्लादेश की कमान संभालना कांटों से भरा ताज अपने सिर पर सजाने जैसा है। अंतरिम सलाहकार मोहम्मद यूनुस के दौर में जो गड़बड़ियां की गईं, उसकी वजह से रहमान को शुरू से सब कुछ शुरू करना पड़ सकता है।

बांग्लादेश की सियासत पर निगाह रखने वालों का कहना है कि रहमान के लिए, विदेशी रिश्तों को संवारने से ज्यादा भीतर से सफाई करना सबसे बड़ी चुनौती होगी। उन्होंने यह साफ कर दिया है कि वह सभी देशों के साथ अच्छे रिश्ते चाहते हैं, लेकिन बांग्लादेश का हित उनके लिए सबसे अहम होगा। विशेषज्ञों के अनुसार इसका स्पष्ट मतलब है कि वह बांग्लादेश की कीमत पर किसी भी देश को बहुत ज्यादा तवज्जो नहीं देंगे।

दरअसल, यूनुस ने पाकिस्तान को बहुत ज्यादा अहमियत दे दी थी। उन्होंने समुद्र खोल दिया और वीजा के नियमों में ढील दे दी। भारतीय एजेंसियों का कहना है कि ये यूनुस की गलतियां थीं, क्योंकि आईएसआई इन रास्तों का इस्तेमाल हथियार, गोला-बारूद और आतंकवादियों को भेजने के लिए करती रही है। इन रास्तों का इस्तेमाल ड्रग्स तस्करी के लिए किया जाता है जो बांग्लादेश के जरिए भारत पहुंचाए जाते हैं।

एक बहुत बड़ी चुनौती मोबोक्रेसी पर नकेल कसनी भी होगी। यूनुस राज में, जमात की वजह से, अनियंत्रित भीड़ का आतंक रोज का काम हो गया।मीडिया पर हमले हुए हैं, अल्पसंख्यकों को सताया गया है, और सियासी विरोधियों को निशाने पर लिया जाता रहा है। पुलिस केस दर्ज करने में असफल रही है, और अगर करती भी है तो उन केस की कभी जांच नहीं हुई।

चिंता इस बात को लेकर भी है कि हो सकता है जमात शुरू में शांत रवैया अपनाए लेकिन फिर मौका हाथ लगते ही अपनी कारगुजारियों को अंजाम देने लगे। इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक अधिकारी ने कहा कि जमात शायद तुरंत हिंसा में शामिल न हो। इस बात की बहुत चर्चा है कि ये कट्टरपंथी दल, बीएनपी के साथ करीबी रिश्ता बनाना चाहती है ताकि सरकार का हिस्सा बन सके।

अधिकारी के अनुसार दोनों दल पहले भी गठबंधन में रहे हैं, और इसलिए अगर दोनों फिर से साथ आते हैं तो कोई हैरानी नहीं होगी। हालांकि, तब और अब की स्थिति में बड़ा अंतर बहुमत का है। बीएनपी को जमात की जरूरत नहीं है क्योंकि वो अपने दम पर मजबूत है। चुनावों से पहले, जमात की प्रशासनिक कार्यों में बहुत दखलअंदाजी थी। ऐसा इसलिए है क्योंकि पार्टी के यूनुस के साथ अच्छे रिश्ते थे।

एक और अधिकारी ने कहा कि अगर जमात को प्रशासन में कोई अहम भूमिका नहीं मिली, तो वह और ज्यादा कुंठा का शिकार हो जाएगी और मोबोक्रेसी को बढ़ावा देगी। बीएनपी की जीत बड़ी है, लेकिन एक सच ये भी है कि जमात का कद भी बढ़ा है। एक और अधिकारी ने बताया कि जो पार्टी कभी 20 का आंकड़ा पार नहीं कर पाई, वह 77 तक पहुंच गई है, और यह एक बहुत बड़ी छलांग है।

वह इस पहुंच का इस्तेमाल अपनी विचारधारा फैलाने और लोगों को डराने के लिए करना चाहेगी। एक्सपर्ट्स का कहना है कि हालांकि जमात ने बड़ी जीत हासिल की, लेकिन वह साफ तौर पर खुश नहीं है। पार्टी चुनाव जीतने की उम्मीद कर रही थी ताकि वह अपना एजेंडा लागू कर सके।

जमात का एक मुख्य एजेंडा 1971 के लिबरेशन वॉर की यादों को मिटाना था। जमात ने उस युद्ध में पाकिस्तान का साथ दिया था। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि वह अपनी चरमपंथी विचारधारा के कारण हमेशा चाहती थी कि बांग्लादेश को पाकिस्तान का हिस्सा बनाया जाए। यूनुस की सरपरस्ती में, वह अपनी बात मनवाने में कामयाब रही। अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म, सड़कों पर हिंसा और जबरन उगाही कई गुना बढ़ गए। लेकिन, चुनावी नतीजों से साफ होता है कि बांग्लादेश की अधिकतर जनता ने जमात की सोच को नकार दिया है और वे चाहती है कि बांग्लादेश जिंदा रहे। उस पर किसी ऐसी पार्टी का जोर न चले जो आईएसआई की कठपुतली हो।

एक और अधिकारी ने कहा कि रहमान शायद जमात को खुली छूट नहीं देंगे क्योंकि वह अपने देश में सामान्य हालात चाहते हैं। दूसरी ओर, जमात अपनी पहुंच और निराशा की वजह से लोगों को भड़का सकती है और भीड़तंत्र को बढ़ावा दे सकती है। अधिकारी ने आगे कहा कि यह रहमान के लिए मुश्किल होगा क्योंकि जमात सिर्फ एक छोटा-मोटा ग्रुप नहीं है, बल्कि आज जीती हुई 77 सीटों की वजह से उसका राजनीतिक दबदबा बढ़ा है।

इसके अलावा, जमात ने पश्चिम बंगाल के बॉर्डर वाले इलाकों में जीत हासिल की है। इन इलाकों में कट्टरपंथ तेजी से फैल रहा था। इंटेलिजेंस एजेंसियों का कहना है कि इन इलाकों पर जमात के पूरी तरह से कब्जे के साथ, समस्याएं और बढ़ेंगी, और यह भारत की नेशनल सिक्योरिटी के लिए बड़ी चुनौती है।

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