प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर साझा किए गए ‘सुभाषितम’ संदेश में प्रकृति संरक्षण को भारतीय संस्कृति और संस्कारों का अभिन्न हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि प्रकृति का संरक्षण केवल हमारा दायित्व नहीं है, बल्कि यह हमारी जीवनशैली, परंपराओं और मूल्यों से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।
संस्कृत श्लोक के माध्यम से दिया संदेश
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश के साथ संस्कृत का एक श्लोक भी साझा किया। श्लोक है, “मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥” इस श्लोक का भावार्थ है कि वायु हमारे लिए आनंददायक और कल्याणकारी रूप से प्रवाहित हो, नदियां जीवनदायिनी एवं पोषणकारी जल प्रदान करें तथा औषधियां और वनस्पतियां समस्त जीव-जगत के लिए आरोग्य और सुख का स्रोत बनें। इस संदेश के जरिए प्रधानमंत्री ने प्रकृति और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता तथा संरक्षण की भावना को रेखांकित किया।
योग को दिनचर्या में शामिल करने की अपील
इससे पहले गुरुवार को साझा किए गए ‘सुभाषितम’ संदेश में प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों से योग को अपनी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बनाने का आग्रह किया था। उन्होंने कहा था कि योग का नियमित अभ्यास शरीर को स्वस्थ और मन को शांत रखता है, जिससे जीवन संतुलित और ऊर्जावान बनता है। प्रधानमंत्री ने उस संदेश के साथ संस्कृत का श्लोक भी साझा किया था, “योगेन चित्तस्य पदेन वाचां मलं शरीरस्य च वैद्यकेन। योऽपाकरोत् तं प्रवरं मुनीनां पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि॥”
महर्षि पतंजलि को किया नमन
इस श्लोक का अर्थ बताते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था कि मन की चित्तवृत्तियों को योग से, वाणी को व्याकरण से और शरीर की अशुद्धियों को आयुर्वेद से शुद्ध करने वाले मुनियों में श्रेष्ठ महर्षि पतंजलि को वे श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं।
एकजुटता और सहयोग पर भी दिया था संदेश
वहीं, बुधवार को साझा किए गए ‘सुभाषितम’ संदेश में प्रधानमंत्री मोदी ने एकजुटता और आपसी सहयोग के महत्व पर जोर दिया था। उन्होंने कहा था कि जब समाज और राष्ट्र के लोग मिलकर कार्य करते हैं, तो देश की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है और विकास के लक्ष्य अधिक प्रभावी ढंग से प्राप्त किए जा सकते हैं।