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Bengal SIR Supreme Court Hearing : 'Mismatch को जानबूझकर Mismap किया जा रहा', SC में ममता बनर्जी की तीखी दलील

04 फ़रवरी, 2026 05:17 PM

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मतदाता सूची से नाम हटाने और कथित गड़बड़ियों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में खुद बोलने की अनुमति मांगी। उन्होंने अदालत से कहा कि वह इस मुद्दे को बेहतर तरीके से समझा सकती हैं, क्योंकि वह उसी राज्य से आती हैं, जहां यह पूरा मामला सामने आया है।

इस पर प्रधान न्यायाधीश (CJI) ने हल्के अंदाज में कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि वह पश्चिम बंगाल से हैं। इसके बाद ममता बनर्जी ने बेंच को धन्यवाद देते हुए कहा कि कई बार वकील तब लड़ते हैं, जब नुकसान हो चुका होता है और न्याय दरवाजों के पीछे रोता रह जाता है।

“मैं कोई खास व्यक्ति नहीं हूं, एक आम इंसान हूं”
मुख्यमंत्री ने अदालत में कहा कि उन्होंने चुनाव आयोग (ECI) को इस मुद्दे पर छह पत्र लिखे, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। उन्होंने खुद को कोई बड़ी या खास हस्ती न बताते हुए कहा कि वह एक आम इंसान की तरह अपनी बात रख रही हैं और यह लड़ाई किसी पार्टी के लिए नहीं, बल्कि आम लोगों के अधिकारों के लिए है।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की भूमिका पर भी दिया जोर
इस पर CJI ने कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से भी इस मामले में याचिका दायर की गई है और राज्य का प्रतिनिधित्व करने के लिए देश के वरिष्ठ और अनुभवी वकील अदालत में मौजूद हैं। उन्होंने बताया कि कपिल सिब्बल, गोपाल शंकरनारायणन और श्याम दीवान जैसे वरिष्ठ अधिवक्ता इस मामले में अदालत की सहायता कर रहे हैं।

नामों में गड़बड़ी पर टैगोर का उदाहरण
सुनवाई के दौरान ममता बनर्जी ने नामों की स्पेलिंग और पहचान में अंतर को लेकर कवि रवींद्रनाथ टैगोर का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि बंगाल में कई उपनाम अलग-अलग तरीकों से लिखे जाते हैं, जिससे ‘मिसमैच’ दिखाया जा रहा है। CJI ने भी इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि टैगोर का नाम भी आजकल अलग-अलग तरीके से लिखा जाता है, कोई ‘E’ जोड़ता है तो कोई नहीं।

“शादी, पता बदलने पर भी नाम हटाए जा रहे”
ममता बनर्जी ने अदालत को बताया कि कई मामलों में शादी के बाद महिलाओं का उपनाम बदलने पर उनके नाम को मतदाता सूची से हटाया जा रहा है। इसी तरह काम या पढ़ाई के कारण पता बदलने पर भी इसे ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ बताकर नाम काटे जा रहे हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि यह पूरी प्रक्रिया ‘डिस्क्रेपेंसी मैपिंग’ के नाम पर की जा रही है। मुख्यमंत्री ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा आधार कार्ड, डोमिसाइल सर्टिफिकेट और सरकारी आवास कार्ड को मान्य दस्तावेज मानने के फैसले से बंगाल के लोग खुश थे, लेकिन चुनाव से ठीक पहले सिर्फ बंगाल को ही निशाना बनाया जा रहा है।

“24 साल बाद इतनी जल्दबाजी क्यों?”
ममता बनर्जी ने सवाल उठाया कि जिस काम को पूरा करने में पहले दो साल का समय दिया जाता था, उसे अब सिर्फ चार महीने में क्यों किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया फसल कटाई के मौसम और पूजा के समय शुरू की गई, जब बड़ी संख्या में लोग अपने घरों से बाहर थे।

चुनाव आयोग पर तीखा तंज
सुनवाई के दौरान मुख्यमंत्री ने चुनाव आयोग पर तंज कसते हुए उसे ‘व्हाट्सऐप आयोग’ तक कह दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि लोगों के नाम बिना ठोस वजह के हटाए जा रहे हैं और बंगाल को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश और अगली सुनवाई
ममता बनर्जी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। आयोग को इस मामले में सोमवार तक जवाब दाखिल करना होगा। साथ ही अदालत ने पश्चिम बंगाल सरकार से कहा है कि वह उन एसडीएम और क्लास-2 अधिकारियों की सूची दे, जिन्हें जरूरत पड़ने पर इस प्रक्रिया में तैनात किया जा सकता है।

अदालत ने यह भी संकेत दिया कि अगर पर्याप्त अधिकारी उपलब्ध होंगे, तो माइक्रो ऑब्जर्वर्स की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। मामले की अगली सुनवाई अब चुनाव आयोग के जवाब के बाद होगी।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी राज्य में निर्वाचन आयोग द्वारा जारी मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर एक महत्वपूर्ण सुनवाई से पहले बुधवार को उच्चतम न्यायालय पहुंचीं।

मुख्यमंत्री ने व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर बहस की अनुमति के अनुरोध वाला एक अंतरिम आवेदन भी दायर किया है। बनर्जी अपने वकीलों के साथ खुद न्यायालय कक्ष संख्या एक में उपस्थित हैं। मुख्यमंत्री के नाम से मंगलवार को प्रवेश पास जारी किया गया था।

उच्चतम न्यायालय की वेबसाइट के अनुसार प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ बनर्जी एवं तीन अन्य लोगों मोस्तारी बानू और तृणमूल कांग्रेस सांसद डेरेक ओ ब्रायन एवं डोला सेन द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई करने वाली है।

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