नई दिल्ली(एजेंसी) : 11 अक्टूबर 2026 को अमिताभ बच्चन के 84वें जन्मदिन पर उनके प्रशंसक उस कलाकार का उत्सव मना रहे हैं, जिसने कई पीढ़ियों को अपनी फिल्मों, संवादों और अभिनय से जोड़ा है। उनकी कहानी भारतीय सिनेमा के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है और उनके काम की विरासत आने वाले वर्षों में भी दर्शकों के बीच बनी रहने की संभावना है। अमिताभ बच्चन का पूरा नाम अमिताभ हरिवंश राय बच्चन है। उनके पिता डॉ. हरिवंश राय बच्चन हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित कवि थे, जबकि उनकी माता तेजी बच्चन सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में रुचि रखती थीं। साहित्यिक वातावरण में पले-बढ़े अमिताभ के व्यक्तित्व में भाषा, कविता और संवादों के प्रति विशेष संवेदनशीलता विकसित हुई।
उन्होंने नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की और बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। फिल्मों में आने से पहले उन्होंने कोलकाता में भी नौकरी की। लेकिन अभिनय के प्रति आकर्षण उन्हें मुंबई ले आया, जहां फिल्मी दुनिया में अपनी जगह बनाना आसान नहीं था।
अमिताभ बच्चन की 84 वर्षों की जीवन यात्रा में कई अलग-अलग अध्याय हैं—साहित्यिक परिवार में बचपन, फिल्मों में शुरुआती संघर्ष, जंजीर और शोले से मिली ऐतिहासिक लोकप्रियता, कुली हादसे से जीवन की लड़ाई, राजनीति का अनुभव, कारोबारी संकट और कौन बनेगा करोड़पति के माध्यम से नई पहचान।
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जो महज अभिनेता नहीं, बल्कि एक दौर की पहचान बन जाते हैं। अमिताभ बच्चन ऐसा ही एक नाम हैं। बुलंद आवाज, गंभीर व्यक्तित्व, प्रभावशाली संवाद अदायगी और पर्दे पर हर किरदार में जान डाल देने की कला ने उन्हें करोड़ों दर्शकों के दिलों में खास जगह दिलाई। संघर्ष के शुरुआती दिनों से लेकर हिंदी सिनेमा के महानायक बनने और टेलीविजन पर नई पीढ़ियों के बीच लोकप्रियता बनाए रखने तक, उनका सफर मेहनत, धैर्य और बदलते वक्त के साथ खुद को ढालने की कहानी है।
11 अक्टूबर 1942 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद, जिसे अब प्रयागराज कहा जाता है, में जन्मे अमिताभ बच्चन अपने जीवन के 84वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। उनके जन्मदिन पर उनके जीवन, परिवार, फिल्मी सफर, हादसों, राजनीतिक अनुभवों और उन घटनाओं पर नजर डालना जरूरी है, जिन्होंने इस कलाकार को भारतीय जनमानस का अभिन्न हिस्सा बना दिया।
साहित्यिक परिवार में जन्म, पिता से मिली शब्दों की विरासत
अमिताभ बच्चन का पूरा नाम अमिताभ हरिवंश राय बच्चन है। उनके पिता डॉ. हरिवंश राय बच्चन हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित कवि थे, जबकि उनकी माता तेजी बच्चन सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में रुचि रखती थीं। साहित्यिक वातावरण में पले-बढ़े अमिताभ के व्यक्तित्व में भाषा, कविता और संवादों के प्रति विशेष संवेदनशीलता विकसित हुई।
उन्होंने नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की और बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। फिल्मों में आने से पहले उन्होंने कोलकाता में भी नौकरी की। लेकिन अभिनय के प्रति आकर्षण उन्हें मुंबई ले आया, जहां फिल्मी दुनिया में अपनी जगह बनाना आसान नहीं था।
आवाज को बताया गया कमी, उसी ने बना दिया पहचान
फिल्मी करियर की शुरुआत में अमिताभ बच्चन को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उनकी लंबी कद-काठी, गंभीर चेहरा और भारी आवाज उस दौर के प्रचलित रोमांटिक हीरो की छवि से अलग थी। उनकी आवाज को लेकर भी शुरुआती दौर में सवाल उठे, लेकिन आगे चलकर यही आवाज उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गई।
1969 में फिल्म सात हिंदुस्तानी से उन्होंने अभिनय की शुरुआत की। इस फिल्म में उनके काम को पहचान मिली और उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की यात्रा से पहले ही एक महत्वपूर्ण शुरुआती उपलब्धि हासिल हुई। हालांकि, उन्हें बड़ी व्यावसायिक सफलता के लिए अभी इंतजार करना था।
‘जंजीर’ ने बदल दी किस्मत, बन गए एंग्री यंग मैन
1973 में प्रदर्शित फिल्म जंजीर अमिताभ बच्चन के करियर का निर्णायक मोड़ साबित हुई। इस फिल्म में उन्होंने इंस्पेक्टर विजय खन्ना का किरदार निभाया। उनका गुस्सा, व्यवस्था से टकराता व्यक्तित्व और अन्याय के खिलाफ खड़े होने का अंदाज दर्शकों को खूब पसंद आया।
इसके बाद दीवार और शोले जैसी फिल्मों ने उनकी लोकप्रियता को नई ऊंचाई दी। दीवार में विजय का किरदार सामाजिक असमानता, पारिवारिक संघर्ष और परिस्थितियों से पैदा हुए आक्रोश का प्रतीक बना। वहीं शोले में जय के रूप में उन्होंने कम संवादों, सहज हास्य और भावनात्मक अभिनय से दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी।
1970 के दशक में अमिताभ को ‘एंग्री यंग मैन’ की पहचान मिली। यह केवल एक फिल्मी छवि नहीं थी, बल्कि उस दौर के सामाजिक असंतोष और व्यवस्था से निराश युवाओं की भावनाओं को पर्दे पर व्यक्त करने वाला चरित्र भी था।
एक्शन से कॉमेडी और भावनात्मक अभिनय तक
अमिताभ बच्चन की सफलता का कारण केवल एक्शन फिल्में नहीं रहीं। उन्होंने अलग-अलग शैलियों में अभिनय करके अपनी प्रतिभा का विस्तार किया।
अमर अकबर एंथनी (1977)
इस फिल्म में उन्होंने हास्य और मनोरंजन से भरपूर एंथनी गोंसाल्विस का किरदार निभाया। यह उनके कॉमिक अंदाज की लोकप्रिय मिसालों में शामिल है।
डॉन (1978)
दो अलग व्यक्तित्वों वाले किरदारों को निभाकर उन्होंने अपनी अभिनय क्षमता का प्रदर्शन किया। फिल्म का संवाद और संगीत भी लंबे समय तक लोकप्रिय रहे।
अग्निपथ (1990)
विजय दीनानाथ चौहान का उनका गंभीर और प्रभावशाली अभिनय आज भी याद किया जाता है। इस भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
ब्लैक (2005)
इस फिल्म में उन्होंने एक ऐसे शिक्षक की भूमिका निभाई, जो दृष्टि और श्रवण संबंधी दिव्यांगता वाली छात्रा को शिक्षा और आत्मविश्वास की राह दिखाता है। इस भूमिका के लिए भी उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
पीकू (2015)
एक जिद्दी, मजाकिया और भावुक बुजुर्ग पिता के रूप में उन्होंने साबित किया कि उम्र के साथ किरदार बदल सकते हैं, लेकिन अभिनय की प्रभावशीलता बरकरार रह सकती है।
इन फिल्मों के बीच कभी-कभी, त्रिशूल, काला पत्थर, सिलसिला, शराबी, मोहब्बतें और बागबान जैसी फिल्मों ने उनके करियर को विविधता दी। अमिताभ बच्चन ने समय के साथ एक्शन हीरो, रोमांटिक अभिनेता, हास्य कलाकार, पिता और गंभीर चरित्र अभिनेता—कई रूपों में दर्शकों का मनोरंजन किया।
1982 का ‘कुली’ हादसा: जब पूरा देश करने लगा दुआ
अमिताभ बच्चन के जीवन की सबसे चर्चित और भावनात्मक घटनाओं में से एक 1982 में फिल्म कुली की शूटिंग के दौरान हुआ हादसा था। एक लड़ाई के दृश्य की शूटिंग में उन्हें गंभीर चोट लगी। उनकी हालत इतनी नाजुक हो गई कि देशभर में उनके प्रशंसक उनकी सलामती के लिए प्रार्थना करने लगे।
यह घटना केवल एक फिल्मी सितारे के अस्पताल में भर्ती होने की खबर नहीं थी। उस समय अमिताभ बच्चन की लोकप्रियता इस स्तर पर पहुंच चुकी थी कि उनकी सेहत की खबरें पूरे देश में चिंता का विषय बन गई थीं। उपचार और लंबे संघर्ष के बाद वह स्वस्थ हुए और फिल्मों में लौटे।
इस हादसे ने उनके जीवन और करियर पर गहरी छाप छोड़ी। उनके प्रशंसकों के साथ उनका भावनात्मक रिश्ता भी इस घटना के दौरान स्पष्ट रूप से सामने आया।
राजनीति में भी आजमाया हाथ
1984 में अमिताभ बच्चन ने अभिनय से अलग राजनीतिक क्षेत्र में कदम रखा। वह इलाहाबाद लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। यह चुनाव उनके लिए एक नई भूमिका की शुरुआत थी, लेकिन उनका राजनीतिक सफर लंबा नहीं चला और 1987 में उन्होंने संसद की सदस्यता छोड़ दी।
राजनीति से दूरी बनाने के बाद उन्होंने दोबारा फिल्मों पर ध्यान केंद्रित किया। उनका यह अनुभव बताता है कि एक बड़ी फिल्मी पहचान रखने वाले व्यक्ति के लिए भी राजनीति और सार्वजनिक जीवन अलग तरह की चुनौतियां लेकर आते हैं।
कारोबार में मुश्किलें और फिर शानदार वापसी
1990 के दशक में अमिताभ बच्चन ने मनोरंजन जगत में कारोबारी पहल करते हुए अमिताभ बच्चन कॉरपोरेशन लिमिटेड (ABCL) की स्थापना की। कंपनी को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और उनके जीवन में एक ऐसा दौर आया, जब उन्हें अपनी पेशेवर दिशा पर नए सिरे से काम करना पड़ा।
इसके बाद उन्होंने अभिनय में वापसी की। वर्ष 2000 उनके करियर का एक और महत्वपूर्ण मोड़ बना, जब उन्होंने टेलीविजन के लोकप्रिय क्विज शो कौन बनेगा करोड़पति की मेजबानी शुरू की।
इस शो ने अमिताभ बच्चन की छवि को एक नए रूप में प्रस्तुत किया। वह अब केवल फिल्मों के महानायक नहीं थे, बल्कि प्रतियोगियों से आत्मीयता से बात करने वाले, उनकी कहानियां सुनने वाले और ज्ञान को सम्मान देने वाले मेजबान भी बन गए।
‘कौन बनेगा करोड़पति’ ने घर-घर तक पहुंचाया
कौन बनेगा करोड़पति ने भारतीय टेलीविजन पर अमिताभ बच्चन की लोकप्रियता को नई पीढ़ी तक पहुंचाया। उनकी बोलने की शैली, प्रतियोगियों के प्रति सम्मान, हल्का हास्य और सवाल पूछने का अंदाज शो की पहचान बने।
इस कार्यक्रम की खासियत यह रही कि इसमें छोटे शहरों, गांवों और सामान्य परिवारों से आने वाले लोगों को भी अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच मिला। अमिताभ बच्चन ने प्रतियोगियों से संवाद करते हुए उनकी व्यक्तिगत कहानियों को जगह दी, जिससे कार्यक्रम केवल सवाल-जवाब तक सीमित नहीं रहा।
फिल्मी पर्दे पर गंभीर और प्रभावशाली दिखने वाले अमिताभ का सहज और संवेदनशील रूप दर्शकों को और करीब लाया। यह उनके करियर की उन उपलब्धियों में है, जिन्होंने साबित किया कि बदलते माध्यमों में भी एक कलाकार अपनी प्रासंगिकता बनाए रख सकता है।
परिवार: जया बच्चन, अभिषेक और श्वेता
अमिताभ बच्चन ने 1973 में अभिनेत्री जया भादुड़ी से विवाह किया। जया बच्चन स्वयं हिंदी सिनेमा की प्रतिष्ठित अभिनेत्री हैं। उनके परिवार में बेटा अभिषेक बच्चन और बेटी श्वेता बच्चन नंदा हैं।
अभिषेक बच्चन ने भी अभिनय के क्षेत्र में अपना करियर बनाया, जबकि श्वेता बच्चन नंदा लेखन और अन्य रचनात्मक गतिविधियों से जुड़ी रही हैं। बच्चन परिवार की सार्वजनिक मौजूदगी और फिल्मों में उसके सदस्यों की सक्रियता ने इसे भारतीय मनोरंजन जगत के चर्चित परिवारों में शामिल किया है।
पुरस्कार और सम्मान: पांच दशक से अधिक की उपलब्धियां
अमिताभ बच्चन के अभिनय और भारतीय सिनेमा में योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर कई सम्मानों से पहचाना गया है।
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार: उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए चार बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला है।
पद्मश्री: 1984 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।
पद्म भूषण: 2001 में उन्हें पद्म भूषण प्रदान किया गया।
पद्म विभूषण: 2015 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।
दादासाहेब फाल्के पुरस्कार: 2019 में भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान के लिए उनके नाम की घोषणा की गई; उन्हें यह पुरस्कार 2019 के लिए 2020 में प्रदान किया गया।
इन सम्मानों के पीछे उनकी लंबी फिल्मी यात्रा, अलग-अलग तरह की भूमिकाएं और भारतीय सिनेमा में उनका निरंतर योगदान रहा है।
उम्र के साथ बदले किरदार, नहीं बदला काम के प्रति समर्पण
अमिताभ बच्चन की खासियत यह रही कि उन्होंने अपनी लोकप्रियता को केवल पुरानी फिल्मों और चर्चित संवादों के सहारे नहीं छोड़ा। उम्र बढ़ने के साथ उन्होंने अपने किरदारों का चयन बदला और नई पीढ़ी के निर्देशकों के साथ काम किया।
ब्लैक, पा, पीकू, पिंक, बदला, गुलाबो सिताबो और कल्कि 2898 एडी जैसी फिल्मों में उनके काम ने अलग-अलग दौर के दर्शकों तक उनकी पहुंच बनाए रखी। कभी गंभीर शिक्षक, कभी बुजुर्ग पिता, कभी रहस्यमय व्यक्तित्व और कभी पौराणिक योद्धा के रूप में उन्होंने अपनी अभिनय क्षमता के नए आयाम प्रस्तुत किए।
सितंबर 2026 में आई मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अमिताभ बच्चन ने अपने काम से संन्यास लेने की अटकलों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया था कि उनके एक कथन का अर्थ काम छोड़ना नहीं, बल्कि सोने जाना था। वह कौन बनेगा करोड़पति के 18वें सीजन से भी जुड़े रहे हैं।